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किसानों-आदिवासियों को जल, जंगल-जमीन बचाने हैं तो लुटेरों से लंबी लड़ाई लड़नी होगी: राकेश टिकैत

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नई दिल्ली। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने किसानों और आदिवासियों से अपने हितों की रक्षा करने का आवाह्न किया। राकेश टिकैत ने सोशल मीडिया के जरिए "जल, जंगल, जमीन" बचाने लिए किसानों और आदिवासियों को संगठित होकर लड़ाई लड़ने की अपील की। अपने आॅफिशियल ट्विटर अकाउंट से टिकैत ने ट्वीट करते हुए लिखा, "यदि अपनी जमीन और जल-जंगल बचाने हैं तो किसानों और आदिवासियों को देश के लुटेरों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़नी होगी।"

    Rakesh Tikait की चेतावनी, जल, जंगल ज़मीन बचानी है तो लुटेरों के खिलाफ लड़नी होगी लड़ाई |वनइंडिया हिंदी
    राकेश टिकैत ने कहा- जल जंगल जमीन बचाएं

    राकेश टिकैत ने कहा- जल जंगल जमीन बचाएं

    किसानों और आदिवासियों से अपनी आवाज बुलंद करने का आवाह्न राकेश टिकैत पहले भी कई दफा कर चुके हैं। हालांकि, इस बार उनका आशय जंगल बचाने से था। दरअसल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर जंगलों का दोहन हो रहा है। इसके अलावा पूर्वोत्तर भारत में भी पेड़ काटने की खबरें आती रही हैं। इन दिनों सबसे ज्यादा सुर्खियों में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के बकस्वाहा के जंगल हैं। बकस्वाहा क्षेत्र में बंदर हीरा खनन परियोजना (बंदर डायमंड प्रोजेक्ट) को सरकार द्वारा अनुमति दिए जाने के बाद लोगों में भारी नाराजगी है। एक शोध के मुताबिक, इस क्षेत्र में 3.2 करोड़ कैरेट के हीरे हैं, जिन्हें निकालने के लिए 2.15 लाख पेड़ काटे जाने हैं। इतनी बड़ी मात्रा में पेड़ों की कटाई को लोग प्रकृति का विनाश बता रहे हैं। ऐसे में दो महीने से विरोध हो रहा है।

    मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में खत्म हो रहे जंगल

    मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में खत्म हो रहे जंगल

    बकस्वाहा के जंगल में 2 लाख से ज्यादा पेड़ों के कटने के खिलाफ देशभर के पर्यावरण संरक्षण से जुड़े 50 संगठनों समेत 12 हजार से ज्यादा लोग साथ आए हैं। जिसे लेकर सोशल मीडिया पर भी "स्टैंड विद बकस्वाहा" ट्रेंड हुआ। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में जनहित याचिका दायर की गई। इसके अलावा जंगल बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई। यह याचिका दिल्ली की नेहा सिंह की ओर से दायर की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ​लिया। हालांकि, कोर्ट से लोगों को कोई खास राहत नहीं मिली। अब पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि, पेड़ काटे तो चिपको आंदोलन होगा। आदिवासी पहले से ही जंगल काटने के विरोध में रहे हैं।

    हीरों के खनन के लिए काटे जा रहे जंगलहीरों के खनन के लिए काटे जा रहे जंगल

    हीरों के खनन के लिए काटे जा रहे हजारों पेड़

    हीरों के खनन के लिए काटे जा रहे हजारों पेड़

    देश के एक बड़े अखबार ने खबर छापकर बताया कि, हीरों के लिए बकस्वाहा में 382.131 हेक्टेयर का जंगल खत्म होगा। क्योंकि, इस जंगल की जमीन में 3.42 करोड़ कैरेट हीरे दबे होने का अनुमान है। इस जमीन पर वन विभाग ने पेड़ों की गिनती की थी, तो संख्या 2 लाख 15 हजार 875 बैठी। जिनमें 40 हजार पेड़ सागौन और बाकी अन्य केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा, अर्जुन जैसे औषधीय पेड़ हैं।

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    जंगल में हीरे के लिए सर्वे, फिर लीज पर दिए

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    बता दिया जाए कि, बकस्वाहा क्षेत्र में बंदर डायमंड प्रोजेक्ट के तहत जंगल का सर्वे 20 साल पहले शुरू हुआ था। 2000 से 2005 के बीच हुए सर्वे में पता चला कि यहां हीरा किंबरलाइट की चट्टानें हैं। राज्य सरकार ने 2 साल पहले इस जंगल की नीलामी की। आदित्य बिड़ला ग्रुप की एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने सबसे ज्यादा बोली लगाई। फिर इसी कंपनी को सरकार ने जमीन 50 साल के लिए लीज पर देने का एग्रीमेंट कर लिया।

     rakesh tikait on forest land water save

     rakesh tikait on forest land water save

    English summary
    farmer's leader rakesh tikait on forest land water save | buxwaha forest madhya pradesh | news in hindi
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