अब इन शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकेंगी पार्टियां, जानिए लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने जारी किए कौन से नियम

लोकसभा चुनाव होने में कुछ महीनों का समय बचा है। सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने में जुटी हुई हैं। इसी बीच चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किये हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि चुनाव आयोग ने भाषा के प्रयोग को लेकर पार्टियों के लिए गाइडलाइन जारी की हो। ये दिशानिर्देश मतदान निकाय ने विकलांग व्यक्तियों के लिए अपमानजनक भाषा का उपयोग करने से पार्टियों को रोकने के लिए जारी किए हैं।

अपने प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने कहा कि हाल ही में, उसे 'विकलांग व्यक्तियों' (पीडब्ल्यूडी) के बारे में राजनीतिक चर्चा में अपमानजनक या आक्रामक भाषा के उपयोग के बारे में बारे में अवगत कराया गया है। सदस्यों द्वारा भाषण/अभियान में ऐसे शब्दार्थ का उपयोग किसी भी राजनीतिक दल या उनके उम्मीदवारों को दिव्यांगों के अपमान के रूप में समझा जा सकता है।

ECI

प्रेस नोट में कहा गया,"गूंगा, मंदबुद्धि, पागल, सिरफिरा, अंधा, काना, बहरा, लंगड़ा, लूला, अपाहिज इत्यादि जैसे अपमानजनक शब्दों के प्रयोग से राजनीतिक पार्टियों को बचना जरुरी है।" चुनाव आयोग ने कहा,"राजनीतिक चर्चा/अभियान में दिव्यांगों को न्याय और सम्मान दिया जाना चाहिए।"

प्रेस नोट में कहा गया,"आयोग विभिन्न पहलों के माध्यम से चुनावों में पहुंच और समावेशिता के सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए सचेत रूप से प्रयास कर रहा है। पहली बार, विकलांग समुदाय के प्रति राजनीतिक विमर्श में समावेशिता और सम्मान को बढ़ावा देने के लिए, आयोग ने राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधि के लिए दिशानिर्देशों का एक सेट जारी किया है।"

चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशानिर्देश

  • राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों को किसी भी सार्वजनिक बयान/भाषण के दौरान, अपने लेखों/आउटरीच सामग्री या राजनीतिक अभियानों में विकलांगता या विकलांगता पर गलत/अपमानजनक संदर्भों का उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों को विकलांगता/पीडब्ल्यूडी से संबंधित टिप्पणियों से सख्ती से बचना चाहिए जो आक्रामक हो सकती हैं या रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रहों को कायम रख सकती हैं।
  • पॉइंट (i), (ii) और (iii) में उल्लिखित ऐसी भाषा, शब्दावली, संदर्भ, उपहास, अपमानजनक संदर्भ या विकलांग व्यक्तियों के अपमान के किसी भी उपयोग पर विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 92 के प्रावधान लागू हो सकते हैं।
  • भाषणों, सोशल मीडिया पोस्ट, विज्ञापनों और प्रेस विज्ञप्तियों सहित सभी अभियान सामग्रियों को राजनीतिक दल के भीतर एक आंतरिक समीक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा ताकि व्यक्तियों/पीडब्ल्यूडी के प्रति आक्रामक या भेदभावपूर्ण, सक्षम भाषा के किसी भी उदाहरण की पहचान की जा सके और उसे सुधारा जा सके।
  • सभी राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए और अपनी वेबसाइट पर घोषित करना चाहिए कि वे विकलांगता और लिंग-संवेदनशील भाषा और शिष्टाचार का उपयोग करेंगे और साथ ही अंतर्निहित मानवीय समानता, गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान करेंगे।
  • सभी राजनीतिक दल सीआरपीडी (विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन) में उल्लिखित अधिकार-आधारित शब्दावली का उपयोग करेंगे और किसी अन्य शब्दावली की ओर झुकाव नहीं करेंगे।
  • सभी राजनीतिक दल अपने सार्वजनिक भाषणों/अभियानों/गतिविधियों/कार्यक्रमों को सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाएंगे।
  • सभी राजनीतिक दल विकलांग व्यक्तियों के साथ सुलभ बातचीत बढ़ावा देने के लिए अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया सामग्री को डिजिटल रूप से सुलभ बना सकते हैं।
  • सभी राजनीतिक दल राजनीतिक प्रक्रिया के सभी स्तरों पर पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए विकलांगता पर एक प्रशिक्षण मॉड्यूल प्रदान कर सकते हैं और सक्षम भाषा के उपयोग से संबंधित विकलांग व्यक्तियों की शिकायतों को सुनने के लिए नोडल प्राधिकारी नियुक्त करेंगे।
  • राजनीतिक दल, पार्टी और जनता के व्यवहार संबंधी अवरोध को दूर करने और समान अवसर प्रदान करने के लिए सदस्यों और पार्टी कार्यकर्ताओं जैसे स्तरों पर अधिक दिव्यांगों को शामिल करने का प्रयास कर सकते हैं।

पांच राज्यों, राजस्थान, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अब सभी की निगाहें लोकसभा चुनाव पर तिकी हुई हैं। अगले साल यानी 2024 के अप्रैल-मई तक लोकसभा चुनाव होनी की उम्मीद है।

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