चीन के चलते गधों पर छाया विलुप्त होने का संकट, 5 साल में धरती पर आधी रह जाएगी संख्या
नई दिल्ली- चीन की वजह से अब बेजुबान गधों के अस्तित्व पर ही संकट पैदा हो गया है। दरअसल, चीन में परंपरागत दवा बनाने के लिए गधों की खाल की बहुत ज्यादा मांग है। जबकि, चीन अपने गधों की आबादी पहले ही काफी हद तक निपटा चुका है। ये खुलासा एक ताजा अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट में हुआ है। चीन में गधों की बेहिसाब बढ़ती डिमांड से कई देशों के कान खड़े हो गए हैं और उन्होंने अपने निर्यात नियमों में बदलाव करने शुरू कर दिए हैं। क्योंकि रिपोर्ट में जो आशंका जताई गई है अगर वैसे ही चलता रहा तो आने वाले 10 वर्षों में धरती से गधे गायब भी हो सकते हैं। परेशानी ये है कि ये सिर्फ गधों की ही बात नहीं है, उससे जुड़े विश्व भर की उन करीब 5 करोड़ इंसानों पर भी संकट मंडरा रहे हैं, जिनकी आजीविका सिर्फ गधों पर ही निर्भर है।

5 वर्षो में चीन को चाहिए करीब 2.5 करोड़ गधे
चीन में परंपरागत उपचारों के लिए गधों की खाल से एक खास तरह की पदार्थ जिलेटिन निकाली जाती है, जिसे चीनी भाषा में इजियाओ कहते हैं। इजियाओ का उपयोग चीन में सर्दी से लेकर अनिद्रा तक की अनेकों बीमारियों के इलाज में धड़ल्ले से किया जाता है। गधों की कल्याण के लिए काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था दि डंकी सेंचुरी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक चीन को इस उद्योग के लिए हर साल करीब 48 लाख गधों की जरूरत है। यानि, ड्रैगन को आने वाले 5 वर्षों में करीब 2.5 करोड़ गधों की खाल इजियाओ के उत्पादन के लिए हासिल करने की जरूरत पड़ेगी। यानि, अगर 10 वर्षों की बात करें तो यह संख्या 5 करोड़ को भी पार कर सकती है।

सिर्फ 27 वर्षों में 76% गधों का कत्ल कर चुका है चीन
एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में गधों की कुल संख्या करीब 4.4 करोड़ है। इस हिसाब से चीन में अगर इजियाओ उद्योग के लिए हर साल करीब 50 लाख गधे मारे जाएंगे तो आने वाले अगले 5 वर्षों में ही विश्व के आधे गधे साफ कर दिए जाएंगे। यह आंकड़ा कितना भयावह है इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि दि डंकी सेंचुरी की रिपोर्ट कहती है कि 1992 से अबतक चीन खाल और दूसरे अंगों के लिए अपने 76% गधों का काम तमाम करवा चुका है। इसलिए, अब चीन का इजियाओ उद्योग दुनिया के दूसरे मुल्कों की ओर खौफनाक मंसूबों के साथ देखना शुरू कर चुका है। इस काम के लिए चीन की नजर खासकर अफ्रीका, एशिया और साउथ अमेरिकी देशों पर टिक गई है।

दुनिया के कई देशों में तेजी से घटी है गधों की तादाद
अगर दुनिया के अन्य देशों की बात करें तो 2007 के बाद से ब्राजील में गधों की संख्या 28%, बोत्सवाना में 37% और किर्गिस्तान में 53% घट चुकी है। इसी वजह से दि डंकी सेंचुरी ने गधों के धरती से पूरी तरह से विलुप्त होने से पहले खाल के लिए होने वाले उसके अनियंत्रित वैश्विक कारोबार को रोकने की मांग की है। चिंता की बात ये भी है कि गधों को इधर-उधर ले जाने में ही अनुमानत: 20% गधे दम तोड़ देते हैं। लेकिन, भारी डिमांड को देखते हुए गर्भवती, बीमार और जख्मी गधों का भी धड़ल्ले से कारोबार हो रहा है। हाल ही में भारत में भी एक रिपोर्ट आई थी जिसमें बताया गया था कि यहां गधों की संख्या में 61.23% की गिरावट आ चुकी है।

गधों पर निर्भर 5 करोड़ लोगों का क्या होगा ?
रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि दुनिया भर में करीब 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी गधों के भरोसे टिकी है। ये लोग विश्व भर के सबसे गरीब समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। दि डंकी सेंचुरी के सीईओ माइक बेकर का कहना है, 'यह पीड़ा सिर्फ गधों तक ही सीमित नहीं है, यह लाखों लोगों की आजीविका के लिए भी खतरा है।' इस संस्था की मांग है कि चीन को गधों की आयात रोक देनी चाहिए और गधों की खाल पर निर्भर रहने के बजाय आर्टिफिशियल तरीके से विकसित गधों की खाल से निकली जिलेटिन पर काम करना चाहिए। यही नहीं चीन से ये भी मांग की जाने लगी है कि वह दूसरे स्रोतों से भी जिलेटिन इस्तेमाल करने की कोशिश शुरू कर दे।

परंपरागत खेती खत्म होने और औद्योगिकरण की मार
रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि चीन में परंपरात दवा बनाने के लिए गधों पर ये संकट इसलिए आया है, क्योंकि वहां तेजी से हुए औद्योगिकरण ने परंपरागत खेती के तरीकों को चौपट कर दिया है। पिछले कुछ दशकों में वहां गधों की संख्या में आई भारी गिरावट के पीछे इसे भी बड़ा कारण माना जा रहा है। इसके चलते चीन के व्यापारियों ने देश के बाहर गधों को तलाशना शुरू कर दिया है। लेकिन, चीन के पर्यावरण और आर्थिक समस्या को देखने के बाद नाइजर और बुर्किना फासो की सरकारों ने चीन को गधों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक अबतक 18 देश चीन में बढ़ी गधों की मांग के मद्देनजर अपने गधों की रक्षा के लिए कदम बढ़ा दिए हैं।
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