Droupadi Murmu Birthday: देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बारे में कितना जानते हैं आप?
Droupadi Murmu Birthday: जब भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को परखने की बात होती है, तो कुछ व्यक्तित्व ऐसे सामने आते हैं जो न केवल व्यवस्था में विश्वास जगाते हैं, बल्कि इस बात को भी प्रमाणित करते हैं कि यह व्यवस्था सचमुच हर नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर देती है - चाहे उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि कैसी भी हो।
ऐसी ही एक जीवंत मिसाल हैं द्रौपदी मुर्मू, जो आज भारत की राष्ट्रपति हैं।
वे केवल एक संवैधानिक पद की प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों की आशा और आत्मबल की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी अपने सपनों को जीवित रखते हैं।

एक छोटे गांव से निकली बड़ी सोच
ओडिशा के मयूरभंज जिले का एक छोटा सा गांव - उपरबेड़ा। इसी गांव में 20 जून 1958 को एक संथाल आदिवासी परिवार में जन्मी एक बालिका को कौन जानता था कि वह एक दिन देश की सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख बनेगी? उनके पिता बिरंची नारायण टुडू गांव के मुखिया थे, जो पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े हुए थे।
द्रौपदी मुर्मू का बचपन अभावों में बीता। यह वह समय था जब आदिवासी समाज को न केवल सामाजिक बल्कि शैक्षणिक और आर्थिक रूप से भी हाशिये पर रखा गया था। अक्सर वो कहती हैं - "मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा भी किसी सपने से कम नहीं थी। लेकिन मैं अपने गांव की पहली बेटी बनी जो कॉलेज तक पहुंची।"
उन्होंने भुवनेश्वर के रामदेवी विमेंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की - यह उस दौर में क्रांतिकारी उपलब्धि थी, विशेष रूप से एक आदिवासी लड़की के लिए।
शिक्षिका से राजनीतिक सफर तक की शुरुआत
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षिका के रूप में की। रायरंगपुर स्थित श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में वह मानद शिक्षिका बनीं। बाद में उन्होंने ओडिशा सरकार के सिंचाई और ऊर्जा विभाग में जूनियर असिस्टेंट के पद पर भी काम किया।
इस दौरान वे सामाजिक उत्तरदायित्व और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बखूबी साधती रहीं। यही वह चरण था जब उनके भीतर एक जनसेविका का बीज पनपने लगा।
1997 में द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। रायरंगपुर नगर पंचायत से वह पार्षद चुनी गईं। उनकी सादगी, स्पष्ट सोच और ईमानदारी ने जनता के दिल में जगह बना ली। उनका राजनीति में प्रवेश कोई आकस्मिक घटनाक्रम नहीं था, बल्कि एक गहरे सामाजिक सरोकार और परिवर्तन की भावना से प्रेरित था।
राज्य मंत्री: नीति निर्माण में महिलाओं की भूमिका
2000 में जब ओडिशा में भाजपा-बीजद गठबंधन सरकार बनी, तो उन्हें राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने वाणिज्य एवं परिवहन विभाग, फिर मत्स्य पालन और पशुपालन विभाग को संभाला।
अपने कार्यकाल में उन्होंने खासकर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी। उनके फैसले और योजनाएं जमीनी हकीकतों से जुड़ी रहीं - चाहे वह बुनियादी ढांचे का विकास हो या स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाना।
झारखंड की पहली महिला राज्यपाल
2015 में द्रौपदी मुर्मू को झारखंड की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त किया गया। यही नहीं, वह राज्य की पहली आदिवासी राज्यपाल भी बनीं। इस भूमिका में उन्होंने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के साथ-साथ सामाजिक न्याय के पक्ष में कई महत्वपूर्ण और साहसिक फैसले लिए। उन्होंने विशेष रूप से जनजातीय अधिकारों, भूमि संरक्षण कानूनों और शैक्षणिक संस्थाओं में पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर दृढ़ता दिखाई।
इतिहास का निर्माण: भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति
2022 में जब एनडीए ने उन्हें भारत के राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया, तो यह सिर्फ एक नामांकन नहीं था, यह भारतीय लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक मोड़ था। विपक्ष की ओर से वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा चुनावी मैदान में थे, लेकिन देशभर के सांसदों और विधायकों ने भारी मतों से द्रौपदी मुर्मू को चुना।
25 जुलाई 2022 को उन्होंने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। और इसके साथ ही वह पहली आदिवासी महिला बन गईं जो राष्ट्रपति पद पर आसीन हुईं।
राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। उनका आचरण, भाषा और सोच आज भी उतने ही विनम्र और सहज हैं। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को केवल औपचारिकता की जगह नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जनसंवाद और समावेशिता का केंद्र बना दिया। अपने अनेक संबोधनों में उन्होंने महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, आदिवासी अधिकारों, स्थानीय भाषाओं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा है।
एक प्रेरणादायक युग की शुरुआत
द्रौपदी मुर्मू का जीवन सिर्फ एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा की यात्रा है। यह उस लोकतंत्र की जीत है जो सबको समान अवसर देता है - चाहे वह किसी भी क्षेत्र, जाति, वर्ग या लिंग से क्यों न हो नकी कहानी बताती है कि अगर इरादे नेक हों, तो समाज की सबसे निचली पंक्ति से उठकर भी कोई शिखर को छू सकता है। आज जब हम द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति के रूप में देखते हैं, तो उनके व्यक्तित्व में केवल पद की गरिमा नहीं, बल्कि करोड़ों वंचितों की आकांक्षाएं, संघर्ष और उम्मीदें प्रतिबिंबित होती हैं।
वे केवल एक संवैधानिक प्रमुख नहीं, बल्कि उस भारत का चेहरा हैं - जो समानता में विश्वास करता है, जो हर नागरिक को आगे बढ़ने का अधिकार देता है। द्रौपदी मुर्मू आज एक व्यक्ति नहीं, एक विचार हैं - भारत की समावेशी, सशक्त और संवेदनशील आत्मा का विचार।
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