Delhi News: दिल्ली में AAP की हार से क्यों कांपा INDIA bloc,बंगाल,UP से महाराष्ट्र तक हड़कंप की 5 वजह समझिए
Delhi News: दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (AAP) की करारी हार को लेकर यूपी, महाराष्ट्र, दिल्ली से लेकर जम्मू कश्मीर तक विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के नेताओं में हाहाकार मचा हुआ है। दिल्ली में इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने अपनी सारी ताकत 'आप'और केजरीवाल को जिताने के लिए झोंक दी थी। फिर भी बीजेपी (BJP) का 'कमल' खिलने से रोक नहीं पाए।
अब इंडिया ब्लॉक की पार्टियों के नेताओं के साथ-साथ खुद कांग्रेस के नेता भी दिल्ली में केजरीवाल की जड़ें उखड़ने की लिए कांग्रेस को ही मुजरिम साबित करने में जुटे हुए हैं। क्योंकि, कांग्रेस पार्टी दिल्ली चुनाव में अकेले लड़ी। 70 में से 67 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हुई और 2% वोट शेयर बढ़ा। इंडिया ब्लॉक के नेताओं की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि अब सहयोगियों के अलग-अलग लड़ने से उनका मुस्लिम वोट बैंक बिखरना शुरू हो चुका है और इसी हकीकत को भांपकर उनकी कंपकंपी छूट रही है।

Delhi News: मुस्लिम वोट बैंक बिखरने से इनकी पूरी राजनीति ही चौपट हो जाएगी
कांग्रेस के एक चर्चित मुस्लिम नेता हैं राशिद अल्वी। उन्होंने बिना लाग लपेट के कह दिया है कि 'बड़ी मुश्किल से बाबरी मस्जिद के बाद मुसलमान कांग्रेस के साथ आए हैं...इस चुनाव ने उन्हें यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि बीजेपी हमारी (कांग्रेस) वजह से आई है।'
दरअसल, मुसलमानों में एक वोट बैंक के रूप में ध्रुवीकृत होकर मतदान करने का ट्रेंड रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली में मुसलमान वोट थोक में 'आप' को मिला तो है, लेकिन इस बार नाराजगी में उन्होंने अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को भी वोट दिया है।
ज्यादातर सीटों पर यह पसंदीदा उम्मीदवार कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) के रहे हैं। इससे पार्टी मुस्तफाबाद वाली मुस्लिम-बहुल सीट ही नहीं हारी, उसका इन सीटों पर वोट शेयर भी घट गया है।
Delhi News: मुसलमानों के मन से निकलने लगा है बीजेपी का डर
मुस्लिम वोटों में बिखराव के नए ट्रेंड का एक और भी बड़ा सबूत है। दिल्ली में मतदान के बाद ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन (AIIA) के प्रेसिडेंट मौलाना साजिद राशिद ने कैमरे के सामने जो कुछ कबूला था, उसका असर नतीजों पर भी महसूस हो रहा है। उन्होंने भाजपा को वोट देने का दावा करते हुए कहा था, 'बीजेपी के नाम पर विपक्षी पार्टियों की ओर से मुस्लिमों के दिमाग में ये बात डाली जाती है कि बीजेपी को हराओ, नहीं तो बीजेपी आएगी तो आपके अधिकार छीन लिए जाएंगे...।'
उन्होंने कहा कि 'मुसलमानों के उस डर को खत्म करने के लिए मैंने (बीजेपी को) वोट किया है। दिल्ली में अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो मैं मुसलमानों से फिर कहूंगा कि देखो इन पांच सालों में मेरा कौन सा अधिकार बीजेपी ने छीन लिया है? मैं वो दिखाने और बताने का काम करूंगा...।'
Delhi News: मुस्लिम लीग की तरह ओवैसी के मुसलमानों के भरोसेमंद चेहरे के रूप में उभरने की आशंका
दिल्ली में हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) ने दो सीटों- ओखला और मुस्तफाबाद में अपने मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। पार्टी के दोनों ही प्रत्याशियों को लेकर मुस्लिम युवाओं में बहुत ही ज्यादा उत्साह नजर आया है।
मुस्तफाबाद में तो दिल्ली दंगों के आरोपी तारिक हुसैन ने 33,474 वोट जुटा लिए। वहीं कांग्रेस के अदील अहमद खान को भी 67,637 वोट पड़े। मतलब, मुसलमानों ने बीजेपी को हराने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पसंद के उम्मीदवार पर दांव लगाया है। शायद इंडिया ब्लॉक को यह 'डर' लग रहा है कि अगर अन्य राज्यों में भी मुसलमान अब इस 'डर' से निकलकर वोट करना शुरू कर देंगे तो उनकी राजनीति की तो दुकान बंद होने का खतरा पैदा हो सकता है।
Delhi BJP CM: एक-एक कर क्षेत्रीय दलों के निपटने की आशंका
दिल्ली चुनाव के बाद इंडिया ब्लॉक के नेताओं की भी जो टिप्पणियां सामने आईं हैं, वह इसी घनघोर निराशा की ओर इशारा कर रही हैं। मसलन, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नतीजों पर इंडिया ब्लॉक में समीक्षा के सवाल पर कहा है कि 'चुनाव से पहले अगर समीक्षा होती तो आज बीजेपी की सरकार नहीं होती।' टीएमसी (TMC) सांसद कीर्ति आजाद ने कहा 'कांग्रेस की रस्सी जल गई, बल नहीं गया'।
इसी तरह से उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' में जिस तरह की भड़ास निकाली गई है, उससे लग रहा है कि 'आप' की हार में उन्हें सियासी जमीन खिसकने का डर सता रहा है।
इसमें लिखा है,'उमर अब्दुल्ला (जम्मू-कश्मीर के सीएम और नेशनल कांफ्रेंस के नेता) ने जो गुस्सा जाहिर किया है, वह सही। वह सही कह रहे हैं कि,'आपस में मन भर के लड़ो और एक-दूसरे को समाप्त कर दो'।
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महाराष्ट्र चुनाव के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी यह ट्रेंड देखने को मिला है कि अब हिंदुत्व वोटों के ध्रुवीकरण के लिए बीजेपी को धार्मिक मुद्दे उठाने ही जरूरी नहीं रह गई है। चुनावों में एक तरह से अंडर करंट की तरह यह मुद्दा भाजपा के पक्ष में काम करने लगा है।
दिल्ली की मुस्लिम-बहुल सीट (मुस्तफाबाद) पर बीजेपी प्रत्याशी की बड़ी जीत इसका बड़ा उदाहरण है। विपक्षी दलों के मन में शायद यही डर बैठने लगा है कि एक तरफ मुस्लिम वोट तो बंटना शुरू हो गया है और दूसरी तरफ हिंदुओं में एकजुटता पैदा हो रही है, यह उनकी भविष्य की राजनीति को मटियामेट कर सकता है।












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