भारत में बच्चों में मोटापा बन सकता है महामारी
भारत दुनियाभर में उम्र के मुक़ाबले छोटे क़द के बच्चों के मामले में बहुत पहले ही शीर्ष पर था. अब भारत में बच्चों में मोटापा चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है और विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि इससे तुरंत नहीं निबटा गया तो ये महामारी का रूप भी ले सकता है.
14 साल के मिहिर जैन जब साल 2017 में व्हीलचेयर पर बैठकर दिल्ली के मैक्स अस्पताल में बेरिएट्रिक सर्जन डॉ. प्रदीप चौबे से सलाह लेने पहुंचे तो डॉक्टर को अपनी आंखों पर यक़ीन नहीं हुआ.
डॉ. चौबे याद करते हैं, "मिहिर बहुत ज़्यादा मोटे थे, वो सही से खड़े नहीं हो पाते थे और बमुश्किल अपनी आंखें खोल पाते थे. उनका वज़न 237 किलो था और बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 92 था."
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यदि बीएमआई 25 से ऊपर हो तो व्यक्ति को मोटा माना जाता है.
कई सप्ताह के इलाज और चर्बी हटाने की सर्जरी के बाद 2018 में मिहिर का वज़न 165 किलो हो गया.
उस समय मिहिर जैन को दुनिया का सबसे भारी किशोर कहा गया था. ये कहना अतिश्योक्ति हो सकता है लेकिन एक तथ्य ये भी है कि भारत में क़रीब 18 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनका वज़न अधिक है और ये संख्या बढ़ती ही जा रही है.
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक ( ये सर्वे 2019-21 में हुआ था) भारत में पांच साल से कम उम्र के 3.4 प्रतिशत बच्चों का वज़न अधिक है. 2015-16 में ये आंकड़ा 2.1 प्रतिशत था.
एनएफएचएस सर्वे भारत में स्वास्थ्य और सामाजिक सूचकांकों का सबसे विस्तृत सर्वे है जिसे भारत सरकार करवाती है.
ये संख्या भले ही देखने में कम लग रही हो लेकिन भारत में यूनिसेफ़ के पोषण मामलों के प्रमुख डॉ. अर्जन डे वाग्त कहते हैं कि भारत की आबादी बहुत ज़्यादा हैं ऐसे में बहुत कम प्रतिशत भी वास्तव में बहुत बड़ी संख्या हो सकता है.
यूनिसेफ़ की साल 2022 की वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस के मुताबिक भारत में 2 करोड़ 70 लाख से अधिक बच्चों का वज़न मोटापे की श्रेणी में हो सकता है. यानी 2030 तक दुनियाभर में दस में से एक मोटा बच्चा भारत में है.
मोटापे से लड़ने और इसके आर्थिक प्रभावों को कम करने की तैयारी के सूचकांक के मामले में भारत 183 देशों में 99वें पायदान पर है. अर्थव्यवस्था पर मोटापे का प्रभाव साल 2019 में 23 अरब डॉलर है जो 2060 तक बढ़कर 479 अरब डॉलर हो जाएगा.
डॉ. अर्जन डे वाग्त कहते हैं, "हम भारत में बच्चों में मोटापे की एक बेहद गंभीर समस्या देख रहे हैं. मोटापा अक्सर बच्चों में शुरू होता है और मोटे बच्चे मोटे वयस्क बनते हैं."
ये स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का एक बड़ा कारण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शरीर में चर्बी अधिक होने से गैर-संक्रामक बीमारियां के फैलने का ख़तरा बढ़ जाता है. इनमें 13 तरह के कैंसर, टाइप-2 डाइबिटीज़, दिल और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां भी शामिल हैं. इसकी वजह से समय से पहले ही लोगों की मौत हो जाती है. बीते साल दुनियाभर में 28 लाख मौतें मोटापे की वजह से हुईं.
पिछले कुछ सालों में वयस्कों में मोटापे के मामले में भारत पहले ही दुनिया के पांच शीर्ष देशों में शामिल हो चुका है. 2016 में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक भारत में क़रीब 13.5 करोड़ लोगों का या तो वज़न अधिक था या वो मोटापे का शिकार थे. ये संख्या लगातार बढ़ रही है.
डॉ. डे वाग्त कहते हैं कि "भारत में अभी 5 साल से कम उम्र के 36 प्रतिशत बच्चे का क़द अभी भी उम्र के हिसाब से छोटा है. कुपोषण के ख़िलाफ़ हम जितनी बढ़त हासिल कर रहे हैं उतना ही नुक़सान अधिक पोषण पहुंचा रहा है."
"एक ही समय में लोगों में कुपोषण की भी समय है और अधिक पोषण की भी. वज़न बढ़ना और मोटापा दोनों की ही वजह ज़रूरत से अधिक पोषण लेना है. लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि हर किसी को उतना पोषण मिल पा रहा है जितने की उन्हें ज़रूरत है."
वो कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या ये है कि लोगों को पोषण के बारे में पूरी जानकारी नहीं है. एक तरह की पोषण अशिक्षा है.
"अगर बच्चों को संतुलित आहार दिया जाए जिसमें कार्बोहाइड्रेट भी हों, प्रोटीन, विटामिन, फल और सब्ज़ियां सब हों तो इससे कुपोषण और अधिक पोषण दोनों की समस्या का समाधान हो जाएगा. लेकिन लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है कि क्या खाना सही होता है, लोग पेट भरने के लिए खाते हैं, वो अधिक कार्बोहाइड्रेट ले रहे हैं या आसानी से मिल जाने वाला भोजन खा रहे हैं."
2030 के बाद दुनिया का हर दसवां मोटा बच्चा भारत में होगा
डॉ. डे वाग्त कहते हैं कि डाटा के मुताबिक बच्चों में मोटापा हर सामाजिक और आर्थिक वर्ग की समस्या है, लेकिन ये शहरी अमीरों में अधिक है जहां बच्चों को अधिक फैट, शुगर और नमक वाली डाइट दी जाती है.
2019 में मैक्स हेल्थकेयर ने दिल्ली और उसके आसपास के उप-नगरों में एक सर्वे किया था. इसमें पता चला था कि 40 प्रतिशत बच्चे (5-9 वर्ष), किशोर (10-14 वर्ष) और एडलेसेंट (15-17 वर्ष) या तो मोटे थे या उनका वजन अधिक था.
डॉ. चौबे कहते हैं, "किशोर देर से सोते हैं और आमतौर पर रात में खाना खाते हैं जिसमें से अधिकतर स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाने वाले स्नैक होते हैं."
"देर रात में खाने के बाद वो सो जाते हैं और देर से उठते हैं. वो आलसी और सुस्त रहते हैं. इसका मतलब है उनका शरीर अधिक ऊर्जा नहीं खपा पाता है. इसके अलावा आजकल बच्चे खेलने या बाहर दौड़ने के बजाए अधिक समय कंप्यूटर और मोबाइल पर बिताते हैं. इससे भी वो सुस्त हो रहे हैं."
वो चेताते हैं हुए कहते हैं, "मोटापे से सिर्फ शरीर और स्वास्थ्य ही प्रभावित नहीं होता है बल्कि हमारे जीवन का हर पहलू इससे प्रभावित होता है. इसमें मानसिक और सामाजिक नज़रिया भी शामिल है. मोटे बच्चे अक्सर पूर्वाग्रहों का सामना करते हैं और कई बार अकेले पड़ जाते हैं."
ओबेसिटी फ़ाउनडेशन ऑफ इंडिया के संस्थापक और दक्षिण भारतीय शहर चेन्नई में सर्जन डॉ. रविंद्रन कुमारन कहते हैं कि अगर बच्चों के मामले में अभी दख़ल नहीं दिया गया तो हम देश में मोटापे की समस्या का कभी समाधान नहीं कर पाएंगे.
वो कहते हैं, "अगर आप आधे घंटे के लिए भी टीवी देखें तो आपको जंक फूड के कई विज्ञापन दिख जाएंगे. कोल्ड ड्रिंक को बढ़ाकर पेश करने वाले विज्ञापन भी आते हैं. स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंचाने वाले जंक फुड के बारे में जो लगातार ग़लत संदेश दिए जाते हैं वो रुकने चाहिए. और ऐसा सिर्फ़ सरकार ही कर सकती है."
वो ये भी कहते हैं कि मोटापे की संख्या से निबटने के लिए हमें बड़ी संख्या में बच्चों को बाहर निकालना होगा.
"एक राष्ट्र के तौर पर हम शारीरिक स्वास्थ्य में निवेश नहीं कर रहे हैं. हमारे शहरों में फुटपाथ नहीं हैं. ना ही सुरक्षित साइकिल ट्रैक हैं और बहुत कम खेल के मैदान हैं जहां बच्चे खेल सकते हैं."
युवाओं में खेल को बढ़ावा देने वाली संस्था स्पोर्ट्स विलेज इस समस्या का समाधान करने की कोशिश कर रही है. इसके संस्थापक और सीईओ सुमील मजूमदार ने बीबीसी से कहा, "हमारे देश में स्कूल एकमात्र स्थान होते हैं जो बच्चों को सुरक्षित खेल का मैदान देते हैं. ऐसे में स्कूलों को मोटापे से लड़ने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए."
2,54000 बच्चों पर किए गए एक सर्वे से पता चला है कि हर दो में से एक बच्चे का बीएमआई स्वस्थ नहीं है. बड़ी संख्या में बच्चों में लचीलापन नहीं है. यह नहीं उनकी पेट या शरीर के कोर में ताक़त कम थी. यही नहीं शरीर के ऊपरी और निचले हिस्से की ताक़त के मामले में भी उनका प्रदर्शन ख़राब था.
मजूमदार कहते हैं, "ये सिर्फ़ नीतिगत समस्या नहीं है. सभी स्कूलों में शारीरिक शिक्षा की क्लास होती है. लेकिन सिर्फ़ उन बच्चों पर ही ध्यान दिया जाता है जो अच्छे होते हैं. ऐसे में जो बच्चे खेल में रूचि नहीं लेते हैं उन्हें इन क्लास में मज़ा नहीं आता है."
"हम ये मानते हैं कि जिस तरह स्कूल में बच्चे हर विषय का मूल ज्ञान हासिल करते हैं उसी तरह उन्हें शरीर को फिट रखने के बारे में भी सिखाना चाहिए."
"कई मामलों में हमने देखे है कि शारीरिक फिटनेस में 5 से 17 प्रतिशत तक सुधार हुआ. हम अधिक संख्या में लड़कियों को खेलने के लिए भी प्रेरित कर पाए हैं. मुझे लगता है कि खेलने से सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है."
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