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Surendra Dubey Death: कौन थे हास्य कवि पद्मश्री सुरेंद्र दुबे? छत्तीसगढ़ की आवाज जिसने ठहाके के साथ सच बोला

Padmashree Surendra Dubey Passed Away: गुदगुदाती बातों के बीच तल्ख सच्चाइयों का आईना दिखाने वाले,छत्तीसगढ़ी हास्य साहित्य के शिखर पुरुष, पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे अब हमारे बीच नहीं हैं। 27 जून 2025 की सुबह रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

व्यंग्य और हास्य को जन-जन तक पहुंचाने वाले इस विलक्षण रचनाकार की अंतिम यात्रा उनके निवास से रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट तक निकली। पूरे प्रदेश और देश के साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर फैल गई।

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Surendra Dubey एक डॉक्टर, जो कविता से करता था इलाज

8 जनवरी 1953 को बेमेतरा (तत्कालीन दुर्ग ज़िला) में जन्मे डॉ. सुरेंद्र दुबे मूलतः आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। परंतु उनकी पहचान देश और सात समुंदर पार, एक ऐसे कवि के रूप में बनी, जो न केवल हँसाता था, बल्कि सोचने को विवश भी करता था। उनकी कविताएं जीवन की विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक पाखंड पर तंज कसते हुए भी गहरी मानवीय संवेदना से जुड़ी रहती थीं।

व्यंग्य और हास्य को मिली प्रसिद्धि

डॉ. दुबे की प्रस्तुति शैली, उनका आत्मविश्वास, और छत्तीसगढ़ी भाषा में रची-बसी उनकी व्यंग्यपूर्ण कविताएं श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। उन्होंने देश-विदेश के सैकड़ों मंचों, टीवी शो और अंतरराष्ट्रीय काव्य संध्याओं में शिरकत कर न केवल अपने हास्य का लोहा मनवाया, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा को भी वैश्विक पहचान दिलाई। वे 1980 में पहली बार अमेरिका गए थे और 11 देशों में 52 शहरों में कविता पाठ किया। उन्होंने 5 चर्चित पुस्तकें लिखीं इतना ही नहीं उनकी कविताएं दूरदर्शन और लोकल चैनलों पर प्रसारित होती रहीं।

सम्मान और पुरस्कारों की सूची भी मुस्कुराती है

  • वर्ष 2010 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
  • 2008 में 'काका हाथरसी हास्य रत्न' पुरस्कार मिला।
  • 2019 में वाशिंगटन (अमेरिका) में 'हास्य शिरोमणि सम्मान' से नवाजे गए।
  • शिकागो में उन्हें 'छत्तीसगढ़ रत्न सम्मान' प्राप्त हुआ।

राजनीति से भी नहीं रहे अछूते, व्यंग्य बना हथियार

डॉ. दुबे ने वर्ष 2018 में भाजपा का दामन थामा, जब गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ में मौजूद थे। इसके बाद उनके और कांग्रेस के बीच सांस्कृतिक दूरी बढ़ गई। सरकारी आयोजनों और मंचों से उन्हें वंचित रखा गया। मगर डॉ. दुबे ने इस उपेक्षा को भी अपने व्यंग्य का हथियार बनाया। कई बार मंच से वे मुस्कुराते हुए कहते थे, "सरकारी सांस्कृतिक आयोजनों में हमें जगह नहीं मिलती, लेकिन हम ठहाकों के रास्ते अपनी जगह बना ही लेते हैं!"

मौत की अफवाह पर कहा 'टाइगर अभी ज़िंदा है'

2018 में राजस्थान के एक अन्य कवि सुरेंद्र दुबे की मृत्यु की खबर वायरल हो गई थी। इंटरनेट पर ये भ्रम फैल गया कि छत्तीसगढ़ के सुरेंद्र दुबे नहीं रहे। इस पर उन्होंने एक जोरदार कविता लिखी, जिसकी ये पंक्तियाँ खूब मशहूर हुईं,

"मेरे दरवाजे पर लोग आ गए,
यह कहते हुए की दुबे जी निपट गे भैया,
बहुत हंसात रिहीस...
मैं निकला बोला - अरे चुप! यह हास्य का कोकड़ा है,
ठहाके का परिंदा है,
टेंशन में मत रहना बाबू, टाइगर अभी जिंदा है!"

'एला कहिथे छत्तीसगढ़' से लेकर 'राम भक्त जयघोष करो' तक उनकी कविताएं आम आदमी की ज़ुबान पर थीं। खासकर छत्तीसगढ़ी शैली में कही गई पंक्तियाँ:

  • "एला कहिथे छत्तीसगढ़..."
  • "दु के पहाड़ा ल चार बार पढ़..."
  • "टाइगर अभी जिंदा है..."
  • "पीएम मोदी के आने से फर्क पड़ा है..."

अयोध्या राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा पर भी उन्होंने एक भावपूर्ण कविता लिखी थी:

"पाँच अगस्त का सूरज राघव को लाने वाला है,
राम भक्त जयघोष करो, मंदिर बनने वाला है..."

देश ने शोक जताया

डॉ. दुबे के निधन पर पूरे साहित्यिक जगत और राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने उन्हें "छत्तीसगढ़ी साहित्य एवं हास्य काव्य का शिखर पुरुष" कहा। राज्यपाल रामेन डेका, कवि कुमार विश्वास, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, गृहमंत्री विजय शर्मा, मीर अली मीर और कई अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तियों ने गहरा शोक प्रकट किया।

उनके परिवार में पत्नी शशि दुबे, एक पुत्र और एक पुत्री हैं। मगर साहित्यिक परिवार कहीं बड़ा है - उसमें लाखों वे पाठक और श्रोता हैं जो उनकी कविताओं में मुस्कुराते थे, और आज उनकी याद में आँसू बहा रहे हैं।सडॉ. सुरेंद्र दुबे न केवल एक कवि थे, वे हास्य के माध्यम से गहरी बात कहने वाले चिंतक, लोकभाषा के सच्चे सेवक और संवेदनाओं के सच्चे प्रतिनिधि थे। उनके शब्द हँसाते भी थे, सोचने पर मजबूर भी करते थे।

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