Chandigarh Lok Sabha Chunav: चंडीगढ़ लोकसभा सीट पर इस बार क्यों बदल गया समीकरण?
Chandigarh Lok Sabha Election: चंडीगढ़ में इस बार के लोकसभा चुनाव में कई सारे समीकरण बदले हुए हैं। बीजेपी ने अपनी दो बार की सांसद किरण खेर को मौका नहीं दिया है तो कांग्रेस ने भी अपने दिग्गज पवन कुमार बंसल का पत्ता साफ कर दिया है। ऐसे में इस सीट पर इस बार का चुनाव बहुत ही रोमांचक हो गया है।
पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ एक केंद्र शासित प्रदेश है। यहां लोकसभा की एक ही सीट है। 2014 और 2019 दोनों ही चुनाव में भाजपा की किरण खेर ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी दिग्गज पवन बंसल को हराया है।

चंडीगढ़ में बीजेपी,कांग्रेस और अकाली दल में मुख्य मुकाबला
इस बार बीजेपी ने अपने स्थानीय दिग्गज नेता संजय टंडन को मौका दिया है तो कांग्रेस ने पंजाब की आनंदपुर साहिब सीट से मौजूदा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी पर दांव लगाया है। वहीं अकाली दल (एसएडी) ने हरदीप सिंह बुटरेला को उतारा है।
केंद्र में जिसकी सरकार, उसे ही चुनता है चंडीगढ़!
'सिटी ब्यूटीफुल' के नाम से दुनिया भर में मशहूर चंडीगढ़ लोकसभा के पिछले कुछ नतीजों पर गौर करें तो यहां के मतदाताओं ने उन्हें ही मौका दिया है, जिनकी केंद्र में सरकार बनी है। किरण खेर से पहले बंसल यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
चंडीगढ़ में इस बार कुल 6,47,291 मतदाता
चंडीगढ़ में सातवें चरण यानी 1 जून को चुनाव है। 114 वर्ग किलोमीटर में फैले चंडीगढ़ में इस बार कुल 6,47,291 मतदाता हैं। इनमें 3,35,060 पुरुष और 3,12,198 महिला मतदाता हैं। 33 थर्ड जेंडर वोटर भी हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 15,006 फर्स्ट टाइम वोटर हैं।
अगर आबादी के हिसाब से देखें तो चंडीगढ़ की 97% जनसंख्या शहरी है और मात्र 3% ही ग्रामीण आबादी है। इस केंद्र शासित प्रदेश में रहने वाले 75 से 80% लोग हिंदू और 15 से 20% सिख हैं। मुस्लिम और ईसाई जनसंख्या 5% से कम है।
भाजपा के लिए कई वजहों से बढ़ी हैं चुनौतियां
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के इंडिया ब्लॉक में शामिल होने की वजह से इस बार यहां भाजपा का समीकरण दबाव में है। इससे भी बढ़कर चंडीगड़ मेयर चुनाव में हुई फजीहत से भी पार्टी की छवि पर चुनावों में बट्टा लगने की आशंका बढ़ी है। लेकिन, संजय टंडन को उतारकर भाजपा ने कई समीकरण एक साथ साधने की कोशिश की है।
मजबूत लोकल चेहरा उतारकर बीजेपी ने चला है बड़ा दांव
टंडन सबसे लंबे समय तक प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष रहे हैं और उनके कार्यकाल में ही भाजपा ने लगातार दो लोकसभा और नगर निगम चुनाव जीते हैं। वे भाजपा और आरएससए के दिग्गज नेता बलराम टंडन के बेटे हैं।
कांग्रेस के लिए भी चंडीगढ़ में आसान नहीं है रास्ता
हालांकि, मनीष तिवारी को टिकट देने से कांग्रेस यहां आसानी से बाजी मार लेगी, इसकी संभावना कतई नहीं दिख रही। बंसल का टिकट कटने से जहां पार्टी में खुलकर विरोध हो चुका है। वहीं, बार-बार चुनाव जीतने के बाद सीट बदलने वाला दांव तिवारी के लिए यहां शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
तिवारी 2009 और 2014 में लुधियाना से जीते और 2019 में आनंदपुर साहिब से चुने गए। लेकिन, अब चंडीगढ़ से चुनाव लड़ने को भाजपा मुद्दा बना रही है। न्यूज एजेंसी पीटीआई से बीजेपी प्रत्याशी ने कहा, 'अब वह चंडीगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं, 2029 में वे किसी चुनाव क्षेत्र में शिफ्ट होंगे?'
उनका आरोप है कि उनके पास अपने क्षेत्र के मतदाताओं को दिखाने के लिए कोई काम नहीं है, इसीलिए उन्हें अबकी बार चंडीगढ़ से किस्मत आजमानी पड़ रही है।
अकाली दल के उम्मीदवार की वजह से बीजेपी को मुश्किल?
चंडीगढ़ के चुनाव मैदान में अकाली दल के हरदीप सिंह बुटरेला चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पिछली बार तक अकाली दल भाजपा की सहयोगी थी। इस बार बीजेपी के लिए यह भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।












Click it and Unblock the Notifications