Jabalpur Accident: बरगी डैम त्रासदी में ज्यादा जिम्मेदार कौन? सरकार या आप? जिम्मेदार क्यों नहीं देते जवाब?

Jabalpur Accident: ये जो तस्वीर आप अपनी स्क्रीन पर देख रहे हैं, इसे ज़रा गौर से देखिए। ये महज़ एक तस्वीर नहीं है, ये आज के भारत का क्रूर आइना है। जबलपुर का बरगी डैम, जहां की लहरें आज कलकल की आवाज़ नहीं कर रहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा मार रही हैं। एक मां और उसका बच्चा पानी में बेजान तैरते हुए, ये मंजर देखकर क्या आपकी आत्मा कांपी? या फिर आप भी उस 'सिस्टम' का हिस्सा बन चुके हैं जिसकी संवेदनाएं मर चुकी हैं?

शून्य से नीचे की कीमत

आज के दौर में एक आम इंसान की ज़िंदगी की कीमत क्या है? अगर शून्य से नीचे कोई पैमाना होता, तो शायद वही हमारे जीवन का मूल्य होता। सरकारों के लिए आप केवल एक वोट हैं और जब चुनाव आते हैं, तो नेता आपके घर की दहलीज तक झुक जाते हैं। लेकिन जब सुरक्षा की बात आती है, जब बुनियादी सुविधाओं की बात आती है, तो यही तंत्र शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर दबा लेता है। इससे पहले इंदौर में गंदा पानी पीने से 25 से ज्यादा लोग मारे गए लेकिन सरकार की वही टाला-मटोली अभी भी जारी है।

Jabalpur Accident

जी-हुज़ूरी की कीमत चुकाएंगे आप और हम

लेकिन साहब, सिर्फ़ सरकारों को दोष देकर हम और आप बच नहीं सकते। इस बर्बादी में उतना ही हाथ उन 'लोगों' का भी है, जिन्होंने सवाल पूछना छोड़ दिया है। जो सुबह-शाम बस हुक्मरानों की आरती उतारने में मशगूल हैं।

सत्ता से सवाल पूछना जिम्मेदारी नहीं, नागरिकता का धर्म भी है। मगर अफ़सोस, आज का नागरिक 'जी-हुज़ूरी' को ही राष्ट्रवाद समझ बैठा है और सत्ता से सवाल को देशद्रोह घोषित कर देता है। याद रखिएगा, जब आप सत्ता से सवाल करना बंद कर देते हैं, तो व्यवस्था इतनी निरंकुश हो जाती है कि उसे बरगी डैम की लहरों में बहती इन लाशों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

आने वाली नस्लों का हिसाब

आज जो आप चुप्पी साधे बैठे हैं, या जो आप चापलूसी का चश्मा पहनकर इस बदहाली को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, उसकी सजा आपकी आने वाली पीढ़ी ज़रूर भुगतेगी। जब कल आपका बच्चा इसी सिस्टम की भेंट चढ़ेगा, तब शायद आपको एहसास होगा कि 'सब चंगा सी' का नारा कितना खोखला था। सत्ता के गलियारों में बैठे लोग तो अपना पेट भर लेंगे, आपको धर्म और नफ़रत की घुट्टी पिलाकर आपस में लड़ा भी देंगे, लेकिन क्या वो आपको सुरक्षा दे पाएंगे? क्या वो इन बेगुनाह मौतों का हिसाब देंगे?

सोचिएगा ज़रूर, क्योंकि अगर आज नहीं बोले, तो कल बोलने के लिए शायद आप खुद भी न बचें।

इस आर्टिकल में लिखे शब्द लेखक के अपने निजी विचार हैं, जिनसे संस्थान कोई लेना-देना नहीं है। आपकी इस मामले पर क्या राय है हमें कमेंट में जरूर बताएं।

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