सेंटर की रिपोर्ट में सामने आया गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज का सच
लखनऊ। गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में पिछले 12 दिनों में 75 से जादा बच्चों की मौते हो चुकी हैं। केंद्र सरकार ने मामले का जायजा लेने के लिए एक तीन सदस्यीय टीम भेजी थी जिसने अपनी रिपोर्ट में अस्पताल की दयनीय हालत पर कई सवाल उठाए हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को दी अपनी रिपोर्ट में इस एक्सपर्ट टीम ने बताया की अस्पताल में प्रशिक्षित कर्मचारियों और नर्सों की भारी किल्लत है। कुल 12 में से 8 रेजिडेंटो के पद खाली हैं और 31 नर्सों में से सिर्फ़ 3 नर्सें ही नवजात बच्चों की देख रेख करने के लिए प्रशिक्षण मिला हुआ है।


लोगों को दी जाती हैं घटिया वस्तुएं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया की गरीब बच्चों के माता-पिता को मजबूरन खराब गुणवत्ता वाली वस्तुएं खरीदनी पड़ती हैं और अस्पताल को साफ-सुथरा रखने के लिए मूलभूत सिद्धांतों का ध्यान भी नहीं रखा जाता है। इस रिपोर्ट में बताया गया की अस्पताल में मरने वाले बच्चों में 50 प्रतिशत बच्चे तो वहां भर्ती होने के 48 घंटों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं। इससे अस्पताल के इलाज के निम्न स्तर और उसके प्रशासन की लापरवाही जाहिर होती है।

डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं
इस टीम ने 13 अगस्त को अस्पताल का दौरा किया था जिसके बाद 17 अगस्त को इसने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सीनियर डॉक्टरों के पदों के खाली होने की वजह से मरीजों को कम प्रशिक्षित जूनियर डॉक्टरों से अपना इलाज कराना पड़ता है। इनमें से ज्यादातर डॉक्टर तो अभी अपनी पढाई करते हुए इलाज करना सीख रहे हैं जिनको अपने रोज की ड्यूटी के अलावा भी काफी समय तक अस्पताल में रुकना पड़ता है।

मजबूरन लोगों को बाहर से दवा खरीदनी पड़ रही
केंद्रीय टीम ने पाया की बीमार बच्चों के परिजनों को अपनी जेब से ही ऐसी वस्तुएं खरीदनी पड़ती हैं जोकि इन्सेफिलाइटिस के मरीजों में अस्पताल को मुफ्त में उपलब्ध करानी होती हैं। इसके अलावा अस्पताल में इस बीमारी के इलाज के लिए ज़रूरी उपकरणों की भी भारी कमी पाई गई है। इन सब वजहों के कारण ही हर साल इन दिनों बच्चों की मौत की तादाद इतनी बढ़ जाती है।

पिछली साल की तुलना में मौत कम
रिपोर्ट ने बताया की 1 अगस्त से लेकर 6 अगस्त तक मरने वाले बच्चों में और 7 अगस्त से लेकर 12 अगस्त तक जबकि ऑक्सीजन की कमी होने की बात सामने आई थी, मरने वाले बच्चों में कोई खास अंतर नहीं है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया की इन्सेफिलाइटिस के कारण पिछले साल के मुकाबले इस साल अब तक कम बच्चों की मृत्यु देखने को मिली है।












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