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Budget Explainer: कमाई ₹36.5L Cr और खर्चा ₹53.5L Cr, आखिर 17 लाख करोड़ का घाटा कैसे पूरा करेगी सरकार?

Budget 2026 Fiscal Deficit Explained: बजट का गणित सुनकर अक्सर सिर घूमने लगता है, लेकिन इसे अपनी सरल भाषा में समझें तो यह देश की 'पॉकेट मनी' और 'खर्चे' का हिसाब है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2026 को संसद में देश का आम बजट पेश करते हुए कहा कि, ₹53.5L Cr खर्च करेगी और कमाएगी सिर्फ ₹36.5L Cr, तो सीधा सा मतलब है कि ₹17L Cr की कमी है।

इसी कमी को 'राजकोषीय घाटा' (Fiscal Deficit) कहते हैं। इस भारी-भरकम अंतर का सीधा असर आपकी जेब, मार्केट और बैंकों पर पड़ता है। आइए जानते हैं कि आखिर ये पैसा आएगा कहां से और बैंकों में गिरावट क्यों आई।

Budget 2026 Fiscal Deficit Explained

How fiscal deficit is funded : सरकारी बॉन्ड्स का सहारा

सरकार इस ₹17L Cr के विशाल घाटे को भरने के लिए सबसे ज्यादा बाजार से उधार लेती है, जिसे 'मार्केट बॉरोइंग' कहा जाता है। इसके लिए सरकार 'सरकारी प्रतिभूतियां' या G-Secs (Government Securities) जारी करती है। इन्हें बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और बड़े म्यूचुअल फंड्स खरीदते हैं। एक तरह से यह देश पर चढ़ा वह कर्ज है, जिसे भविष्य में भारी ब्याज के साथ चुकाना होता है। यह उधारी जितनी अधिक होगी, सरकार के ब्याज का बोझ उतना ही बढ़ता जाएगा।

Government borrowing budget 2026: छोटी बचत योजनाओं का बड़ा योगदान

पैसे जुटाने का एक बहुत ही भरोसेमंद जरिया आपकी वह मेहनत की कमाई है, जो आप PPF, सुकन्या समृद्धि, पोस्ट ऑफिस या NSC जैसी 'स्मॉल सेविंग्स' में निवेश करते हैं। सरकार इन योजनाओं में जमा हुए 'पब्लिक प्रोविडेंट फंड' का इस्तेमाल अपने बजट घाटे को कम करने के लिए करती है। यह सरकार के लिए एक आंतरिक कर्ज की तरह है, जो बाहरी बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहता है और खर्चों को मैनेज करने में बड़ी मदद करता है।

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विनिवेश: सरकारी संपत्तियों की बिक्री

जब कमाई और खर्चे के बीच का अंतर (Deficit) बहुत बढ़ जाता है, तब सरकार अपनी कंपनियों (PSUs) में अपनी हिस्सेदारी बेचकर फंड जुटाती है। इसे 'डिसइन्वेस्टमेंट' या विनिवेश कहा जाता है। जैसे LIC, IDBI बैंक या अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के शेयर बाजार में बेचकर सरकार एकमुश्त मोटी रकम हासिल करती है। यह कदम घर के किसी हिस्से को बेचकर कर्ज चुकाने जैसा है, जिससे सरकार को अपनी विकास योजनाओं के लिए तुरंत नकद पैसा मिल जाता है।RBI और बैंकों से मिलने वाला लाभांश

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हर साल अपने मुनाफे का एक हिस्सा सरकार को देते हैं, जिसे 'डिविडेंड' या लाभांश कहा जाता है। बजट के खजाने को भरने में यह राशि बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह बिना किसी कर्ज के मिलने वाली शुद्ध आय होती है।

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IMF World Bank loans India: विदेशी संस्थाओं और IMF से कर्ज

जब घरेलू बाजार से जरूरत पूरी नहीं होती, तो सरकार World Bank, IMF और Asian Development Bank (ADB) जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का रुख करती है। इसे 'एक्सटर्नल डेट' कहा जाता है। अक्सर ये कर्ज इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और जलवायु सुधार जैसे खास प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय के लिए और कम ब्याज दरों पर मिलते हैं। हालांकि, डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत इस कर्ज को महंगा बना सकती है, इसलिए सरकार विदेशी कर्ज को अपनी जीडीपी के एक छोटे हिस्से तक ही सीमित रखती है।

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ब्याज का बोझ: पुराने कर्ज की भारी कीमत

बजट का एक कड़वा सच यह है कि सरकार की कुल कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा विकास के बजाय पुराने कर्ज चुकाने में चला जाता है। वर्तमान में, सरकार के कुल खर्च का लगभग 20% हिस्सा केवल ब्याज (Interest Payment) देने में खर्च हो रहा है। यह पैसा उसी ₹17L Cr जैसे पिछले कई सालों के 'राजकोषीय घाटे' को भरने के लिए लिए गए लोन का नतीजा है। सरल शब्दों में कहें तो, यदि सरकार ₹100 खर्च करती है, तो उसमें से ₹20 सीधे ब्याज के रूप में कट जाते हैं, जो इंफ्रास्ट्रक्चर या शिक्षा जैसे जरूरी क्षेत्रों में निवेश होने से बच जाते हैं।

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