जन्म दिवस विशेष : और ‘जरूरत’ बन गए नरेन्द्र मोदी

अहमदाबाद। नरेन्द्र मोदी के नाम से पहले आज कोई पद लिखने की जरूरत नहीं रह गई है। लिखने वाले बहुत कुछ लिख रहे हैं। कट्टर समर्थक उन्हें सीधे प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं, तो विवेकशील समर्थक उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं और आम समर्थकों के लिए केवल मोदी सम्बोधन ही काफी हो जाता है। रही बात विरोधियों की, तो मोदी नाम से पहले ‘गुजरात के मुख्यमंत्री' लिखना उनकी संवैधानिक विवशता है।

आज इस नाम को 63 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस नाम की गूंज आज भारत की फिजाओं में है और इस देश के ज्ञात इतिहास में शायद ही कोई नाम इतनी शिद्दत से गूंजा होगा। इस नाम का गुणगान करने वालों का हुजूम है, तो महिमामंडन के लिए भी पूरी टोली तैयार है, तो दूसरी तरफ निंदकों की भी कोई कमी नहीं है। इतने द्वंद्वों के बावजूद आज यह नाम केवल एक व्यक्ति या व्यक्तित्व का परिचायक नहीं रह गया है।

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गुजरात में उत्तरी हिस्से के मेहसाणा जिले में वडनगर जैसे छोटे-से कस्बे में 17 सितम्बर, 1950 को अवतरित हुआ वह बीज आज वटवृक्ष की तरह व्यापक होने को आतुर है, परंतु वामन से विराट की उसकी यह यात्रा में सबसे अहम योगदान किसी का है, तो वह है नफरत। नफरत की राजनीति मोदी को खूब रास आई और एक वक्त विरोधी दलों की नफरत ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर आलोचनाओं से घिरे नरेन्द्र मोदी आज जरूरत बन गए हैं और उससे भी बढ़ कर कहें तो राष्ट्रीय जरूरत बन गए हैं।

विकल्प नहीं, संकल्प
शुरुआत करते हैं उसी 4 अक्टूबर, 2001 से। यह वह दिन था, जब नरेन्द्र मोदी का चुनावी और सत्ता की राजनीति में पदार्पण हुआ। भाजपा हाईकमान ने गुजरात में जनवरी-2001 में आए भूकम्प के बाद पुनर्वास कार्यों में विफलता के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को हटाने और मोदी को विकल्प के रूप में मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। 4 अक्टूबर, 2001 को गुजरात भाजपा विधायक दल की बैठक हुई और मोदी नेता चुने गए। 7 अक्टूबर, 2001 को मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। केशुभाई पटेल के विकल्प के रूप में सत्तारूढ़ हुए नरेन्द्र मोदी देखते ही देखते संकल्प बन गए और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। अपने राजनीतिक जीवन का पहला चुनाव राजकोट-2 विधानसभा क्षेत्र से लड़ा। इस उप चुनाव में नरेन्द्र मोदी विजयी हुए और जीत का यह सिलसिला फिर कभी थमा नहीं।

नफरत के बीज
गोधरा कांड और उसके बाद भड़के दंगों ने नरेन्द्र मोदी की छवि को इस कदर धूमिल कर दिया कि 27 फरवरी, 2002 के बाद हर दिन मोदी पर कीचड़ उछालना फैशन बन गया। यहीं से शुरू हुई मोदी के प्रति नफरत की राजनीति। क्या कांग्रेस और क्या वामपंथी, क्या समाजवादी और क्या छुटभैया नेता, हर किसी ने मोदी को निशाने पर लिया। राजनीति से बाहर भी एक पूरी टोली नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नफरत भरे व्यंग्य बाण छोड़ती रही। नफरत की इस आंधी के बीच नरेन्द्र मोदी अविचलित और अडिग खड़े रहे। गुजरात के दंगों को राष्ट्रीय शर्म बताने वालों को जवाब दिया गुजरात की ही जनता ने और दंगों के बाद दिसम्बर-2002 में हुए विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी पहली बार दो तिहाई बहुमत के साथ पुनः मुख्यमंत्री बने।

वाजपेयी भी मुखर
राष्ट्रीय राजनीति में भले ही गुजरात के दंगों को लेकर भाजपा को विरोधियों की गालियाँ खानी पड़ी हों, लेकिन गुजरात में ये दंगे नरेन्द्र मोदी के लिए आशीर्वाद बने। 2002 में चुनावी जीत के बाद भी मोदी विरोधियों की बोलती बंद नहीं हुई और उन पर लगातार हमले होते रहे। नफरत की जो राजनीति नरेन्द्र मोदी ने झेली, उसे शायद ही कोई झेल सकता था। दंगों को लेकर उन्हें कटघरे में खड़ा करने को हर कोई आतुर रहता। एक वक्त ऐसा भी आ गया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को राज धर्म का पालन करने की सीख दे डाली। इतना ही नहीं वाजपेयी उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाने की पैरवी तक कर डाली, परंतु फिर भी मोदी विचलित नहीं हुए।

विकास की राह
गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना की चिनगारी किसी भी वक्त भड़क उठती। नरेन्द्र मोदी ने अपने दामन पर लगे इस दाग पर कभी कोई खुलासा नहीं किया और न ही किसी आलोचना का शब्दों से जवाब दिया। हर शब्द के तीर को वे सीने में संजोते गए और उसकी काट तैयार करते गए। गुजरात दंगों के बाद गुजरात ही नहीं, बल्कि देश के अनेक कट्टरवादी हिन्दुओं के हृदय सम्राट बने नरेन्द्र मोदी में अपनी जहाँ अपनी इस छवि को बनाए रखने की तड़प थी, वहीं इस छवि से इतर एक ऐसी छवि बनाने की आतुरता भी थी, जिसमें कट्टर हिन्दुत्व की बजाए सर्वसमावेशी हिन्दुत्व की झलक दिखे और मोदी ने इसकी शुरुआत की वाइब्रेंट गुजरात के मंत्र से। पहली बार राज्य में वैश्विक निवेशक सम्मेलन आयोजित किया गया और यहीं से पकड़ी नरेन्द्र मोदी ने विकास की राह। चार महीनों तक दंगों की आग में झुलसने वाला गुजरात अपने स्वभाव के मुताबिक अपनी व्यावसायिकता में फिर से व्यस्त हो गया। दंगों की झुलसन को भुला कर गुजरात आगे बढ़ने लगा और मोदी ने गुजरात की इसी विकासशीलता को अपनी शक्ति बनाया। एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर नफरत की तलवारें उठती रहीं और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी गांधीनगर में बैठे-बैठे नफरत की इस तलवार को बेधार करने में जुटे रहे। इस तलवार को बेधार करने का खूब शानदार शस्त्र अपनाया मोदी ने। यह शस्त्र था विकास और हिन्दुत्व की अवधारणा को बनाए रखते हुए मोदी ने विकास को तरजीह दी। मोदी को जिस सरकार का इस्तेमाल कर गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया, मोदी ने उसी सरकार का इस्तेमाल किया आरोपों की धार को बेधार करने में।

सबसे कठिन काल
वर्ष 2004 नरेन्द्र मोदी के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन काल कहा जा सकता है। यह वो समय था, जब नरेन्द्र मोदी चहुँओर से घिरे दिखाई दिए। दंगों को लेकर उन पर आरोपों की वर्षा थमी नहीं थी। उस पर लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार का पतन हुआ। चौबीस दलों वाले एनडीए के कई घटक दलों ने चुनावों में एनडीए की हार के लिए नरेन्द्र मोदी और गुजरात दंगों को जिम्मेदार ठहराया। हार का ठीकरा मोदी पर ही फूटा। इधर गुजरात में मुख्यमंत्री पद से हटाए गए केशुभाई पटेल खुन्नस खाए तैयार बैठे थे। मोदी के कमजोर पड़ते ही उन्होंने अपने समर्थकों के साथ सिर उठाया। ए. के. पटेल जैसे पुराने लोगों का सहयोग लेकर केशुभाई पटेल ने मोदी के खिलाफ लामबंदी शुरू की और मोदी का सिंहासन लगभग डोलने लगा। गोरधन झडफिया, सुरेश मेहता, पुरुषोत्तम सोलंकी जैसे असंतुष्टों ने मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग पुरजोर कर दी। हालाँकि इस कठिन परिस्थिति में भी मोदी अडिग रहे और हाईकमान में लालकृष्ण आडवाणी का मोदी प्रेम उनकी कुर्सी बचाता रहा।

अब अमरीकी वार
दंगों को लेकर जबर्दश्त नफरत की राजनीतिक झेल रहे नरेन्द्र मोदी ने धिक्कार पर विकास की परत चढ़ाना जारी रखा और फिर एक बार वाइब्रेंट गुजरात वैश्विक सम्मेलन का आयोजन किया। सफलता उनके कदम चूम रही थी। गुजरात में वैश्विक निवेशक सम्मेलन को विकास के सबसे बड़े स्वरूप में देखा जाने लगा। दूसरी तरफ दंगों के दाग पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थे। इस बार सात समंदर पार अमरीका से वार किया गया। अमरीका ने अचानक नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया। इसके पीछे कारण गुजरात के दंगे थे। हालाँकि अमरीका का यह फैसला सीधे-सीधे भारतीय सम्प्रभुता पर चोट था। यही कारण था कि केन्द्र में सत्तारूढ़ यूपीए सहित देश के तमाम विरोधी दलों के राजनेताओं को भी अमरीका के इस फैसले की अनिच्छा से भी आलोचना करनी पड़ी। अमरीका के इस फैसले की ये कहते हुए कड़ी निंदा की गई कि देश में किसी भी राज्य में दंगा होना भारत का आंतरिक मामला है और अमरीका किसी व्यक्ति या सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। नफरत की यह आग लगातार हवा पकड़े रही, लेकिन मोदी नफरत की इस आग को स्वोदय की ज्वाला के रूप में इस्तेमाल करते रहे। इतना ही नहीं गुजरात ने उन्हें समय-समय पर समर्थन देना जारी रखा। यही वह साल था, जब मोदी पहली बार स्थानीय निकाय चुनाव प्रचार में उतरे थे। वे जानते थे कि जिन निकाय चुनावों में हार को केशुभाई पटेल को हटाने के कारण के रूप में देखा गया, उन्हें जीतना उनके लिए भी जरूरी था।

गुजरात ने फिर दिया सम्बल
घर में ही उठापटक झेलने के बावजूद नरेन्द्र मोदी डटे रहे। उन्होंने 2002 में पाँच साल के लिए जनादेश प्राप्त किया था और वे अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रहे। दूसरी तरफ मोदी पर हमले लगातार जारी थे। विरोधियों के निशाने पर तो वे हमेशा रहते ही थे, परंतु अपनों से भी उन्हें कम नफरत नहीं मिली। उनकी ही पार्टी में उनके विरोधियों की कमी नहीं थी। इसके बावजूद मोदी डटे रहे। इस दौरान दंगों को लेकर जाँच और न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई। राजनीतिक ही नहीं, बल्कि स्वैच्छिक सेवा संगठनों यानी एनजीओ भी इस पचड़े में मोदी को खींचने के लिए कूद पड़े। तीस्ता सेतलवाड से लेकर शबनम हासमी और महेश भट्ट से लेकर शबाना आजमी तक हर किसी ने मोदी को कोसा और उन्हें कटघरे में खड़ा किया, परंतु मोदी को हर सवाल का जवाब जनता में दिखा। 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी फिर दो तिहाई बहुमत से जीते और इसके साथ ही विरोधियों के मुँह फिर एक बार बंद हो गए।

छोटे सरदार हुए असरदार
दूसरी बार चुनाव जीतने के साथ ही नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर चमकदार व्यक्तित्व के रूप में उभरने लगे। वाइब्रेंट गुजरात वैश्विक सम्मेलनों की सफलता और नफरत के नाम पर ही सही, अमरीका तक तूती बोलने लगी मोदी की। उनके कट्टर हिन्दुत्ववादी समर्थक तो देश में मौजूद थे ही, लेकिन समर्थकों की सूची में अब कुछ ऐसे लोग भी जुड़ने लगे, जो विकास के समर्थक थे। धीरे-धीरे मोदी की छवि राष्ट्रीय स्तर पर पनपने लगी। राष्ट्रीय स्तर पर उनसे केवल दंगों पर बात करने वालों को मोदी ने विकास की राजनीति करने पर मजबूर कर दिया। वे हर सवाल का जवाब विकास से देने की कोशिश करते और धीरे-धीरे मोदी गुजरात में न केवल छोटे सरदार के रूप में स्थापित होने लगे, बल्कि असरदार होकर राष्ट्रीय स्तर पर भी उभरने लगे। इस दौरान उन्होंने सद्भावना उपवास किया। उनके विरोधियों और राजनीतिक पंडितों ने भले इसे मोदी की छवि बदलने की साजिश करार दिया, परंतु मोदी कहना यही चाहते थे कि यदि विकास हुआ है, तो उसमें हर वर्ग की भागीदारी है, हर वर्ग द्वारा बनाए रखी गई शांति और सद्भाव और उसका फायदा हर वर्ग के लोगों को मिला है।

इस तरह बनती गई जरूरत
दरअसल नरेन्द्र मोदी आज राष्ट्रीय जरूरत बन गए हैं। उसके पीछे क्रमबद्ध हालात बनते जाना ही मुख्य कारण है। नरेन्द्र मोदी एक नहीं, तीन-तीन विकल्पों के रूप में उभरे हैं। सबसे पहला विकल्प वे अपनी पार्टी के भीतर बने। दूसरा विकल्प वे केन्द्र में मौजूदा सरकार से उपजी निराशा के कारण बने और तीसरा विकल्प वे मजबूत नेतृत्व देने के रूप में बने हैं। क्रमबद्ध देखा जाए, तो लोकसभा चुनाव 2009 भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को बुरी तरह मात मिली और जैसे-तैसे मनमोहन सिंह फिर एक बार प्रधानमंत्री बन गए। इस हार ने भाजपा को तितर-बितर कर दिया। इधर नरेन्द्र मोदी गुजरात में अपने विकास कार्यों के चलते लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहने लगे। कभी दंगों के नाम पर फाइल फोटो/वीडियो में दिखने वाले नरेन्द्र मोदी को विकास के नाम पर बहस करते और उलझते हुए लाइव देखा जाने लगा। उनके विकास के मंत्र देश के लोगों खासकर युवाओं को भाने लगे। एक तरफ लोकसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी में नेतृत्व शून्यता छाई हुई थी, तो दूसरी तरफ केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार का दूसरा कार्यकाल लोगों के लिए महंगाई, बेरोजगारी, सीमा सुरक्षा, घोटालों, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर पीड़ादायक बनता जा रहा था। इस प्रकार पहली जरूरत भाजपा के भीतर पैदा हुई। पार्टी को एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी, जो हर क्षेत्र के सवाल का जवाब दे सके और यह काबिलियत मोदी में कूट-कूट कर भरी हुई है। लोकप्रियता का मानदंड तो वे बहुत पहले ही प्राप्त कर चुके थे। दूसरी जरूरत केन्द्र की यूपीए सरकार से लोगों में व्याप्त निराशा ने पैदा की। लोग यह मानने लगे कि अब केन्द्र में कोई मजबूत सरकार होनी चाहिए। अब रही आखिरी और सबसे खास जरूरत प्रधानमंत्री पद की। तो लोग मनमोहन सिंह के मौन को उनकी सबसे बड़ी कमजोरी मानते हैं। वैसे भी हर देशवासी जनता है कि मनमोहन सिंह केवल कठपुतली प्रधानमंत्री हैं। देश का शासन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के हाथों में है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद पर एक मजबूत व्यक्ति की जरूरत पैदा हुई और नरेन्द्र मोदी ने अपने आपको वह जरूरत बना लिया।

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