साकिब और वैभव जैसे सितारे तराशने वाले रॉबिन सिंह की कहानी, जब जुनून के आगे फीका पड़ा मेडिकल करियर
Robin Singh: बिहार क्रिकेट लंबे समय के बाद ऊपर आया है और एक साथ कई खिलाड़ी भारत को दिए हैं। इन सबके बीच पर्दे के पीछे काम करने वाले रॉबिन सिंह ने अपने प्रदेश की प्रतिभाओं को तराशने में अहम भूमिका निभाई है, जिनके बारे में कम ही लोगों को पता होगा।
चिकित्सा की दुनिया में एक सम्मानजनक और स्थिर जीवन रॉबिन सिंह का इंतजार कर रहा था, उनको उसी फील्ड में जाना था। वह हैदराबाद में रहते थे, रॉबिन की नजरें मेडिकल की किताबों या अस्पताल की गलियारों के बजाय बिहार की उन धूल भरी पिचों पर टिकी थीं, जहां क्रिकेट संसाधनों के अभाव में भी केवल जिद के दम पर जिंदा था।

बिहार के क्रिकेट का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। एक समय था जब मुंबई और दिल्ली जैसी टीमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार करने वाली मशीन बनी हुई थीं, वहीं बिहार प्रशासनिक उलझनों और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण गुमनामी में खोया था।
महेंद्र सिंह धोनी जैसे दिग्गज को भी अपनी पहचान बनाने के लिए बिहार से झारखंड का रुख करना पड़ा था। लगभग अठारह वर्षों तक बिहार ने रणजी ट्रॉफी तक नहीं खेली। पटना या समस्तीपुर के मैदानों पर पसीना बहाने वाले युवाओं के लिए सपना देखना किसी जोखिम से कम नहीं था। या तो वे दूसरे राज्यों के लिए खेलने को मजबूर थे या फिर उनका टैलेंट दोपहर की चिलचिलाती धूप में दम तोड़ देता था।
एक कठिन चुनाव और जुनून की जीत
इसी अंधकार के बीच रॉबिन सिंह ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपने मेधावी छात्र होने के रिकॉर्ड और मेडिकल की पढ़ाई को पीछे छोड़कर कोचिंग और स्काउटिंग की दुनिया में कदम रखा। उनके पिता जो खुद एक प्रोफेसर थे, इस फैसले से बेहद आहत थे और उन्होंने लंबे समय तक रॉबिन से बात नहीं की। रॉबिन ने हैदराबाद में क्रिकेट की बारीकियों और वहां के सिस्टम को करीब से देखा था। उन्होंने समझा कि एक गली के क्रिकेटर और आईपीएल स्टार के बीच का फासला केवल पेशेवर कोचिंग और सही मार्गदर्शन का होता है।
अभावों के बीच उम्मीद की नई बुनियाद
2017 में जब वे एक पारिवारिक शादी के सिलसिले में बिहार आए, तो नियति ने उन्हें वहीं रोक लिया। बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के पास उस वक्त फंड नहीं था, फिर भी रॉबिन ने बिना वेतन के अंडर-16 टीम को कोचिंग देने की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने देखा कि बच्चों के पास क्रिकेट किट और यूनिफॉर्म तक नहीं है। हार मानने के बजाय उन्होंने अपने पुराने मेडिकल दोस्तों से स्पॉन्सरशिप जुटाई और पहली बार बिहार की युवा टीम को एक पेशेवर पहचान दी। उन्होंने खेल की तकनीक के साथ-साथ खिलाड़ियों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी काम करना शुरू किया।
मिट्टी से निकले हीरे और रॉबिन की पारखी नजर
रॉबिन की सबसे बड़ी खोजों में साकिब हुसैन और वैभव सूर्यवंशी जैसे नाम शामिल हैं। साकिब जो कभी चंद रुपयों के लिए टेनिस बॉल क्रिकेट खेलते थे, आज अपनी 145 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आईपीएल में बल्लेबाजों को डराते हैं। वहीं वैभव सूर्यवंशी ने 2025 में सबसे कम उम्र में आईपीएल डेब्यू और शतक लगाकर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। रॉबिन ने केवल प्रतिभा नहीं खोजी, बल्कि उन्होंने खिलाड़ियों की मानसिकता और उनके खेल की तकनीक पर आधुनिक विज्ञान के साथ काम किया।
नई पहचान और भविष्य की फैक्ट्री
आज बिहार अब केवल एक पिछड़ा हुआ राज्य नहीं, बल्कि क्रिकेट की एक नई फैक्ट्री बनकर उभर रहा है। रॉबिन सिंह वर्तमान में जियोहॉटस्टार पर भोजपुरी कमेंट्री के माध्यम से क्रिकेट को घर-घर तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन उनकी असली पहचान आज भी उन्हीं धूल भरे मैदानों में है जहां वे फटे हुए जूतों और बड़ी आंखों वाले बच्चों को उनके सपनों की मंजिल तक पहुंचाते हैं। रॉबिन ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो एक स्टेथोस्कोप से ज्यादा एक विसल और जुनून भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है।












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