बिहार की राजनीति में कुशवाहा नेताओं की कितनी बढ़ गई अहमियत? RJD की चुनौती का यूं मुकाबला करना चाहता है NDA

बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद प्रदेश की राजनीति में कुशवाहा समाज की पूछ अचानक और ज्यादा बढ़ गई है। जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आएंगे इनकी अहमियत और अधिक बढ़ने के आसार लग रहे हैं।

पिछले साल बिहार में जातिगत जनगणना की जो रिपोर्ट आई थी, उसके हिसाब से राज्य में कुशवाहा समाज की आबादी 4.2% है। लोकसभा चुनावों से पहले तक लव-कुश समाज का हिस्सा माने जाने की वजह कुशवाहा समाज मुख्य तौर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जेडीयू के पीछे नजर आता था।

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बिहार की राजनीति में अचानक बढ़ी कुशवाहा नेताओं की पूछ
लेकिन, लोकसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि इस बार इस समाज ने किसी एक गठबंधन यानी एनडीए या इंडिया ब्लॉक के प्रति पूरी वफादारी नहीं दिखाई है, बल्कि स्थानीय गुणा-गणित को ध्यान में रखकर वोट डाले हैं। इसी की वजह से कुछ सीटों पर बहुत ही ज्यादा अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिले हैं।

कुशवाहा नेताओं को प्रमोट करने में जुटा राजद
यही वजह है कि प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां इस समाज के नुमाइंदों को प्रमुख पदों पर पहले से तैनात करने लगे हैं और आगे भी इनकी किस्मत की लॉटरी खुलती नजर आ रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टी ने भी पहली बार के सांसद और औरंगाबाद के पार्टी एमपी अभय कुशवाहा को लोकसभा में सदन का नेता नियुक्त किया है।

जेडीयू ने प्रदेश अध्यक्ष भगवान कुशवाहा को दिया एमएलसी टिकट
इसी तरह बिहार में एमएलसी की एकमात्र सीट के लिए सत्ताधारी जेडीयू ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भगवान सिंह कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया है, जो संभवत: 2 जुलाई को नामांकन करेंगे। पहले एमएलसी की यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बिहार के भाजपा प्रभारी विनोद तावड़े ने एनडीए के एक और सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोक मोर्चा को देने का वादा किया था।

बीजेपी उपेंद्र कुशवाहा को भेज सकती है राज्यसभा
एनडीए को लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा झटका काराकाट सीट पर लगा है, जहां खुद उपेंद्र कुशवाहा चुनाव हार गए। अब प्रदेश भाजपा नेताओं का एक वर्ग पार्टी से उन्हें राज्यसभा में भेजने की मांग कर रहा है। ईटी ने इन बातों की जानकारी रखने वाले लोगों से मिली सूचना के आधार पर रिपोर्ट दी है कि बिहार में राज्यसभा की दो सीटें खाली हैं, जिनमें से एक से बीजेपी उपेंद्र कुशवाहा को संसद भेजना चाहती है।

एनडीए को पहली बार इस लोकसभा चुनाव में लगा है बड़ा झटका
कुशवाहा वोट बैंक की अहमियत को समझकर ही भाजपा ने सम्राट चौधरी को न सिर्फ बिहार प्रदेश का अध्यक्ष बना रखा है, बल्कि नीतीश कुमार की सरकार में उपमुख्यमंत्री भी बनवाया है।

करीब दो दशकों से बिहार में कुशवाहा समाज कुर्मियों की तरह ही नीतीश कुमार के पीछे एक मजबूत वोट बैंक बनकर खड़ा था। लेकिन, इस चुनाव में एनडीए के इस मजबूत जनाधार में सेंध लगने की बात सामने आ रही है। इसके पीछे इंडिया ब्लॉक की रणनीति का भी बहुत बड़ा प्रभाव माना जा रहा है।

कुशवाहा वोट बैंक को लेकर राजद भी सजग
जैसे इंडिया ब्लॉक ने इस चुनाव में अप्रत्याशित रूप से सात कुशवाहा नेताओं को टिकट दिया था, जिनमें से चुनाव तो दो ही जीते हैं। लेकिन, पांच सीटों पर एनडीए की जीत का अंतर 2019 की तुलना में बहुत ही ज्यादा गिर गया है। इसको देखते हुए आरजेडी, जेडीयू के इस वोट बैंक को और तोड़ने की कोशिशों में जुटा है। इस वजह से एनडीए आने वाले चुनावों को लेकर काफी फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।

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