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बिहार नाव हादसा: आंखों में आंसू और अपनों की तलाश में भटकते लोग

कहा जा रहा है कि इस नाव पर क्षमता से अधिक लोग सवार थे। राहत एवं बचाव कार्य के लिए एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को लगाया गया है।

पटना( मुकुंद सिंह)। बिहार की राजधानी पटना में हुए नाव हादसे के बाद परिजन आंखों में आंसू लिए रात के अंधेरे में अपनों की तलाश करते नजर आए। कभी एनआईटी घाट तो कभी पीएमसीएच, अपनों की तलाश में लोग इधर-उधर भटक रहे थे।

हादसे में मरने वाले की लाश बाहर आते ही सभी अपनों की आस लिए दौड़ पड़ते थे। हर लाश को देखकर ऊपर वाले से यही दुआ करते थे कि हमारे बच्चे को सही सलामत हमारे पास लौटाना।

शनि की साढ़ेसाती साबित हुई मकर संक्रांति पर पतंगबाजी

शनि की साढ़ेसाती साबित हुई मकर संक्रांति पर पतंगबाजी

पटना गंगा दियारा से एनआइटी घाट के लिए आ रही पर्यटकों से भरी नाव शनिवार की शाम करीब पांच बजे 10 मीटर आगे बढ़ने के बाद गंगा में डूब गयी। नाव ओवरलोड थी, अनुमान के मुताबिक नाव पर 20 लोगों के बैठने की क्षमता थी और उस पर करीब 70 लोग सवार थे। इस बड़े हादसे में 24 लोगोंं के मौत की पुष्टि की गयी है,जबकि 20 लोगों को गंभीर हालत में नदी से निकाल कर अस्पताल में दाखिल कराया गया है। घायलों को पीएमसीएच में भर्ती करा दिया गया है।

उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के भी लोगोंं की मौत

उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के भी लोगोंं की मौत

इस नाव हादसे में उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के भी लोगोंं की मौत हुई है। दरअसल मकर संक्राति के अवसर पर गंगा दियारा में आयोजित पतंग उत्सव में शामिल होने के लिए शहर से बड़ी संख्या में लोग नाव से उस पार गये थे। लेकिन जब शाम होने लगी तो लोगों में वापस एनआइटी घाट आने की होड़ मच गयी। इस दौरान शाम को एक छोटी नाव एनआइटी घाट आ रही थी। चश्मदीदों द्वारा बताया जा रहा है कि छोटी नाव थी बावजूद भारी संख्या में लोग उस पर चढ़ गये।

25 लोग बाहर निकल गये

25 लोग बाहर निकल गये

नाव पहले डगमगायी और फिर अचानक पानी में बैठ गयी। इस दौरान पर्यटन विभाग का स्टीमर वहां पहुंचा और लाइफ जैकेट पानी में फेंका। इसके सहारे करीब 25 लोग बाहर निकल गये। नांव में सवार सभी लोग डूब गये लेकिन कई लोग तैर कर निकलने में सफल रहे। बाकियों की तलाश जारी है।

बेकसूर की मौत का जिम्मेदार कौन?

बेकसूर की मौत का जिम्मेदार कौन?

पानी में इंसान नहीं बल्कि व्यवस्था डूब गयी। मौके पर बचाव के इंतजाम नकाफी थे। सभी ने सब कुछ देखा लेकिन किसी की ध्यान इनलैंड वाटर वेज़ अथॉरिटी ऑफ इंडिया के उन स्टीमरों पर नहीं गयी जो चुपचाप तमाशा देखती रही। इतनी भी जहमत नहीं उठाई कि जाकर उन सभी को बचाया जाए।

सरकारें क्यों असफल हो जाती हैं?

सरकारें क्यों असफल हो जाती हैं?

पता नहीं किसके आदेश का इंतजार कर रहे थे ये लोग, क्या उनकी मानवीय संवेदना इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उन्हें ख्याल नहीं रहा। इस हादसे ने फिर से कुछ सवाल जिंदा कर दिया हैं। आखिर सरकारें हादसों से कब सीखेंगी? भीड़ का प्रबंधन करने में सरकारें क्यों असफल हो जाती हैं?

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