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कर्नाटक में उपचुनाव से पहले Congress-JDS गठबंधन के सामने बड़ा संकट

नई दिल्ली- कर्नाटक में करीब 14 महीने पुरानी कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार अपने ही बागियों के चलते गिर गई। अब उन्हीं 17 बागियों के विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव की तैयारियों को लेकर दोनों दलों में दो फाड़ होने की आशंका दिखाई देने लगी है। कर्नाटक में संभावित उपचुनाव को लेकर दोनों दलों की ओर से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे लगता नहीं कि ये गठबंधन अब और ज्यादा दिन चलने वाला है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि एक साल पहले विपक्षी एकता की मिसाल बने इस गठबंधन में आखिर ग्रहण क्यों लगता दिख रहा है?

कांग्रेस की तैयारियों से बिगड़ी बात

कांग्रेस की तैयारियों से बिगड़ी बात

खबरों के मुताबिक गुरुवार को बेंगलुरु में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की एक बैठक में अयोग्य ठहराए गए 17 विधायकों के चुनाव क्षेत्रों का जायजा लेने के लिए पार्टी की ओर से अकेले टीम के सदस्यों के नाम तय कर लिए गए हैं। एक तरह से इस निर्णय से कांग्रेस ने साफ संकेत दे दिया है कि उपचुनावों से उसकी राह अलग होगी। क्योंकि, 17 अयोग्य विधायकों में तीन जेडीएस के भी हैं, लेकिन कांग्रेस सभी के लिए तैयारियों में जुटती दिख रही है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनावों में जेडीएस का जो प्रदर्शन रहा है, कांग्रेस उससे भी निराश है और इसलिए अलग-अलग रास्ता चलने का मन लगभग बना चुकी है। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गुंडु राव ने गुरुवार की बैठक के बाद कहा कि, "ये नहीं कह रहा हूं कि गठबंधन खत्म हो चुका है, लेकिन इसपर जो भी फैसला होगा वो हमारा हाई कमांड ही तय करेगा।"

गठबंधन से दोनों दलों का मोहभंग

गठबंधन से दोनों दलों का मोहभंग

ऐसा नहीं है कि गठबंधन से अकेले कांग्रेस ही निराश है, जेडीएस के कार्यकर्ताओं का भी मोहभंग हो चुका है। इसलिए अब दोनों पार्टियों में यह सुर ज्यादा जोर से फूट रहे हैं कि पार्टी को अपने संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। तथ्य ये भी है कि कांग्रेस ने गुरुवार की बैठक में जो फैसला लिया है, वह एचडी देवगाड़ा के उस बयान के ठीक एक दिन बाद आया है, जब उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी के नेताओं ने आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन पर असहमति जताई है। बता दें कि पुराने मैसूर का इलाका ऐसा है, जिसको लेकर दोनों दलों के बीच सबसे ज्यादा सियासी दुश्मनी है। लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर बीजेपी का मुकाबला भी किया था, लेकिन फिर भी भाजपा को चुनौती देना तो दूर, दोनों पार्टियां अपने-अपने दिग्गजों को भी जिताने में नाकाम हो गईं। 28 में से 25 सीट अकेले बीजेपी ले गई और कांग्रेस-जेडीएस को एक-एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। गठबंधन को सबसे बड़ा धक्का ये लगा कि अकेले मैदान में उतरने के बावजूद बीजेपी 51.38% वोट लेने में सफल रही। जबकि, कांग्रेस के खाते में महज 31.88% और जेडीएस के पास 9.67% वोट ही आ सके। अब दोनों दलों के नेताओं को लगता है कि अगर लोकसभा चुनाव अलग-अलग लड़ते तो उन्हें ज्यादा फायदा होता। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा भी है कि, "सच्चाई ये है कि अगर त्रिकोणीय मुकाबला होता है तो दोनों दलों को फायदा होगा। यह साफ हो चुका है कि अगर हम साथ मिलकर लड़ेगे तो सिर्फ बीजेपी को फायदा होगा।"

आलाकमान से इशारा मिलते ही टूट तय

आलाकमान से इशारा मिलते ही टूट तय

दोनों दलों ने जो राह पकड़ी है, उससे तय है कि कर्नाटक में साल भर पहले विपक्षी एकता की पहचान बने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। कांग्रेस में पक रही खिचड़ी की भनक जब जेडीएस लीडरशिप को लगी तो वह अपने हिसाब से उसका सियासी आकलन कर रहे हैं। कांग्रेस की बैठक पर प्रतिक्रिया देते हुए जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष कुमारस्वामी ने साफ कह दिया है कि कांग्रेस गठबंधन नहीं चाहती है। उनके मुताबिक, "अगर वे तय कर चुके हैं तो हमारे पास अलग लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हो सकता है कि उपचुनाव के बाद उन्हें उनकी गलतियों का एहसास हो। जो भी हो, गठबंधन पर फैसला देवगौड़ा और कांग्रेस के नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही लेंगे, राज्य इकाई नहीं।"

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