Karnataka:क्या बजरंग दल पर बैन का वादा कर कांग्रेस ने की गलती? इतनी सीटों का हो सकता है नुकसान
कर्नाटक में कांग्रेस ने बजरंग दल पर जो बैन का चुनावी वादा किया है, उसका फायदा उठाने के लिए भाजपा ने सारा मोर्चा खोल दिया है। बीजेपी सफल रही तो उसे इससे 20 से 25 सीटों का लाभ मिल सकता है।

कर्नाटक चुनाव में मुस्लिम आरक्षण को बीजेपी पहले से ही मुद्दा बनाए हुई थी और उसे वापस करने के कांग्रेस के वादे से उसे और मौका भी मिल रहा था। लेकिन, अब बजरंग दल पर बैन का मुद्दा ऐसा है, जिसका चुनावी फायदा उठाने में बीजेपी कोई मौका नहीं छोड़ना चाहेगी। पार्टी की शीर्ष लीडरशिप तक से यह कोशिश शुरू हो चुकी है।

बीजेपी को मिल गया ध्रुवीकरण का मौका!
कांग्रेस अबतक खासकर तटवर्ती करनाटक में कोई भी ऐसा मुद्दा छेड़ने से बच रही थी, जिससे कि भाजपा को ध्रुवीकरण का फायदा मिल सके। लेकिन, पार्टी के घोषणा पत्र में विश्व हिंदू परिषद की युवा इकाई बजरंग दल पर बैन का वादा करके, उसने बीजेपी को आसानी से ऐसा मुद्दा थमा दिया दिया है, जिसपर वह फ्रंटफुट पर बैटिंग करने में माहिर है।

हिंदुत्व वोट बैंक को एकजुट करने का अवसर
ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक तटवर्ती कर्नाटक और उसके आसपास के क्षेत्र जैसे कि चिकमंगलुरु और हुबली-धारवाड़ क्षेत्र में बीजेपी को इसकी वजह से अपने हिंदुत्व समर्थकों को फिर से गोलबंद करने का मौका मिल सकता है। जबकि, बीजेपी की स्थिति ऐसी थी कि उसने तटवर्ती कर्नाटक में विधायकों के प्रति भारी एंटी-इंकंबेंसी के चलते कई का टिकट भी काटा है।

मुस्लिम आरक्षण खत्म करने को पहले ही मुद्दा बना रही थी
जानकार मानते हैं कि बीजेपी को ऐसा आसान मसला मिल गया है, जिसे वह मुस्लिम आरक्षण खत्म करने के नाम पर उभारने की भरसक कोशिश कर रही थी। भाजपा पहले से ही कांग्रेस पर पीएफआई जैसे कट्टरपंथी संगठनों पर सौफ्ट रहने का आरोप लगाती रही थी।

20 से 25 सीटों पर मतदान पर पड़ सकता है असर
चुनावी जानकारों के मुताबिक तटवर्ती कर्नाटक, चिकमंगलुरु और हुबली-धारवाड़ इलाके में हिंदुत्व वोट बैंक 20 से 25 सीटों पर मतदान को प्रभावित कर सकते हैं। वैसे भाजपा का पहले से इन इलाकों पर पकड़ रहा भी है, लेकिन कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण को वापस करने और बजरंग दल पर बैन लगाने का वादा करके, बीजेपी को एक मजबूत चुनावी हथियार थमा दिया है।

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यूपीए सरकार के दौरान भी कांग्रेस उठा चुकी है मुद्दा
भाजपा पहले से ही धर्म, संस्कृति और विरासत के मुद्दे पर आक्रमक रुख अपनाती रही है। वैसे कांग्रेस ने कोई पहली बार बजरंग दल पर बैन करने का मुद्दा उठाया है। 2008 में जब केंद्र में यूपीए सत्ता में थी तब भी पार्टी ने बजरंग दल पर पाबंदी लगाने की मांग की थी।

ट्रिब्यूनल के आदेश से बजरंग दल से हटा था बैन
6 दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराया गया था, उसके बाद बजरंग दल पर पाबंदी लगाई भी गई थी। लेकिन, बाद में इस मामले की सुनवाई के लिए बने ट्रिब्यूनल के आदेश पर यह बैन हटाना पड़ गया था।
समान विचारधारा वालों को एकजुट करने का मिला मौका
दरअसल, कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में पीएफआई जैसे कट्टर इस्लामिक संगठन को बजरंग दल के बराबर ला खड़ा किया है, इससे भाजपा को वैचारिक समर्थन देने वाले तमाम हिंदुवादी संगठन सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। भाजपा के ऐसे जो भी समर्थक किसी वजह से पार्टी से नाराज थे या सीटिंग एमएलए से नाखुश थे, सबने अब विचारधारा की लड़ाई का पैगाम देना शुरू कर दिया है।

'कांग्रेस को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी'
मसलन, विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विजय शंकर तिवारी ने कहा है, 'कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।' गौरतलब है कि ये इलाके प्रदेश के ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बीजेपी ने पिछले चुनाव में भी बहुत ही अच्छा प्रदर्शन किया था। 2018 में बीएस येदियुरप्पा की पार्टी की मौजूदगी के चलते उसे जरूर नुकसान झेलना पड़ा था।













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