Gujarat Assembly Election 2017: गुजरात चुनाव परिणाम से कांग्रेस को सीखने चाहिए ये सबक
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नई दिल्ली। आज एक बार फिर से गुजरात में भगवा रंग चढ़ा है, भले ही फिर से राज्य में 'कमल' खिला है लेकिन जिस तरह से इस संग्राम में कांग्रेस उभरकर सामने आई है उसने सबको चौंका दिया है, शायद इसी जोश की उम्मीद कब से कांग्रेसी कर रहे थे और इसी वजह से कांग्रेस ने आज राज्म में मजबूत विपक्ष की नींव रख दी है, ये चुनाव भाजपा के लिए जितनी अहमियत रखता है, उससे कहीं ज्यादा ये कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अहम था, फिलहाल राहुल गांधी की ताजपोशी का असर गुजरात के चुनाव में दिखा है इसलिए इस चुनाव से कांग्रेस को सबक लेना चाहिए और उसे अपना आंकलन करना चाहिए कि वो किन-किन मु्द्दों पर कमजोर पड़े, जिसकी वजह से वो जीतते-जीतते हार गए।

शहरी डिस्कनेक्ट
पिछले 22 सालों से गुजरात की हार्डकोर राजनीति से दूर कांग्रेस ने इस बार शहरी इलाकों पर अपनी पकड़ मजबूत की है, अहमदाबाद में साल 2012 चुनाव में कांग्रेस ने केवल यहां 21 में से 4 सीटें जीती थीं जबकि सूरत में 16 सीटों में से केवल 1 सीट पर उसका कब्जा था लेकिन इस बार हालात बेहतर हैं, इस बार कांग्रेस शहरी वोटरों को लुभाने में कामायाब हुई है, जिसका फायदा उसे मिला है और अगर स्थिति ऐसी रही तो आने वाले लोकसभा चुनावों में निश्चित तौर पर उसे इसका फायदा मिलेगा।

गठजोड़ और गठबंधन महत्वपूर्ण
भले ही विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता हो लेकिन जब आरोप-प्रत्य़ारोप की बातें होती हैं, तो मामला हिंदुत्व, जाति, धर्म पर आकर अटक जाता है, भाजपा को इसमें महारथ हासिल है इसलिए उसने फिर से बाजी मार ली है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस बार के चुनाव ने राहुल गांधी को नेता बना दिया और उन्हें भी इन मु्द्दों का महत्व समझ आ गया।

नेतृत्व
कहते हैं भाषा में बड़ा मोह होता है, इसलिए पीएम मोदी ने जब गुजरातियों से गुजराती में बात की तो लोगों को लगा कि ये तो अपना आदमी है, जबकि राहुल गांधी के भाषणों में इसकी कमी देखी गई, इसका मतलब ये नहीं कि राहुल गांधी को गुजराती ना आना कांग्रेस की हार का कारण है, बल्कि इसका मतलब ये हुआ कि कांग्रेस के पास गुजरात में कोई भी ऐसा गुजराती बड़ा नेता नहीं था, जो कि मंच पर गुजराती भाषा के जरिए मोदी को टक्कर दे सके, ये वो भारी कमी है, जिस पर कांग्रेस को काफी मेहनत करनी होगी।

संगठनात्मक चुनौती
राहुल गांधी ने 17 दिन गुजरात में बिताए और दिन-रात एक करते लोगों को लुभाने की कोशिश की लेकिन ऐसा क्या हुआ कि उनकी मेहनत वोट में तब्दील नहीं हो पाई, इसका सीधा कारण ये है कि कांग्रेस को संगठनात्मक रूप में ग्राउंड लेवल में काम करने की जरूरत है, तभी वो बीजेपी को हरा सकती है।

पार्टी को संजीवनी
राहुल गांधी के पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात चुनाव को उनकी उपलब्धि के तौर पर लिया जा सकता है। भले ही गुजरात में कांग्रेस सरकार बनाने से पीछे रह जाए लेकिन इस बार उसका प्रदर्शन पहले के मुकाबले में काफी बेहतर होता दिखाई दिया जो इस पार्टी के लिए संजीवनी है।

पिछले नतीजे
हम आपको बता दें कि 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 116 सीटें हासिल की थीं वहीं कांग्रेस 61 पर काबिज थी। वहीं 2007 के विधानसभा चुनाव में भी कोई खास फर्क दिखाई नहीं दिया था। इस दौरान भाजपा को जहां 117 सीटें मिली थीं वहीं 59 सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं। इसके अलावा 2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 127 और कांग्रेस को 57 सीटें मिली थीं। 1998 में भी भाजपा ने यहां पर जीत दर्ज करते हुए 117 सीटें पाई थीं जबकि कांग्रेस 53 पर सिमट गई थी।












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