Assam Election: चुनाव से पहले प्रियंका गांधी का असम दौरा,कांग्रेस की 'त्रिमूर्ति' संभालेगी कमान, कितना फायदा?
Assam Assembly Election 2026: असम विधानसभा चुनाव 2026 का चुनावी बिगुल बज चुका है और इसी के साथ सभी राजनीतिक पार्टियां मैदान में अपनी धुरी तैयरा करने में लगी है। असम की 126 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए कांग्रेस इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
लगातार विधानसभा चुनावों में हार का सामाना कर रही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। प्रियंका गांधी वाड्रा बुधवार 18 फरवरी से दो दिवसीय गुवाहाटी दौरे पर हैं।

माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी का यह दौरा केवल रैलियों के लिए नहीं, बल्कि उस 'न्यू सिस्टम' को अंतिम रूप देने के लिए है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या है प्रियंका की नई स्ट्रैटेजी, क्या कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी के त्रिमुर्ति डूबती नैया को पार कर पाएंगे...
Assam Election 2026 के लिए क्या है प्रियंका गांधी की स्ट्रैटेजी
राज्य में अपनी रणनीति बदलते हुए कांग्रेस पार्टी ने अपनी पारंपरिक कार्यशैली को किनारे रख 'माइक्रो-मैनेजमेंट' और 'सोशल इंजीनियरिंग' का एक नया ब्लूप्रिंट तैयार किया है। इस रणनीति की धुरी बनी हैं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, जिन्हें असम की स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है। पार्टी के भीतर इस नए प्रयोग को 'पायलट प्रोजेक्ट' कहा जा रहा है।
कांग्रेस में अब तक उम्मीदवारों का चयन दिल्ली में होता था, जहां राज्य के नेता बायोडाटा लेकर स्क्रीनिंग कमेटी से मिलने आते थे। लेकिन प्रियंका गांधी ने इस 'टॉप-डाउन' मॉडल को 'बॉटम-अप' मॉडल में बदल दिया है। स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों को निर्देश दिया गया है कि वे दिल्ली में बैठने के बजाय सीधे असम के जिलों में जाकर फीडबैक लें।
Congress Screening Committee Assam: प्रियंका गांधी का सोशल इंजीनियरिंग पर विशेष फोकस
स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष प्रियंका गांधी वाड्रा ने पार्टी के तीन दिग्गज नेताओं को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 'ग्राउंड-जीरो' की रिपोर्ट तैयार करने के लिए तैनात किया है। इन नेताओं का चयन और उन्हें सौंपे गए जिले, असम की जटिल जनसांख्यिकी (Demography) को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं।
1. इमरान मसूद: अल्पसंख्यक और भाषाई समीकरणों पर नजर
उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता और सांसद इमरान मसूद को असम के उन क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है, जो राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और विविधतापूर्ण हैं। मसूद मुख्य रूप से डिब्रूगढ़, धेमाजी, तिनसुकिया, विश्वनाथ और उदलगुरी जैसे जिलों में उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग करेंगे।
वहां की मुस्लिम और भाषाई अल्पसंख्यक आबादी है। पार्टी का मानना है कि मसूद की पहचान इन समुदायों के बीच एक प्रखर वक्ता की है, जिससे वे स्थानीय कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के साथ बेहतर संवाद कर पाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि टिकट वितरण में इन वर्गों का सही प्रतिनिधित्व हो।
2. सप्तगिरी शंकर उलका: आदिवासी अस्मिता का चेहरा
ओडिशा के प्रमुख आदिवासी नेता और सांसद सप्तगिरी शंकर उलका को असम के आदिवासी बहुल हृदयस्थल की कमान सौंपी गई है। उन्हें माजुली, जोरहाट, गोलाघाट, कार्बी आंगलोंग और नगांव जैसे जिलों का प्रभार मिला है। असम में आदिवासियों और जनजातीय समुदायों का वोट बैंक सत्ता की चाबी माना जाता है।
उलका स्वयं एक आदिवासी चेहरा हैं, इसलिए उन्हें इन क्षेत्रों में भेजने का उद्देश्य यह है कि वे स्थानीय जनजातीय आकांक्षाओं को समझ सकें और ऐसे उम्मीदवार खोज सकें जो पार्टी को इन सुरक्षित और महत्वपूर्ण सीटों पर मजबूती दिला सकें।
3. सिरिवेला प्रसाद: OBC और चाय बागान की चुनौती
वरिष्ठ नेता सिरिवेला प्रसाद को उन क्षेत्रों का जिम्मा दिया गया है जो असम की अर्थव्यवस्था और राजनीति की रीढ़ माने जाते हैं। उन्हें चराईदेव, शिवसागर, लखीमपुर, सोनितपुर और दरांग जैसे जिलों में तैनात किया गया है। इन जिलों में ओबीसी (OBC) समुदाय और चाय बागान श्रमिकों की बड़ी तादाद है। चाय बागान क्षेत्र लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रहे हैं, लेकिन पिछले चुनावों में बीजेपी ने यहां गहरी सेंध लगाई थी। सिरिवेला प्रसाद का मुख्य काम इन क्षेत्रों में सामाजिक समीकरणों को संतुलित करना और चाय श्रमिकों के बीच कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस पाना है।
2021 की हार से लिया सीख, समझिए पिछले चुनाव के आंकड़ों का गणित
कांग्रेस 2021 के अपने कमजोर प्रदर्शन को सुधारना चाहती है। पिछले चुनावों में भाजपा 93 सीटों पर लड़ी और 60 सीटें जीतीं। वहीं कांग्रेस 95 सीटों पर दांव लगाया लेकिन केवल 29 सीटें ही जीत सकी। चुनावी विशलेषणों का मानना है कि पिछली बार टिकट वितरण में हुई देरी और स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी हार की बड़ी वजह थी, जिसे इस बार 'जमीनी स्क्रीनिंग' से दूर किया जा रहा है।
असम में मुख्यमंत्री हिमंता विश्व शर्मा के संगठनात्मक कौशल के सामने प्रियंका गांधी का यह नया दांव कितना कारगर होगा, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। लेकिन प्रियंका गांधी द्वारा स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्षता संभालना और खुद जिलों की रिपोर्ट लेना यह संकेत देता है कि कांग्रेस इस बार 'माइक्रो-मैनेजमेंट' के सहारे बीजेपी के अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाने की तैयारी में है।
अगर यह मॉडल सफल रहा, तो यह पार्टी की चुनावी कार्यशैली में स्थायी बदलाव की शुरुआत बन सकता है। अब देखना होगा कि जमीनी स्तर पर लिया गया यह फैसला कांग्रेस को सत्ता की दौड़ में कितनी मजबूती देता है।
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