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Article 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बोम्मई केस का क्या रहा रोल? जानिए

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के केंद्र के फैसले पर जो मुहर लगाई है, उसमें 1994 के बोम्मई केस में सर्वोच्च अदालत के फैसले ने भी दिलचस्प रोल अदा किया है।

बोम्मई केस आर्टिकल 356 से संबंधित था, जो केंद्र-राज्य संबंधों के लिए अब बहुत बड़ा नजीर और कानून बन चुका है। 1994 में सर्वोच्च अदालत के ऐतिहासिक फैसले से पहले केंद्र सरकार ने अनेकों बार संविधान को ताक पर रखकर इस अनुच्छेद का मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया था।

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आर्टिकल 356 क्या है?
बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने आर्टिकल 356 की व्याख्या कर राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने और विधानसभा भंग करने की परिस्थितियों को स्पष्ट किया था। आर्टिकल 356 में 'राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था ठप होने की स्थिति' से जुड़े संवैधानिक प्रावधान हैं, जिनमें राष्ट्रपति शासन भी शामिल है।

बोम्मई केस क्या था?
सुप्रीम कोर्ट के सभी 9 जजों ने बोम्मई केस में सर्व-सम्मति से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को तो कायम रखा, लेकिन फैसला दिया कि राष्ट्रपति का फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा। तब से सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की स्थिति को लेकर स्पष्ट कानून की भूमिका निभा रहा है।

उत्तरखंड और अरुणाचल प्रदेश में 2016 में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई केस में आए फैसले के आधार पर ही पलट दिया था।

1989 में केंद्र में राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने कर्नाटक में एसआर बोम्मई की अगुवाई वाली जनता दल की सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया था।

तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस आधार पर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया था कि वहां के तबके गवर्नर पी वेंकटसुब्बैया को कथित रूप से 19 विधायकों की ओर से मुख्यमंत्री बोम्मई की सरकार से समर्थन वापस लेने का खत मिला था; और उन्होंने इसी के दम पर केंद्र को राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर दी थी।

अपनी सिफारिश में उन्होंने दो तर्क दिए थे। एक कि बोम्मई के पास बहुमत नहीं रह गया है। दूसरा, कोई भी दूसरी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। बाद में 19 में 7 विधायकों ने कहा कि समर्थन वापस लेने वाली चिट्ठी पर उनके हस्ताक्षर गलत जानकारी के आधार पर लिए गए हैं।

बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट का क्या फैसला था?
बर्खास्त मुख्यमंत्री पहले कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचे, लेकिन वहां से उनकी याचिका खारिज हो गई। फिर वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और उनकी अपील पर 9 जजों की संविधान पीठ बनाया गया। केंद्र का फैसला बहुत विवादित था और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह कहा गया कि राष्ट्रपति शासन की सिफारिश से पहले 'गवर्नर ने बोम्मई के विचार' नहीं सुने।

सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि गैर-कानूनी तरीके, दुर्भावना, असंगत विचार, सत्ता के दुरुपयोग या धोखाधड़ी से की गई राष्ट्रपति की उद्घोषणा की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। अदालत ने कहा कि इस फैसले तक पहुंचने के लिए जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया है, उसकी समीक्षा अदालत कर सकती है।

इस फैसले ने राष्ट्रपति शासन और विधानसभा भंग करने के फैसले को संसद से मंजूरी लेना भी आवश्यक बना दिया। इस फैसले पर दोनों सदनों की मंजूरी आवश्यक कर दी गई। तबतक राष्ट्रपति सर्फ विधानसभा को निलंबित रख सकता है। अगर दो महीने के अंदर राष्ट्रपति की उद्घोषणा को मंजूरी नहीं मिलती है, तो बर्खास्त सरकार की खुद ही फिर से बहाली हो सकती है।

इस फैसले ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राज्य सरकार के पास विधायकों का बहुमत है या नहीं, यह फैसला सिर्फ सदन के अंदर ही हो सकता है।

अनुच्छेद 370 मामले में क्या रहा रोल?
कश्मीर मामले में एक सवाल यह उठाया गया था कि क्या जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था, तब आर्टिकल 370 समाप्त हो सकता है? यह फैसला 5 अगस्त, 2019 को हुआ था और जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन राज्य में 2018 से ही राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के सामने ये सवाल था कि क्या राष्ट्रपति जम्मू और कश्मीर को मिले विशेषाधिकार को खत्म करने पर सहमति दे सकते हैं?

यहां सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने बोम्मई मामले के आधार पर राष्ट्रपति की कार्रवाई को संवैधानिक तौर पर वैध करार दिया है। अदालत ने बोम्मई फैसले के आधार पर यह कहा कि राष्ट्रपति का फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में है, लेकिन कार्यपालिका के आदेश की वैद्यता की जांच के लिए अलग-अलग मानक अपनाए।

कोर्ट ने दो मानकों का हवाला दिया। एक जस्टिस पीबी सावंत का; और दूसरा जस्टिस रेड्डी का। तब जस्टिस सावंत ने यह मानक तय किया था कि सत्ता का इस्तेमाल दुर्भावनापूर्ण था या स्पष्ट रूप से तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता था। जबकि, जस्टिस रेड्डी ने कहा था कि राष्ट्रपति को कार्रवाई की उपयुक्तता और जरूरत को ध्यान में रखना चाहिए। इन दोनों कसौटी पर केंद्र का फैसला सही ठहराया गया है।

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