सुप्रीम कोर्ट में Article 370 को लेकर बड़ी दलीलें, 5 सवालों में जानिए 60 घंटे चली बहस का पूरा निचोड़

सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाए जाने को चुनौती देनी वाली 23 याचिकाओं पर 5 जजों की संविधान पीठ ने अब तक कुल 60 घंटे तक सुनवाई की, जिसमें दिग्गज अधिवक्ताओं ने कई दलीलें पेश कीं।

आर्टिकल 370 (Atical 370) हटाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के कई अहम सवालों पर याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुना। पहला सवाल था, संविधान में आर्टिकल 370 का प्रावधान कुछ समय के लिए या फिर स्थायी था? जिस पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान सभा में आर्टिकल 370 को अस्थायी तौर रखा गया था, क्योंकि जम्मू कश्मीर संविधान सभा एक अस्थायी बॉडी थी। हालांकि इसकी मंशा स्थायी तौर पर रखने की थी।

वहीं इस पर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि जम्मू कश्मीर संविधान सभा ने जम्मू कश्मीर संविधान के जरिए अपनी मंशा जाहिर कर दी थी। इस इलाके के इतिहास और नेताओं ने जाहिर कर दिया था कि ये एक स्थायी प्रावधान है। याचिकाकर्ता के वकील राजीव धवन ने कहा कि आर्टिकल 370 जम्मू कश्मीर की डायवर्सिटी को बचाने का एक रास्ता था। इसे हटाने से पहले जम्मू कश्मीर सरकार से सलाह और सहमति दोनों जरूरी थी।

Arguments on Atical 370 in Supreme Court

दूसरा सवाल था कि क्या जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में तोड़ने का फैसला क्या संवैधानिक था? इसके जवाब में अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के आर्टिकल-3 के मुताबिक किसी पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में नहीं तोड़ा जा सकता। ये रिप्रजेंटेटिव फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट के खिलाफ है। एडवोकेड राजीव धवन ने कहा कि किसी भी राज्य की सीमाओं से छेड़छाड़ से पहले संविधानसभा की सहमति जरूरी है। संविधान सभा भंग थी इसलिए ऐसा करना संवैधानिक नहीं था।

तीसरा सवाल था...क्या 370 हटाने के पीछे को राजनीतिक मकसद है? इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि केंद्र ने राजनीति एजेंडा पूरा करने के लिए 370 हटाया और जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया। एडवोकेट दुष्यंत दवे ने कहा कि राष्ट्रपति का आदेश राष्ट्रहित के नाम पर लाया गया। लेकिन इसके पीछे छिपा असली मकसद बीजेपी के 2019 के मैनिफेस्टो में किए गये वादे को पूरा करना था।

जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के 10वें दिन सरकार ने अपना पक्ष रखा। सॉलिसिटर जरनल तुषार मेहता ने तर्क देते हुए कहा कि आर्टिकल 370 के चलते कश्मीर की व्यवस्था देश के बाकी राज्यों से बिलकुल अलग ही थी। यहां 2019 तक राज्य में शिक्षा का अधिकार कानून लागू नहीं था। जबकि अन्य राज्यों में ये आर्टिकल 21ए के तहत मूल अधिकार है। जम्मू कश्मीर शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने में धारा 370 अड़चन थी।

इस चीफ जस्टिस ने कहा कि 1976 में संविधान की प्रस्तावना में जो संशोधन किए गए थे, वह भी कश्मीर में कभी स्वीकार नहीं किए गए। इस तरह सेक्युलरिज्म और समाजवाद जैसी चीजों को कभी अपनाया ही नहीं गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संसद मानती थी कि आर्टिकल 370 अस्थायी व्यवस्था है। 2019 तक जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के जज जो शपथ लेते थे, उसमें राज्य के संविधान की बात कही जाती थी। मेहता ने आगे कहा कि वे जज काम तो भारत के संविधान के तहत करते थे, लेकिन शपथ जम्मू- कश्मीर के संविधान की लेते थे।

बता दें सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर से धारा 370 को हटाने के राष्ट्रपति के आदेश को 23 याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी है। अगस्त 2019 के बाद से लगातार जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित राज्य बनाने पर सवाल खड़े ह रहे हैं। याचिकाकर्तां में शामिल जहूर अहमद भट ने 5 जजों ने संविधान पीठ के समक्ष कहा, "मैं जम्मू-कश्मीर में एक टीचर हूं। बच्चों को हमारे खूबसूरत संविधान और डेमोक्रेसी के बारे में पढ़ाता हूं। अगस्त 2019 के बाद बच्चे पूछने लगे हैं कि क्या हम सच में एक डेमोक्रेसी हैं। मुझ जैसे लोगों के लिए इसका जवाब देना बेहद मुश्किल है।"

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