Ambedkar Jayanti 2025:"गांधी मेरे लिए कभी महात्मा नहीं थे" कैसे थे अंबेडकर और गांधी के रिश्ते?
Ambedkar Jayanti 2025: डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती हर साल 14 अप्रैल को मनाई जाती है। बाबासाहेब का योगदान भारतीय संविधान के निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण था। उन्होंने समाज के शोषित वर्ग के लिए शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी। आज उनके जयंती के अवसर पर आइए जानते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के रिश्ते कैसे थे?
महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के रिश्ते जटिल और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थे। दोनों भारत की आज़ादी और सामाजिक न्याय के लिए काम कर रहे थे, लेकिन उनके दृष्टिकोण और प्राथमिकताएँ अलग थीं। उनके रिश्ते में सहमति भी थी, असहमति भी, और एक गहरा वैचारिक संघर्ष भी देखने को मिलता है।

कैसे थे अंबेडकर और गांधी के रिश्ते?
महात्मा गांधी छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ थे, लेकिन वे वर्ण व्यवस्था को पूरी तरह ख़ारिज नहीं करते थे। वे उसमें सुधार के पक्ष में थे। जबकि अंबेडकर जाति व्यवस्था को ही जड़ से खत्म करना चाहते थे। उनका मानना था कि जब तक जाति व्यवस्था है, तब तक दलितों को न्याय नहीं मिल सकता।
गांधी दलितों को "हरिजन" कहते थे
गांधी दलितों को "हरिजन" कहते थे, जिसका अर्थ था "ईश्वर के लोग"। जबकि बाबासाहेब अंबेडकर को यह शब्द अपमानजनक लगता था, क्योंकि उनका मानना था कि इससे दलितों की असली समस्याओं को छुपाया जा रहा है। वो मानते थे कि गांधी जाति व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, जबकि गांधी का मानना था कि सुधार से बदलाव संभव है।
"जाति व्यवस्था को नष्ट किए बिना दलितों का उद्धार संभव नहीं"
महात्मा गांधी जातिव्यवस्था को भारतीय समाज की एक सांस्कृतिक संरचना मानते थे। वे छुआछूत के खिलाफ थे, लेकिन वर्ण व्यवस्था को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से स्वीकार करते थे। अंबेडकर जाति व्यवस्था को पूरी तरह अन्यायपूर्ण, अमानवीय और समाज के पतन का कारण मानते थे। वो कहते थे कि "जाति व्यवस्था को नष्ट किए बिना दलितों का उद्धार संभव नहीं।" है।
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अंबेडकर चाहते थे कि दलितों को अलग निर्वाचक मंडल मिले
अंबेडकर चाहते थे कि दलितों को अलग निर्वाचक मंडल मिले, जिससे वे अपने खुद के प्रतिनिधि चुन सकें। उनका मानना था कि दलितों के हित सिर्फ तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक आवाज मिले। जबकि महात्मा गांधी इसके विरोध में थे। उन्होंने इसे हिंदू समाज के विभाजन के रूप में देखा। उन्होंने इसके खिलाफ जेल में आमरण अनशन किया।
"गांधी मेरे लिए कभी महात्मा नहीं थे"
पूना समझौता के बाद अंबेडकर ने बयान देते हुए कहा था कि "गांधी मेरे लिए कभी महात्मा नहीं थे।" यह बयान दिखाता है कि पूना समझौते के बाद भी अंबेडकर गांधी के दृष्टिकोण से पूरी तरह असहमत रहे।
महात्मा गांधी बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने भगवद गीता को अपने जीवन का "आध्यात्मिक मार्गदर्शक" माना। उनके लिए "राम" एक ऐतिहासिक पात्र नहीं बल्कि "सत्य और धर्म के प्रतीक" थे। वो सभी धर्मों को समान मानते थे। उन्होंने उपवास, प्रार्थना, और भजन-कीर्तन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया। उनके लिए धर्म एक आध्यात्मिक और नैतिक अनुशासन था, न कि कर्मकांडों का बोझ।
"मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा, क्योंकि यह मेरे वश में है।"
अंबेडकर ने हिंदू धर्म को जातिवादी और शोषणकारी बताया। वे दैवी न्याय की अवधारणा से असहमत थे, क्योंकि वह दलितों के दुख को "कर्मफल" कहकर सही ठहराता है। अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया, क्योंकि उसमें जाति व्यवस्था नहीं थी और यह तर्क, करुणा और मानवता पर आधारित था। उन्होंने कहा कि वे "धर्म परिवर्तन इसलिए कर रहे हैं कि मेरे लोग इंसान का जीवन जी सकें।" उन्होंने कहा था कि "मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा, क्योंकि यह मेरे वश में है।"
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