लोकसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे पर JDS-कांग्रेस में ठनी, कुमारस्वामी बोले, हम भिखारी नहीं
बेंगलुरू। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों ही पार्टियों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों ही दलों के नेताओं के बयानों पर नजर डालें तो दोनों ही पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर रार ठन गई है। गौर करने वाली बात यह है कि दोनों ही दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बातचीत नहीं शुरू हुई है लेकिन दोनों ही दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी लगातार जारी है।

कोई भिखारी नहीं है
कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने मंगलवार को कहा था कि जेडीएस भिखारी नहीं है जो कांग्रेस द्वारा चुनाव पूर्ण गठबंधन की वजह से जो भी सीट दे उसे स्वीकार कर लेगी। उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता है कि सात, पांच या तीन सीटें मिलेगी। लेकिन जेडीएस भिखारी नहीं है। वहीं कुमारस्वामी के बयान पर पलटवार करते हुए सिद्धारमैया ने कहा कि यह गठबंधन की सरकार है और कोई भी यहां भिखारी नहीं है। उन्होंने कहा कि सीटों के बंटवारे पर अंतिम फैसला अभी लिया जाना है।

सीटों पर मतभेद
बता दें कि कांग्रेस और जेडीएस 2006 में एक साथ आए थे, लेकिन पिछले साल मई में जेडीएस ने भाजपा के सत्ता में आने के सपने को चूर कर दिया और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई। लेकिन गठबंधन के बाद भी दोनों पार्टियों के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। लगातार दोनों ही पार्टियों के बीच तनातनी सामने आती रहती है। लेकिन एक बार फिर से लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।

12 सीटों की मांग
पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस के मुखिया एचडी देवगौड़ा ने इस वर्ष की शुरुआत में ही 28 सीटों में से 12 सीटों की मांग की थी। केंद्र दोबारा सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस अपनी पूरी ताकत झोंकने में लगी है। लिहाजा पार्टी कर्नाटक में खुद की स्थिति को मजबूत करने में जुटी है। वहीं जेडीएस गठबंधन में अपनी संभावनाओं को अधिक से अधिक बढ़ाने की कोशिश में जुटी है।

आसान नहीं चुनौती
कर्नाटक में कांग्रेस पूरी कोशिश में जुटी है कि वह अपनी सभी 10 सीटों बरकरार रखे। लेकिन जेडीएस चाहती है कि वह दक्षिण कर्नाटक की सीटों को अपने पाले में कर सके, जिसमे चिकबल्लपुरा और कोलर की सीटें भी शामिल है। दोनों ही पार्टियों के लिए बड़ी मुश्किल यह है कि पार्टी के जमीनी नेता एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते हैं, लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि कैसे दोनों दल गठबंधन में आगामी चुनाव लड़ते हैं।
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