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उर्दू के दिग्गज साहित्यकार प्रोफेसर गोपी चंद नारंग का निधन, सेंट स्टीफेंस से की पढ़ाई, पद्म श्री से सम्मानित

नई दिल्ली, 16 जून। जानेमाने उर्दू के साहित्यकार गोपी चंद नारंग का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गोपी चंद ने आखिरी सांसें अमेरिका में ली। उनका जन्म बलूचिस्तान मे 1931 में हुआ था। गोपी चंद ने 57 किताबें लिखी हैं, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया है। साहित्य के क्षेत्र में गोपी चंद नारंग के योगदान के चलते भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा था।

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कई प्रसिद्ध रचनाएं
गोपी चंद नारंग की कुछ बेहतरीन कृतियों की बात करें तो उन्होंने उर्दू अफसाना रवायक और मसायल, अमीर खुसरो का हिंदवी कलाम, इकबाल का फन लिखी, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया था। गोपी चंद नारंग की छह भाषाओं पर अच्छी पकडड़ रखते थे। उन्हे उर्दू, हिंदी के अलावा अंग्रेजी, बलोची पश्तो की भी जानकारी थी। उन्होंने हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी भाषा में किताबें लिखी।

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    पाकिस्तान के तीसरे सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित
    गोपी चंद नारंग की पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से हुई थी, यहां से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली थी। इसके बाद वह यहां शिक्षण के कार्य में भी लिप्त रहे। पाकिस्तान के तीसरे सर्वोच्च सम्मान सितार ए इम्तियाज से भी गोपी चंद नारंग को नवाजा जा चुका है। 1985 में तत्कालीन राष्ट्पति ज्ञानी जैल सिंह ने गोपी चंद नारंग को गालिब पुरस्कार से सम्मानित किया था।

    सेंट स्टीफेंस से की पढ़ाई
    गोपी चंद नारंग का जन्म बलूचिस्तान के दुक्की में 11 फरवरी 1931 में हुआ था। साल 1954 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में उर्दू भाषा से पोस्ट गैजुएशन की डिग्री ली और इसके बाद 1958 में उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की। सेंट स्टीफेंस कॉलेज में गोपी चंद नारंग उर्दू साहित्य पढ़ाते थे, बाद में वह दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में काम करने लगी और यहां 1961 में रीडर बन गए। 1963 में नारंग विस्कॉनसिन यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर बन गए। इस विश्वविद्यालय में वह पढ़ाने के लिए जाने लगे। इसके साथ ही व मिनेसोटा यूनिवर्सिटी और ओस्लो यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाते थे।

    लंबा शिक्षण करियर
    गोपी चंद नारंग को साहित्य जगत में बड़ी हस्ति के तौर पर याद किया जाता है। 1974 में गोपी चंद नारंग को जामिया मिल्लिया इस्लामिय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया और यहां उन्होंने विभाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। तकरीबन 12 साल तक उन्होंने यहां शिक्षण कार्य किया और इसके बाद एक बार फिर से 1986 में वह दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए पहुंच गए। यहां उन्होंने 1995 तक शिक्षण कार्य किया और इसके बाद 2005 में उन्हें प्रोफेसर एमरिटस बना दिया गया।

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