Mood of the Nation poll: 80 फीसदी लोगों की राय, किसान आंदोलन पर ठीक है मोदी सरकार की नीति

सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे इस मुद्दे से सरकार के निपटने से संतुष्ट हैं, जबकि 16 प्रतिशत ने इस पर नाखुशी व्यक्त की।

नई दिल्ली। Mood of the Nation poll: भारत सरकार के लिए, वर्ष 2020 का अंत काफी मुश्किलों भरा रहा। जब सरकार ने कोविड टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने और कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई में आगे बढ़ने की तैयारी की, तो दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हजारों नाराज किसानों ने उनके लिए चुनौती खड़ी कर दी। हालांकि ऐसे में जब किसान तीनों कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनरत हैं।

agricultural laws

80% लोगों ने सरकार के इस मुद्दे (कृषि कानून) से निपटने को लेकर संतुष्टि जताई है। इंडिया टुडे द्वारा किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, सरकार ने इस मुद्दे पर जनता से समर्थन प्राप्त किया है। सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत लोगों ने सरकार के इस मुद्दे से निपटने का समर्थन किया है और कहा है कि कृषि बिल पर मोदी सरकार की नीति ठीक है।

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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को उम्मीद थी कि उसके तीन-कृषि कानून किसानों के लिए वही कर से दिखाएंगे जो 1960 के दशक में गेहूं और चावल में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए भारत में हरित क्रांति ने किया था लेकिन किसान, विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में, सरकार के इरादों के बारे में इतने आश्वस्त नहीं हैं और 26 नवंबर से राष्ट्रीय राजधानी में सरकार को घेरे हुए हैं।

लंबे समय से गठबंधन सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने इस मुद्दे पर एनडीए को झटका दिया था जबकि हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे इस मुद्दे से सरकार के निपटने से संतुष्ट हैं, जबकि 16 प्रतिशत ने इस पर नाखुशी व्यक्त की। हालांकि, सर्वेक्षण में मुद्दे पर राय विभाजित की गई थी कि कानूनों से कौन अधिक लाभान्वित होंगे: किसान या कॉर्पोरेट? इस पर 34 प्रतिशत लोगों का मानना ​​है कि बिल किसानों की मदद करेंगे, करीब 32 प्रतिशत लोगों ने कहा कि कानून कॉरपोरेट्स की मदद करेंगे जबकि 25 फीसदी को लगता है कि कानून दोनों की मदद करेंगे।

इस बात पर कि क्या कृषि कानूनों में संशोधन किया जाना चाहिए, जैसा कि सरकार करने को राजी है, या फिर इन्हें निरस्त किया जाना चाहिए, जैसा कि किसान मांग कर रहे हैं। इस पर 55 प्रतिशत लोग कानून में संशोधन करने के पक्ष में दिखे, जबकि 28 प्रतिशत ने कहा कि किसानों की मांग के अनुसार उन्हें निरस्त करने की आवश्यकता है।

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