NDA के 25 साल : अगर 1997 में कांग्रेस गुजराल सरकार नहीं गिराती तो भाजपा सत्ता में नहीं आती
कांग्रेस ने अगर राजनीतिक स्वार्थ का परिचय नहीं दिया होता तो शायद एनडीए का न गठन होता और न ही वह इतना मजबूत होता। कांग्रेस ने पहली गलती 1997 में की और दूसरी गलती 1998 में की। इसकी वजह से भाजपा के नेतृत्व में एनडीए एक मजबूत गठबंधन के रूप में उभरा।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2019 में कहा था, अगर कांग्रेस ने 1997 में गुजराल सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया होता तो 1998 में भाजपा को सत्ता में आने का मौका नहीं मिलता। कांग्रेस भाजपा को सरकार बनाने से रोक सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

1996 में भाजपा के सहयोगी बहुत कम थे
1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 161 सीट जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कांग्रेस को 140 सीटें मिलीं थीं। सबसे बड़े दल के नेता भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए अमंत्रित किया गया था। वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने। उन्हें बहुमत साबित करन के लिए दो हफ्ते का समय मिला। लेकिन वे बहुमत के लिए जरूरी 272 का आंकड़ा नहीं जुटा सके। भाजपा 200 के पास भी नहीं पहुंच पायी। यानी उस समय भाजपा का साथ देने वाले राजनीतिक दलों की संख्या बहुत कम थी। उस समय भाजपा ऐसी स्थिति में नहीं थी कि वह एनडीए की परिकल्पना भी कर सके। वाजपेयी सरकार 13 दिन में गिर गयी।
कांग्रेस ने अपने फायदे के लिए गुजराल सरकार गिरा दी
1996 में जनता दल के एचडी देवॉगौड़ा के नेतृतव में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। फिर इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। संयुक्त मोर्चा सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। गुजराल सरकार को 2001 तक चलना था। भाजपा विपक्ष में थी और सत्ता की होड़ से बाहर थी। लेकिन नवम्बर 1997 में कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी की निजी महत्वाकांक्षा ने भारतीय राजनीति का परिदृश्य बदल दिया। कहा जाता है कि उस समय सीताराम केसरी के मन में प्रधानमंत्री बनने की लालसा कुलबुला रही थी। उन्हें फीडबैक मिला था कि अगर अभी मध्यावधि चुनाव हो जाए तो कांग्रेस को बहुमत मिल सकता है। तब सीताराम केसरी ने नवम्बर 1997 में गुजराल सरकार से समर्थन वापस ले लिया। बहाना जैन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट को बनाया गया। गुजराल सरकार का पतन हो गया और मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गयी।
1998 की हार से सीताराम केसरी का पत्ता साफ
फरवरी 1998 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ। सीताराम केसरी का मंसूबा पानी के बुलबुले की तरह फूट गया। मतों की गिनती जैसे ही शुरू हुई रुझानो में कांग्रेस पिछड़ने लगी। सोनिया समर्थकों का गुस्सा सीताराम केसरी पर फूट पड़ा। कांग्रेस कार्यसमिति के अधिकतर नेता गुजराल सरकार से समर्थन वापसी के पक्ष में नहीं थे। यह सब सीताराम केसरी की जिद से हुआ था। इधर लोकसभा के नतीजे आ रहे थे उधर केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने की मुहिम शुरू हो गयी। 14 मार्च की रात सीताराम केसरी को बहुत ही अपमान के साथ कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटा
दिया गया। सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।
1998 - पवार को PM नहीं बनने दिया था सोनिया ने
1998 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के दौरान ही सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं थीं। इस चुनाव में फिर किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। भाजपा फिर सबसे बड़ी पार्टी बनी और उसकी सीटों की संख्या 161 से 182 पर पहुंच गयी। कांग्रेस 141 सीटें मिलीं। उसे सिर्फ एक सीट का फायदा हुआ। त्रिशंकु संसद के कारण सरकार का गठन फिर अनिश्चित हो गया। इस बीच कांग्रेस के शरद पवार सरकार गठन को लेकर सक्रिय हो गये। शरद पवार के समर्थकों के मुताबिक, शरद पवार सोनिया गांधी से मिले और बताया कि अधिकतर क्षेत्रीय दल उनके नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए
सहमत हो गये हैं। और तो और भाजपा की सहयोगी ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू ने भी उन्हें सहयोग देने का भरोसा दिया है। फिलवक्त 281 सांसदों का साथ मिल चुका है। यदि आपकी और पार्टी की मुझे मंजूरी मिले तो मैं सरकार बनाने के लिए दावा पेश करूं। लेकिन सोनिया गांधी ने शरद पवार की बात अनसुनी कर दी। इस बात पर शरद पवार बहुत खफा हो गये। जब कांग्रेस ने सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया तो राष्ट्रपति ने सबसे बड़े दल भाजपा के नेता को सरकार बनाने का न्योता दिया। तब तक भाजपा 1996 के मुकाबले मजबूत हो चुकी थी। इसी समय बहुमत के प्रंबध के लिए एनडीए की परिकल्पना साकार हुई।
1998 में कांग्रेस ने फिर गलती की
1998 में अगर सोनिया गांधी ने शरद पवार को प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी रजामंदी दे दी होती तो वाजपेयी सरकार का वजूद ही न होता। 1998 में भाजपा का कुनबा 1996 से बड़ा हो चुका था। इस बार 13 दिन नहीं बल्कि 13 महीने सरकार चली। कांग्रेस की गलतियों के कारण एनडीए एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित हुआ। एनडीए को पीछे ढकेलने के लिए कांग्रेस को फिर एक मौका मिला। लेकिन आपसी मतभेद के कारण यह जाया हो गया। अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास मत हार गयी थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा देना पड़ा। तब सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति के सामने दावा किया था कि उन्हें बहुमत (272) का समर्थन हासिल है। राष्ट्रपति ने उन्हें 272 सांसदों के समर्थन का पत्र दिखाने के लिए तीन दिनों की मोहलत दी।
इस बार सोनिया की राह में पवार का अडंगा
लेकिन शरद पवार ने सोनिया गांधी की इस कोशिश में अडंगा डाल दिया। कहा जाता है कि पवार के कहने पर समाजवादी पार्टी और वामदलों ने सोनिया को समर्थन देने से मना कर दिया। कांग्रेस जब सरकार नहीं बना पायी तो 1999 में फिर मध्यवधि चुनाव हुआ। भाजपा 20 से अधिक दलों से गठबंधन कर चुनाव में उतरी और जीत हासिल की। एनडीए पूरे पांच साल सत्ता में रहा और भारतीय राजनीति में एक ताकत बन गया।












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