भारत में क्या ‘मुस्लिम विरोधी’ हमले आम होते जा रहे हैं?

नई दिल्ली, 14 दिसंबर। कट्टरपंथी हिंदू समूहों की ओर से बर्बरतापूर्ण धमकियों की वजह से दर्जनों शो रद्द किए जाने के बाद भारत के मुस्लिम कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी ने कॉमेडी छोड़ने का संकेत दिया. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालते हुए उन्होंने कहा- 'नफरत जीत गई, कलाकार हार गया.'
गत 1 जनवरी को जैसे ही उनका शो खत्म हुआ, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और फिर उन्होंने एक महीना जेल में बिताया. उन पर कथित तौर से अपने चुटकुलों में हिंदू धार्मिक भावनाओं का "अपमान" करने का आरोप थे, हालांकि वे उस शाम अपने उस शो के सेट में नहीं थे. तब से इस स्टैंड-अप कॉमेडियन को कुछ कट्टरपंथी हिंदू समूह लगातार निशाना बना रहे हैं.
धार्मिक घृणा की एक अन्य घटना में, दक्षिणपंथी बजरंग दल समूह ने अक्टूबर में भोपाल में वेब श्रृंखला 'आश्रम' के सेट पर हमला किया. समूह ने दावा किया कि श्रृंखला का शीर्षक 'हिंदू धर्म पर हमला' था. हमलावरों ने कथित तौर पर फिल्म निर्माता प्रकाश झा पर स्याही फेंक दी और चालक दल के एक अन्य सदस्य के साथ मारपीट की
अगस्त महीने में, उत्तर प्रदेश में एक 45 वर्षीय मुस्लिम रिक्शा चालक को कट्टरपंथी हिंदू भीड़ द्वारा पीटे जाने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. हिंसक भीड़ ने उस व्यक्ति को घेर लिया और उसे 'जय श्री राम' का नारा लगाने पर मजबूर किया. इस दौरान उसकी छोटी बेटी अपने पिता की सुरक्षा की गुहार लगा रही थी.
बॉर्न ए मुस्लिम: सम ट्रुथ अबाउट इस्लाम इन इंडिया की लेखिका गजाला वहाब चेतावनी देती हैं कि 'कम उग्रता वाली सांप्रदायिक हिंसा' की घटनाएं भारत में बड़े पैमाने पर होने लगी हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वह कहती हैं, "यह अधिक स्थानीय होता जा रहा है. यह सभी नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन पर भारी पड़ गया है लेकिन इसका खामियाजा मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है. मैं ऐसे लोगों को भी जानती हूं जो मुसलमान नहीं हैं लेकिन चिंतित हैं. इस तरह का व्यापक भय अभूतपूर्व है."
सत्तारूढ़ दल के अधीन धार्मिक 'अन्याय' बढ़ रहा है
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर तनवीर एजाज कहते हैं कि कम उग्रता वाली सांप्रदायिक हिंसा की जड़ें साल 1947 के भारत विभाजन के दौर में देखी जा सकती हैं. एजाज कहते हैं, "भारत में, यह कम-उग्रता वाली सांप्रदायिक हिंसा विभाजन के बाद से ही मौजूद है. भारत में मुसलमान विभाजन के अपराधबोध में जी रहे हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था क्योंकि जो मुसलमान भारत में रहे, उन्होंने कभी विभाजन के लिए नहीं कहा. शीर्ष स्तर पर केवल कुछ राजनेताओं ने ही इन पर बातचीत की."
एजाज के मुताबिक, भारत में धार्मिकता का एक हिस्सा धार्मिक समुदायों से इतर है. वह कहते हैं, "लेकिन हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही यह प्रक्रिया तेज हो गई है."
उन्होंने कहा कि भारतीय प्रेस ने उजागर किया है कि 'लंबे, कम तीव्रता वाले संघर्ष' 'नागरिक समाज के चेहरे पर काफी दिखाई देते हैं.'
एजाज कहते हैं, "स्वयं की पूरी परिभाषा बड़े पैमाने पर जातीय और धार्मिक आधार पर हो रही है और फिर यह 'हम' बनाम 'उन' का सवाल है. यहां सांस्कृतिक/धार्मिक टकराव है...धार्मिक आक्रामकता है."
'दंड से मुक्ति' के लिए धर्म का उपयोग
हाल के वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा की ज्यादातर घटनाओं को बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने अंजाम दिया है. वहाब के मुताबिक, पंजीकृत संगठनों के भीतर कई 'छोटे संगठन हैं' जिन्हें पुलिस छूना नहीं चाहती. वह कहती हैं, "दण्ड से मुक्ति की एक डिग्री है. क्योंकि वे धर्म की आड़ में काम कर रहे हैं. ये समूह बहुत ज्यादा उत्साहित होते जा रहे हैं."
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एजाज कहते हैं कि भारतीय संस्थानों के भीतर मजबूत जवाबदेही होनी चाहिए. वह कहते हैं, "मैं देख रहा हूं कि राज्य की संस्थाएं काफी कमजोर होती जा रही हैं, खासकर पुलिस और कानून-व्यवस्था की संस्थाएं. उन्हें अपना काम करना चाहिए."
वहाब कहती हैं कि धार्मिक घृणा की बढ़ती घटनाओं के खतरनाक परिणाम होंगे और यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह भारतीय समाज में दरारों को और गहरा कर देगा. वह कहती हैं, "अगर ऐसा ही कुछ होता रहा तो समुदायों के बीच दूरियां और गलतफहमियां बढ़ती ही जाएंगी. हम मूल रूप से एक बहुत ही खंडित समाज का निर्माण कर रहे हैं और इन विभाजनों को पाटने में लंबा समय लगेगा."
Source: DW
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