Himachal Pradesh: मंडी लोकसभा सीट भाजपा को हराकर कैसे जीती कांग्रेस ? ये हैं 6 बड़े कारण
शिमला, 3 नवंबर: उपचुनावों में भाजपा को हिमाचल प्रदेश में जो झटका लगा है, वह बहुत बड़ा है। पार्टी की मुसीबत राजस्थान में भी सतह पर दिखाई पड़ी है। लेकिन, हिमाचल के वोटरों से उसके लिए जो संदेश निकला है, वह पार्टी के रणनीतिकारों की नींदें उड़ा रहा है। खासकर तब जब वहां भाजपा की सरकार तो है ही, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी हिमाचली हैं। विधानसभा उपचुनावों में एक-दो सीटें ऊपर-नीचे हो तो बात समझी जा सकती है। लेकिन, मंडी लोकसभा सीट पर जहां पिछली बार भाजपा प्रत्याशी 4 लाख से ज्यादा अंतर से जीते थे, इस बार पार्टी वह सीट भी नहीं बचा पाई है। इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि मंडी लोकसभा में ही प्रदेश के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर का अपना चुनाव क्षेत्र भी आता है। वनइंडिया ने यहां पर कांग्रेस को मिली जीत के 6 कारण पाए हैं।

कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में सहानुभूति
मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस की विजयी उम्मीदवार प्रतिभा सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह की पत्नी हैं। 65 साल की प्रतिभा सिंह 2004 के आम चुनावों और 2013 के उपचुनाव में भी सांसद चुनी जा चुकी हैं। वह मंडी के मतदाताओं के लिए अनजान नहीं हैं, क्योंकि उनके पति या 'राजा साहेब' के नाम से लोकप्रिय वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के 6 बार मुख्यमंत्री रहे थे, जिस दौरान उनका कार्यकाल कुल 21 साल का रहा। 87 वर्षीय बुजुर्ग कांग्रेसी का इसी साल जुलाई में पोस्ट-कोविड समस्याओं के चलते निधन हो गया था। कांग्रेस ने बहुत ही सूझबूझ के साथ प्रतिभा सिंह को टिकट दिया और उनकी सहानुभूति का सिक्का चल गया।
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भाजपा का दांव गलत हो गया
भाजपा सूत्रों के मुताबिक ब्रिगेडियर कुशल ठाकुर (रिटायर्ड) को मैदान में उतारकर पार्टी ने गलती कर दी। क्योंकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी राम स्वरूप शर्मा इसी सीट से 68.62% वोट लेकर चुनाव जीते थे। पार्टी के एक सूत्र ने वनइंडिया को बताया है कि 'यदि शर्मा जी के परिवार से किसी को लाया जाता तो तस्वीर दूसरी हो सकती थी।' दरअसल, मंडी उपचुनाव में हार से यहां की भाजपा सरकार के लिए बहुत ही खराब संदेश गया है। जबकि, कुशल ठाकुर और प्रतिभा सिंह के बीच वोटों का अंतर महज 1% का रहा है। बीजेपी उम्मीदवार को 48.14% वोट मिले हैं और सहानुभूति लहर पर सवार प्रतिभा सिंह ने 49.14% पाए हैं और वह सिर्फ 7,490 वोट से चुनाव जीती हैं।

बीजेपी को महंगाई ले डूबी
हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार है, इसलिए मंडी लोकसभा सीट हाथ से निकल जाना और जुब्बल कोटखाई विधानसभा सीट भी कांग्रेस के हाथ में चला जाना उसके लिए बहुत बड़ा झटका है। खुद राज्य के मुख्यमंत्री जय राम सिंह ठाकुर मान रहे हैं कि भाजपा की हार की वजह महंगाई है। कांग्रेस ने भी चुनाव प्रचार के दौरान महंगाई को यहां बड़ा मुद्दा बनाया था और लगता है कि तेल के साथ-साथ बाकी जरूरी चीजों की बेतहाशा कीमत बीजेपी पर भारी पड़ी है। प्रदेश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है, जहां रोड-ट्रांसपोर्ट पर ही ज्यादा चीजें निर्भर हैं और डीजल के दाम बढ़ने से आम आदमी की कमर टूट रही है।

सत्ता-विरोधी माहौल
हिमाचल प्रदेश उन राज्यों में से है, जहां हर पांच साल बाद सत्ता बदलने का ट्रेंड रहा है। राज्य में 2022 के नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जाहिर है कि उपचुनाव के परिणाम को प्रदेश में वोटरों के उसी बदलते हुए मूड के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, चुनावी राजनीति में एक साल का वक्त बहुत लंबा है और दावे के साथ भविष्यवाणी करना आसान नहीं है। यहां भाजपा सरकार के खिलाफ मौजूदा माहौल की बड़ी गवाही ये भी है कि मुख्यमंत्री ठाकुर जिस सिराज विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह भी मंडी लोकसभा के अंदर ही आता है। भाजपा के लिए एक और बड़ी बात ये है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी हिमाचल के हैं और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर मोदी सरकार में हाई-प्रोफाइल मंत्रियों में शामिल हैं।

चार-लेन वाला मुद्दा
मंडी के रिजल्ट से लगता है कि भाजपा उम्मीदवार ब्रिगेडियर ठाकुर (रिटायर्ड) को मनाली तक की 4-लेन हाइवे वाले मुद्दे की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। जब कांग्रेस सत्ता में थी तो वो उसे जोरदार तरीके से उठा रहे थे, लेकिन बीजेपी की सरकार बनते ही यह संदेश गया कि वह इससे पीछे हट रहे हैं। स्थानीय लोगों के मन में यह बात है कि जबसे सरकार ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के स्टेट एक्स-सर्विसमेन कॉर्पोरेशन का चेयरमैन और एमडी बनाया है, उन्होंने प्रभावित लोगों के लिए बेहतर मुआवजे के मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

किसान आंदोलन का 'असर'
कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव प्रचार के दौरान बाकी समस्याओं के साथ-साथ किसान आंदोलन को भी उठा रही थीं। उन्होंने लोंगों को समझाने की कोशिश की कि मोदी सरकार की वजह से 11 महीनों से किसी दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले बैठे हैं और सरकार उनकी सुन नहीं रही है। कहीं ना कहीं प्रदेश के एक वर्ग के लोगों में इसका भी प्रभाव माना जा सकता है।
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