OPS पर कर्मचारियों की नाराजगी ने जयराम सरकार को पशोपेश में डाला, कांग्रेस मौके का लाभ उठाने की फिराक में

OPS पर कर्मचारियों की नाराजगी ने जयराम सरकार को पशोपेश में डाला, कांग्रेस मौके का लाभ उठाने की फिराक में

शिमला, 16 अगस्त: पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा सरकार के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है। पुरानी पेंशन बहाली की मांग को लेकर कर्मचारी लगातार सरकार पर दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। हालांकि सरकार की ओर से मान मनोबल का दौर चल रहा है, लेकिन कर्मचारी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। वहीं, सरकार चाहकर भी इस मुद्दे पर कुछ नहीं कर पा रही है, जिसके कारण सीएम जयराम ठाकुर की मुश्किलें चुनावी सालों में और बढ़ती नजर आ रही हैं।

Employees put Jairam Sarkar in trouble on the issue of Old Pension Scheme

प्रदेश सरकार और सरकारी कर्मचारियों के बीच चल रही यह कशमकश भाजपा के मिशन रिपीट के सपनों को पलीता लगा सकती है। आपको बता दें कि साल 1993 में भाजपा सरकार, राज्य के कर्मचारियों के गुस्से का शिकार बन चुकी है। उस वक्त के चुनावों में शांता कुमार की सरकार को करारी हार का सामना करना पड़ा था। उसके बाद शांता कुमार की सक्रिय राजनीति में वापसी नहीं हो पाई और उनका कर्मचारी विरोधी होने का ठप्पा भी लग गया था। बता दें कि, ऐसा ही गुस्सा एक बार फिर भाजपा सरकार के खिलाफ राज्य के कर्मचारियों में दिखाई दे रहा है।

दो दिन पहले जोरदार विरोध प्रदर्शन करने के बाद अब कर्मचारी शिमला में शांतिपूर्ण धरने पर बैठ गए हैं। गौरतलब है कि दिसंबर 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा ओपीएस को समाप्त कर दिया गया था। जिसके बाद सभी राज्य सरकारों, जिनमें दिवंगत वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली हिमाचल की कांग्रेस सरकार भी शामिल है, को केंद्र के फैसले को लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उसके बाद राष्ट्रीय पेंशन योजना 1 अप्रैल, 2004 से लागू की गई थी। लेकिन अब कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन बहाली की मांग करने लगे है। जिससे प्रदेश की राजनीति में खासी हलचल हो रही है।

कर्मचारियों की मांग को कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी का समर्थन भी मिल रहा है। लेकिन भाजपा के लिए यह मामला दो धारी तलवार पर चलने जैसा है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार अकेले हिमाचल में पुरानी पेंशन योजना की बहाली के मूड में नहीं है। लेकिन चुनावी साल को देखते हुए कर्मचारियों की मांगों को अलग-अलग स्वीकार करने की अनुमति हिमाचल सरकार को दे सकती है। हिमाचल के साथ गुजरात में भी इस साल के अंत में चुनाव हो रहे हैं। लिहाजा यह काम आसान नहीं है। वैसे भी हिमाचल पहले ही 80,000 करोड़ रुपए से अधिक की देनदारियों से जूझ रहा है और ओपीएस का वार्षिक बोझ लगभग 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है, जो किसी भी सरकार के लिए वहन करना आसान नहीं होगा।

हालांकि, कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों, राजस्थान के अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल ने अपने-अपने राज्यों में ओपीएस को वापस करने का साहसिक निर्णय लिया है। लेकिन दोनों मुख्यमंत्रियों को केंद्र की ओर से जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। 2004 से ओपीएस की बहाली के बारे में राजस्थान सरकार के फैसले ने पहले ही असमजंस की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि बाजार संचालित राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएएस) के तहत अर्जित 39,000 करोड़ रुपए वापस लेने के राज्य के अनुरोध को तुरंत खारिज कर दिया गया है। बघेल एक ही नाव में सवार हैं, लेकिन जब भी चुनाव होंगे दोनों मुख्यमंत्री चुनावी फसल काट सकते हैं।

तो ऐसे में सीएम जय राम ठाकुर की सरकार मुश्किल में हैं, क्योंकि उनके लिए कर्मचारियों को खुश करना उनकी शक्तियों से परे है। यही वजह है कि मांग को नहीं माना गया तो कर्मचारियों के गुस्से का शिकार जयराम सरकार को होना होगा। राजनीतिक जानकार और पत्रकार रविन्दर सूद मानते हैं कि कर्मचारियों ने अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को तोड़कर हाथ मिलाया है और सभी कर्मचारी संगठन इस मामले पर एकमत हैं। क्योंकि वे ओपीएस को अपने परिवारों के भविष्य के सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं जबकि नए एनपीएस, जो वर्तमान में लागू है, ने अकल्पनीय अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसलिए, इस मांग को वापस लेने पर किसी भी सुलह या समझौते की बहुत कम संभावना है।

जाहिर है इसका नुकसान भाजपा को उठाना पडेगा। सीएम के लिए मुश्किल यह है कि वह इस मामले को प्रधानमंत्री तक नहीं पहुंचा पाये हैं। दूसरी ओर विपक्षी दल कांग्रेस इस मामले पर अपने राजनीतिक हित साधने में जुटी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह, कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री और अभियान समिति के अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सहित कांग्रेस नेताओं ने कर्मचारियों के साथ एकजुटता दिखाई है और सत्ता में आते ही पहले ही दिन ओपीएस में वापस लौटने की अधिसूचना जारी करने का वादा किया है। कांग्रेस ओपीएस मुद्दे पर अपना चुनावी अभियान बड़ी चतुराई से तैयार कर रही है। उसे लगता है कि यह मुद्दा हिमाचल में भाजपा के 'मिशन रिपीट' के सपने को बड़ा झटका देने की क्षमता रखता है।

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