कुरुक्षेत्र/रावलपिंडी। पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा पंजा साहिब के दर मत्था टेकने जाने वालों की संख्या इस बार ज्यादा हो गई है। कोरोना महामारी व दोनों देशों के बीच कुछ पाबंदियों के चलते सिख श्रद्धालु वहां जा नहीं पाए थे, लेकिन अब इस सिखों के पवित्र तीर्थ के लिए एक के बाद एक जत्थे रवाना हो रहे हैं। खालसा साजना दिवस पर पाकिस्तान में गुरुद्वारा पंजा साहिब में बैसाखी मनाने के लिए हरियाणा के 106 सिखाें का जत्था कुरुक्षेत्र से भी रवाना हो गया।
जत्थेदार हरभजन सिंह मसाना व जत्थेदार भूपिंदर सिंह असंध ने बताया कि, पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा पंजा साहिब का नाम सिख मजहब के सबसे पवित्र तीर्थों में गिना जाता है। गुरुद्वारा पंजा साहिब पाकिस्तान में रावलपिंडी से 48 किमी दूर है। वहां शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी श्री अमृतसर की ओर से हर साल ऐतिहासिक दिनों के उपलक्ष्य में संगत को भेजा जाता है। अब न तो कोरोना महामारी है, न ही अन्य बंदिशें, इसलिए पाकिस्तान में ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए सिखों का जत्था हमारे यहां से भी रवाना हो गया है।
सिख मिशन हरियाणा प्रभारी ज्ञानी मंगप्रीत सिंह ने बताया कि, एसजीपीसी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रघुजीत सिंह विर्क के निर्देश पर शिरोमणि कमेटी द्वारा जत्थे को कुरुक्षेत्र से अमृतसर तक ले जाने और वापसी के समय अमृतसर से कुरुक्षेत्र लाने के लिए नि:शुल्क बस सेवा मुहैया करवाई है। श्रद्धालुओं के लिए पीने के पानी की भी व्यवस्था करवाई गई है।
गुरुद्वारा पंजा साहिब के बारे में कहा जाता है कि,
एक बार गुरु नानक देव जी ध्यानमग्न थे, तभी वली कंधारी ने पहाड़ के ऊपर से गुरु नानक देव जी पर एक बड़ी शिला लुढ़का दी। वह शिला उछलते हुए गुरु जी की तरफ आ रही थी, तभी अचानक गुरु जी ने अपना पंजा उठाया और उसे हवा में ही रोक दिया। उसी जगह पर अब गुरुद्वारा पंजा साहिब है और पंजे से पत्थर की शिला को रोकने के चलते इस गुरुद्वारे का नाम 'पंजा साहिब' पड़ा।
मान्यता है कि, इस स्थान पर गुरु नानक देव जी की हथेली के निशान भी हैं। इस गुरुद्वारे में 24 घंटे चलने वाली लंगर व्यवस्था है। सरोवर है, जहां संगत आकर स्नान करते हैं। हर गुरु पर्व और शहीदी दिवस पर विशेष समागमों का आयोजन होता है।
यहां होने वाले आयोजनों हजारों की तादाद में हिंदुस्तानी शरीक होते हैं। अब बैसाखी के जत्थे रवाना हो रहे हैं।