ये हैं बुआ देवी: 60 साल से छाप रहीं मिथिला लोकचित्र, गांव से पाई यूं देश-दुनिया में पहचान
फरीदाबाद। आप पद्मश्री अवॉर्डी बुआ देवी के बारे में जानते हैं? देश-दुनिया के कला-प्रेमी इनके मिथिला लोकचित्र से रूबरू होते रहे हैं। हरियाणा के फरीदाबाद में लगे 35वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में बुआ देवी की कला फिर से देखने को मिल रही है। यदि आपने अब तक ना जाना हो, तो आईए...ऐसे में 80 वर्षीय वृद्धा के हुनर की एक बानगी देख ही लेते हैं...

80 वर्षीय कलाकार बुआ देवी की कहानी
बुआ देवी वो महिला हैं, जिन्होंने अपनी कला का देश-दुनिया में लोहा मनवाया है। वह बिहार के मधुबनी जिले के गांव राजनगर की रहने वाली हैं। वह 60 साल से लगातार मिथिला लोकचित्र छाप रही हैं। वर्ष 1962 में इंदिरा गांधी कला केंद्र में आयोजित प्रदर्शनी में उन्होंने अपने लोकचित्र को प्रदर्शित किया था। जहां से उनकी चर्चा होने लगी। उनकी पहली पेटिंग डेढ़ रुपए में बिकी। वहीं, 3 पेंटिंग के चाढ़े 4 रुपए मिले थे। यही कला उनके परिवार के रोजगार का माध्यम बन गई।

पद्मश्री अवॉर्ड से की गईं सम्मानित
बुआ देवी के लोकचित्र आज लाखों रुपए में बिकते हैं। मगर, उन्हें बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। उन्होंने बताया कि, उनकी पेंटिंग की कीमत 8 लाख रुपए तक लग चुकी है। इसी तरह के उल्लेखनीय कार्य के चलते सरकार ने उन्हें 2017 में पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया।

12 साल की उम्र में शादी हो गई थी
लोग आज बुआ देवी कहते हैं..बहुत से लोग उन्हें दादी कहकर सम्मान देते हैं। उनका जीवन नहीं था। उनकी शादी 12 वर्ष में ही हो गई थी। गांव जितवारपुर निवासी जगन्नाथ झा उनके पति बने थे। जब वह ससुराल आई थीं, तो खेती-बाड़ी से परिवार का खर्च मुश्किल से चलता था। मगर.. वह बड़ी लगन वाली थीं। अब उनके कुनबे के सभी लोग अच्छी स्थिति में हैं।












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