DDU University में चल रहे राष्ट्रीय सेमिनार में बोले विद्वान- ' सत्ता और जनता की भाषा एक होनी चाहिए'
Gorakhpur News: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में चल रहे तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रो. चित्तरंजन मिश्र ने सम्बोधित करते हुए कहा कि आलोचना सहृदय संवाद है, और यह सह्रदय संवाद करते हुए रचना की अर्थ मीमांसा में उतरना पड़ता है. अर्थ की मीमांसा में उतरे बिना यदि रचना पर आप कुछ अपने मन का थोपते हैं तो आप रचना के साथ न्याय नहीं कर सकते हैं. समकालीन आलोचना समसामयिकता के गहरे दबाव में है. जिसकी वजह से वह अपनी परंपरा के प्रति अपरिचय का भाव पैदा करती है.
उन्होंने कहा कि कविता को घटना की तरह नहीं पढ़ना चाहिए. जो समाज अपनी कविता, कला, भाषा को नहीं बचा सकता वह गुलामी से भी नहीं बच सकता. आलोचना का काम जड़ता से टकराना है. एकरूपता को तोड़ना है. सारी दुनिया परस्पर विनिमय से चलती है. विचार विश्व भर के होते हैं. बुद्ध इस धरती के थे लेकिन उनका विचार दुनिया में फैला

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प्रो. नन्दकिशोर पाण्डेय ने कहा कि मौलिक मेधा अपनी भाषा में पनपती है. जब हम भारतीय भाषाओं में पढ़ते थे तब कई वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल किए. परंतु, जबसे देश में फारसी और अंग्रेजी का प्रचलन बढा तब से हमें कोई वैज्ञानिक या तकनीकी उपलब्धि हासिल नहीं हुई. उन्होंने आगे कहा कि भाषा को बचाने के लिए उसका व्याकरण, शब्दकोश और उसके लोक साहित्य का संग्रह होना चाहिए.
प्रो. पांडेय ने अंग्रेजी का जिक्र करते हुए कहा कि जिन राज्यों में, विशेष तौर पर पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में, राज-काज की भाषा अंग्रेजी है, वहां की स्थानीय भाषा समाप्त हो रही है। सत्ता और जनता की भाषा एक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज हिन्दी विश्व की जरूरत है. इसे नकारने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। यहां तक कि संयुक्त राज्य संघ में भी हिन्दी को सम्मान से सुना जाता है।
प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने अपने संबोधन में कहा कि भाषाओं का सवाल न्याय और अन्य का सवाल है हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं यह सवाल भाषा से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा तभी बचेगी जब भारतीय भाषाएं बचेंगी. वंचित व हाशिए की भाषाओं को जब महत्व मिलेगा. उन्होंने कहा की भाषा का सवाल सदैव हास्य पर रखा गया. उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय भाषा का क्षरण, असल में भारतीय संस्कृति और भारतीयता के क्षरण से जुड़ा हुआ सवाल है.
नासिक के प्रो.विजय प्रसाद अवस्थी ने कहा कि हिंदी भाषा के विकास में आम आदमी का सबसे बड़ा योगदान है आम बोलचाल की हिंदी को कोई खतरा नहीं है. उन्होंने कहा कि हिंदी का भविष्य टेक्नोलॉजी एवं भारत की सांस्कृतिक भावात्मक एकता से जुड़ा हुआ है.
इग्नू के प्रोफेसर नरेंद्र मिश्रा ने कहा हिंदी शिक्षा जगत में सिकुड़ रही है लेकिन बाजार में बढ़ रही है इसका उदाहरण फिल्म और मीडिया में देखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत में 25 में से 21 हाईकोर्ट की भाषा भारतीय भाषा नहीं है.अफसर शाही नहीं चाहती कि हिंदी ऊपर उठे.उन्होंने कहा कि शिक्षा और सरकारी कामकाज की भाषा एक होनी चाहिए.जब हिंदी में सॉफ्टवेयर होगा, तभी हिंदी वैश्विक भाषा बन सकेगी.
प्रो.रामदरश राय ने आचार्य रामचंद्र तिवारी का स्मरण करते हुए कहा वह ऐसे आलोचक थे जिनकी आलोचनाएं मौलिक थीं। प्रों राय ने हिन्दी की दशा पर चिंता जताते हुए कहा कि इसका वर्तमान अच्छा नहीं है।
प्रो. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी आलोचना का आरंभ दो प्रश्न तथा दो दिशाओं में विभाजित है. एक पुरानी रीतिवादी कलावादी सामंती दृष्टि से संचालित है तो दूसरी आधुनिक जनवादी और सामंतवादी सौंदर्याभिरुचि के खिलाफ या सामंतवाद विरोधी चेतना से संचालित.
उन्होंने कहा कि आचार्य रामचंद्र तिवारी हम लोगों को आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध और कबीर पढ़ते थे आचार्य शुक्ल उनके प्रिय लेखक थे तो कबीर उनके प्रिय कवि लेकिन उनका मानो जगत तथा आलोचना दृष्टि के पीछे तुलसीदास की समन्वयवादी इसलिए वे दो प्रश्न दो दिशाओं दो धाराओं के बीच में गहरा संतुलन और समन्वय करते चलते थे.
डॉ.दमयंती तिवारी ने कहा कि त्याग में भी आनंन्द है । स्व से पर को जोड़ने का भाव है। अनन्यता बोध से वसुधैव कुटुम्बकम की भावना निःसृत है।
त्रिपुरा की प्रो. मिलन रानी जमातिया ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंधों से हम सभी परिचित हैं, जिनमें भारतीय दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है। हमारे जीवन मूल्यों को ध्यान में रखकर रामचंद्र तिवारी ने रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांतों का विश्लेषण किया ।












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