गांव की महिलाएं भी कर सकती हैं वर्क फ्रॉम होम

पर अब वो घर बैठे भी कमा सकती हैं। लघु कुटीर उद्योग उन्हें पर्दे के भीतर भी रोजगार के अवसर देता है। लघु उद्योग वे उद्योग हैं जो छोटे पैमाने पर किये जाते हैं तथा सामान्य रूप से मजदूरों व श्रमिकों की सहायता से मुख्य धन्धे के रूप में चलाए जाते हैं। भारत में जहाँ आज भी 72.2 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते हैं, वहाँ लघु उद्योग के विकास की सख्त आवश्यक्ता है।
इसके विकास के लिये सरकार ने 1990 में भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक की शुरुआत की थी। सिडबी एक तरह का बैंक है जो कि लघु उद्योगों के लिये कर्ज देता है, जिससे महिलाएं घर बैठे ही अपना उद्योग शुरु कर सकती हैं और कमाई होने पर वो कर्ज चुका सकती हैं। ये बैंक लघु उद्योगों का विकास, उद्योग के विस्तृत आधार का स्वामित्व प्राप्त करने, उद्यम का अपविस्तार और औद्योगिक क्षेत्र में पहल करने के लिए सरल और प्रभावी साधन प्रदान करता है।
जो महिलाएं घर के बाहर नहीं जातीं उनके लिये बेहतर विकल्प
लघु उद्योग क्षेत्र में उद्यमी को देश के किसी भी भाग में शुरु किया जा सकता है इसके लिए केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार से लाइसेंस प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती हैं। इसका पंजीकरण भी अनिवार्य नहीं है तो आसानी से इसकी शुरुआत की जा सकती है। गाँव की महिलाएं संगठित होकर लघु कुटीर उद्योग की शुरुआत कर सकती हैं। स्वयं सहायता समूह पापड़, राखियां, मंगोड़ी, अचार, सिलाई, कढ़ाई, आरी-तारी जैसे कई छोटे-बड़े काम कर रहे हैं।
ये योजना खास कर उन लोगों के लिये हैं जो अशिक्षित है, बेरोजगार हैं या जो महिलाएं घर के बाहर नहीं जाती। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले कुटीर उद्योग कमजोर गुणवत्ता, आधुनिक तकनीक कमी और मार्केटिंग नेटवर्क नहीं मिल पाने के कारण लगभग बंद से हो जाते हैं। इसीलिए भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक की स्थापना की गयी थी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योगों का विकास हो।
लेखक परिचय- शालू अवस्थी लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की छात्रा हैं। यदि आप को लिखने का शौक है, तो आप भी अपने लेख हमें भेज सकते हैं [email protected] पर।












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