NEET in Tamil Nadu: तमिलनाडु में नीट क्यों बना राजनीतिक एजेंडा
NEET in Tamil Nadu: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देश भर के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) NEET को खत्म करने की मांग वाली तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके याचिका को ठुकरा दिया।

जस्टिस सूर्यकांत और केवी विश्वनाथन की पीठ का साफ कहना था कि अखिल भारतीय आधार पर आयोजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाएं ही आयोजित की जानी चाहिए।
यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने 2 जनवरी, 2024 को याचिका पर सुनवाई के दौरान यह गंभीर टिप्पणी भी की कि डीएमके द्वारा चलाए गए छात्रों के हस्ताक्षर अभियान को वह समझते हैं और यह भी मत रखते हैं कि वर्तमान पीढ़ी ऐसे कदमों के पीछे के मकसद और एजेंडे को समझती है। तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने नीट परीक्षा के आयोजन के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलवाया था, जिसमें दावा किया गया कि 50 दिनों में 50 लाख छात्रों के हस्ताक्षर एकत्रित किए गए हैं। दरससल डीएमके काफी समय से नीट को समाप्त करने और राज्यों को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए अपने यहाँ अंक प्रणाली की मांग कर रही है। समझते हैं कि डीएमके के इस एजेंडे के पीछे का मकसद क्या है?
देश में सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज तमिलनाडु में
देश मे सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज तमिलनाडु में हैं। यहाँ लगभग 80 एमबीबीएस कॉलेज हैं, जिनमें 5200 सीटों वाले 37 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं तो 3850 सीटों वाले 24 निजी मेडिकल कॉलेज हैं। इनके अलावा 2500 सीटों वाले 12 डीम्ड विश्वविद्यालय भी हैं। तमिलनाडु में एक मजबूत शिक्षा प्रणाली है और यह राज्य अपने उत्कृष्ट मेडिकल कॉलेजों के लिए जाना जाता है। तमिलनाडु में मद्रास मेडिकल कॉलेज, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज और स्टेनली मेडिकल कॉलेज जैसे प्रमुख चिकित्सा संस्थान हैं। तमिलनाडु ने चिकित्सा शिक्षा के विकास में लगातार निवेश किया है, जिससे पूरे देश के छात्र यहाँ आने के लिए आकर्षित होते हैं ।
नीट का विरोध और राजनीति का खेल
नीट को रद्द करने का तमिलनाडु सरकार कई प्रयास कर चुकी है। बाकायदा विधानसभा में 2021 में इसके लिए विधेयक पारित कराया गया था, लेकिन राज्यपाल आरएन रवि ने इसे वापस कर दिया था। दरअसल तमिलनाडु सरकार छात्रों को उनके 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर राज्य के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश देना चाहती है। एनईईटी के खिलाफ माहौल तब बनना शुरू हुआ, जब 2017 में एक छात्र द्वारा कम अंक आने के बाद आत्महत्या कर ली गई। तब नीट के खिलाफ विरोध में तमाम राजनीतिक दल भी शामिल हुए।
कोटा सिस्टम से भी खफा है तमिल नेता
वर्तमान में, देश भर में सभी सरकार द्वारा संचालित स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में, 15 प्रतिशत सीटें अखिल भारतीय कोटा की हैं। इसका मतलब है कि 15 प्रतिशत सीटें देश के दूसरे राज्य के छात्रों से भर सकती हैं। यह कोटा राज्य के निजी मेडिकल कॉलेजों पर भी लागू है। 13 सितंबर को सत्तारूढ़ डीएमके ने नीट को खत्म करने के लिए विधानसभा में एक कानून पेश किया था। यहां तक कि विपक्षी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने भी इस मुद्दे साथ दिया। भाजपा ने विधेयक का समर्थन नहीं किया। हालांकि इस विधेयक की स्वीकृति की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि इस पर भारत के राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता होगी। 2017 में इसी तरह की कोशिश पिछली अन्नाद्रमुक सरकार ने भी की थी ।
तमिलनाडु के राजनेताओं का तर्क है कि नीट सिर्फ शहरी पृष्ठभूमि के धनी छात्रों को ही अवसर देता है। क्योंकि इस परीक्षा में बार-बार प्रयास करके मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने वाले छात्रों का प्रतिशत 2016-17 में 12.47 प्रतिशत से बढ़कर 2022 -23 में 71.42 प्रतिशत हो गया है। मेडिकल सीट पाने के लिए दूसरी या तीसरी बार परीक्षा देने के लिए अधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है , जिसकी व्यवस्था वहाँ गरीब पृष्ठभूमि वाले छात्र नहीं कर सकते है। फिर नीट में खराब रैंक वाले छात्र भी निजी मेडिकल कॉलेजों में पैसे देकर सीटें पाने में कामयाब रहते हैं। इसलिए नीट का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
मेडिकल एडमिशन क्यों है बड़ा राजनीतिक एजेंडा
दरअसल एनईईटी परीक्षा तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक एजेंडा बन गया है। डीएमके ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में नीट को तमिलनाडु से समाप्त करने का वायदा किया था। उसी वायदे के अनुसार सितंबर 2023 से हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था। यह एजेंडा लोगों को अपील भी कर रहा है। नीट परीक्षा सीबीएसई पाठ्यक्रम पर आधारित है, जबकि तमिलनाडु का राज्य पाठ्यक्रम सीबीएसई से अलग है।
राज्य में मेडिकल सीटों के लिए भारी क्रेज है। लगभग 11 हजार मेडिकल सीटों के लिए हर साल 1.5 लाख से अधिक छात्र NEET परीक्षा में बैठते हैं। नीट की कोचिंग के लिए 10वीं कक्षा से ही छात्र लाखों रुपये चुकाते हैं। गरीब सरकारी स्कूल के छात्रों को एचएससी में बहुत अधिक अंक लाने के बाद भी पर्याप्त मौका नहीं मिल रहा है।
निजी कॉलेजों में प्रति वर्ष 25 लाख फीस देनी होती है। इसलिए लैप्स सीटें भी अमीरों के पास चली जाती हैं। गरीब छात्रों के लिए मेडिकल कॉलेज का सपना धूमिल होता जा रहा है। तमिलनाडु से लगभग तीन हजार छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं। इसलिए नीट अब तमिलनाडु में गरीबों के वोट पाने का एजेंडा बन गया है, जिसे भुनाने का कोई अवसर डीएमके हाथ से जाने नहीं देना चाहती। लोक सभा चुनाव में भी यह मुद्दा शामिल रह सकता है।












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