पुरस्कार अब पद्म कहां रह गये, अब तो ये छद्म हो गये हैं
फ्रांस के एक मशहूर लेखक हुये हैं- ज्यां पॉल सार्त्र..सार्त्र को 1964 में साहित्य के लिये नोबल पुरस्कार की घोषणा हुई। लेकिन उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार को 'आलू का थैला' कहकर ठुकरा दिया। शायद वो इस पुरस्कार की राजनीति से खुश नहीं रहे होंगे। सदी बदल गयी, लेकिन पुरस्कारों को लेकर सोच अभी तक नहीं बदली। भारत में तो पुरस्कार और सम्मान 'अंधा बांटे रेवड़ी' की तरह हैं।

जो सत्ता-प्रतिष्ठान के जितने नजदीक, उसे उतनी जल्दी और उतने ही ज्यादा पुरस्कार मिलने की गारंटी है। नहीं तो सैफ अली खान कभी 'पद्मश्री' नहीं पा सकते थे।कम से कम अभी तक के उनके क्रिया-कलापों से तो कतई नहीं। 'भारत रत्न' पहले मेजर ध्यानचंद को मिला होता, न कि सचिन तेंदुलकर को. हम ये नहीं कह रहे कि सचिन 'भारत रत्न' के लायक नहीं हैं। वो अपने कार्यों से असली 'भारत रत्न' हैं, लेकिन हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद और बलबीर सिंह सीनियर उनसे पहले इस सम्मान के हकदार थे।
पुरस्कार अब पद्म कहां रह गये, अब तो ये छद्म हो गये हैं
बहरहाल, तत्कालीन सरकार ने सचिन की लोकप्रियता को चुनाव में भुनाने की खातिर आनन-फानन में उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा कर दी। हालांकि ये सचिन की समझदारी थी कि वो उस पार्टी के लिये चुनाव प्रचार करने नहीं उतरे, और उस पार्टी की सरकार ने जिस मंशा से उन्हें भारत का सबसे बड़ा सम्मान दिया था वो पूरी नहीं हो सकी।
26 जनवरी पर दिये जाने वाले पद्म सम्मान के लिये इस बार उत्तराखंड सरकार ने जो सात नाम भारत सरकार को भेजे हैं, उनमें पहाड़ के सबसे बड़े संस्कृति कर्मी नरेंद्र सिंह नेगी का नाम नहीं है। इससे आम उत्तराखंडियों में निराशा और गुस्सा है। इस सूची में ऐसे-ऐसे नाम हैं जिनकी संस्तुतिपहले की सरकारें भी कई-कई बार कर चुकी हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी ने पहाड़ की संस्कृति के लिये इतना काम किया
नरेंद्र सिंह नेगी ने पहाड़ की संस्कृति के लिये इतना काम किया है कि वो किसी पुरस्कार या सम्मान से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। लेकिन जब कम प्रतिभाशाली और उस पुरस्कार को पाने की योग्यता से कम काम करने वालों को वो सम्मान मिलता है तो लोगों का गुस्सा लाजिमी है। इस मामले में भी ऐसा ही है। सोशल साइट्स पर कड़ी प्रतिक्रियां देखने को मिल रही हैं। एक शख्स ने लिखा है...पुरस्कार अब पद्म कहां रह गये, अब तो ये छद्म हो गये हैं। यानि जब आम जन पुरस्कार के लिये नामित व्यक्तियों को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाने लगें तो स्थिति की गंभीरता समझ में आती है।
नरेंद्र सिंह नेगी ने पहाड़ की संस्कृति के लिये इतना काम किया है कि उसकी गिनती नहीं की जा सकती है। अपने गीतों से उन्होंने इतनी जागरूकता फैलाई कि कई अंधविश्वास और कुरीतियां दूर हुई हैं। उन्हीं में से एक कुरीति है मंदिरों में पशु बलि प्रथा। हिमाचल जैसे उत्तराखंड से ज्यादा विकसित प्रदेश में जहां अब भी लोग मंदिरों में पशु बलि देने पर अड़े हुये हैं, वहीं उत्तराखंड में ये अब करीब-करीब बंद हो गयी है।
नेगी जी ने अपने गीत. नी होंणा, नि होंणा रे भैरों, देवि-देवतोंल दैणा रे भैंरों बागी-बोग्याटाओं काटि के से बलि प्रथा को खत्म करने का आह्वान किया.. इस गीत के भाव कुछ ऐसे हैं... 'भगवान मंदिर में भैंसे और बकरों की बलि देकर खुश नहीं होते हैं। भगवान मंदिर में खून-खराबे से खुश नहीं होते। भगवान को रुपया-पैसा और सोना चांदी नहीं चाहिये।
ना काटा तौ डांल्यों, तौ डाल्यों ना काटा भुलो
पर्यावरण बचाने को उनका गीत...ना काटा तौ डांल्यों, तौ डाल्यों ना काटा भुलो, डाल्यों ना काटा. गीत के माध्यम से कहा गया है कि पेड़ों को मत काटो। पेड़ कटेंगे तो मिट्टी बहेगी। मिट्टी बहेगी तो न तो घर रहेंगे और न ही खेत-खलिहान ही बचेंगे। फिर कहां रहोगे और क्या खाओगे. इस गाने के भाव इतने सुंदर हैं कि पर्यावरण बचाने के लिये ये शीर्षक गीत होना चाहिये।
उत्तराखंड आंदोलन में चारों तरफ नरेंद्र सिंह नेगी के ही गीत गूंजते थे। दरअसल नरेंद्र सिंह नेगी कभी भी सत्ताधीशों की चापलूसी में नहीं लगे। नहीं तो सरकारी सम्मानों की उनके ऊपर भी बरसात होती। लेकिन ये सार्वभौमिक सत्य है कि सरकारें आती-जाती रहती हैं। उत्तराखंड की जनता तो चौदह साल में आठ सीए देख चुकी है. अब तक के मुख्यमंत्रियों को लोग किस रूप में याद करते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने अपने क्रिया-कलापों से कितना नाम कमाया शायद वो खुद भी इससे वाकिफ होंगे. नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों ने सरकारें बदलवा दीं, मुख्यमंत्री बदलवा दिये. उनके गीतों ने हमेशा जनता में अच्छा संदेश दिया. उनका नाम भले ही पद्म पुरस्कार के लिये नहीं भेजा गया हो, लेकिन उनका सच्चा 'पद्म' जनता का प्यार है।












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