Justice Abdul Nazeer: कौन हैं रिटायर्ड जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जिन्हें राज्यपाल बनाया गया है?
अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर फैसला देने वाली खंडपीठ में शामिल रहे जस्टिस एस. अब्दुल नजीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है। इसके बाद से कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल भाजपा के इस कदम का विरोध कर रहे हैं।

Justice Abdul Nazeer: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बीते दिनों ही देश के 13 राज्यों समेत केंद्रशासित प्रदेशों में नए राज्यपालों की नियुक्ति की है। इनमें से कुछ नए चेहरों को प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया है तो वहीं कुछ पुराने राज्यपालों का भी ट्रांसफर अन्य राज्यों में किया गया है। राष्ट्रपति भवन से जारी राज्यपाल के 13 नामों की लिस्ट में सबसे ज्यादा चर्चा जस्टिस (रिटायर्ड) एस. अब्दुल नजीर को लेकर है। दरअसल जस्टिस एस. अब्दुल नजीर बीते महीने 4 जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट जज के पद से रिटायर हुए हैं। एक महीने बाद 12 फरवरी को उनको आंध्र प्रदेश के गर्वनर की जिम्मेदारी दे दी गई है।
हालांकि, देश में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि कोई जज रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनाया गया है। इससे पहले भी (रिटायर्ड) जस्टिस एम. फातिमा बीबी और (रिटायर्ड) जस्टिस सदाशिवम को गर्वनर बनाया जा चुका है। देश की पहली महिला जस्टिस रहीं एम. फातिमा बीबी, जब साल 1992 में रिटायर हुईं, उसके बाद साल 1997 से 2001 तक उन्होंने तमिलनाडु के राज्यपाल के तौर पर दायित्व निभाया था। वहीं साल 2013 से 2014 तक चीफ जस्टिस रहे पी. सदाशिवम जब रिटायर हुए तब उन्हें केरल का गवर्नर बनाया गया था।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि साल 1952 में यानि पंडित नेहरू की सरकार के दौरान, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रहे जस्टिस सैयद फ़ज़ल अली अपने इस्तीफे के महज 7 दिन बाद ही राज्यपाल बना दिये गये थे। सैयद फ़ज़ल अली 1952 से 1954 तक उड़ीसा राज्यपाल बने रहे। इसके बाद 1956 से 1959 तक उन्होंने असम के राज्यपाल का भी कार्यभार संभाला। अब सवाल यह है कि आखिर जस्टिस (रिटायर्ड) एस. अब्दुल नज़ीर को लेकर इतनी हाय-तौबा क्यों?
कौन हैं जस्टिस अब्दुल नजीर?
जस्टिस एस. अब्दुल नजीर कर्नाटक में दक्षिण कन्नड़ जिले के एक दूर-दराज गांव से आते हैं। नजीर ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था। पिता की मौत के बाद भी पारिवारिक जिम्मेदारियों का वहन करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने महावीरा कॉलेज, मूडबिद्री से बीकॉम की डिग्री लेने के बाद एसडीएम लॉ कॉलेज, मैंगलोर से कानून की डिग्री हासिल की। कानून की डिग्री लेने के बाद नजीर ने 1983 में एक वकील के रूप में दाखिला लिया और बैंगलोर में कर्नाटक हाईकोर्ट में अभ्यास किया। मई 2003 में, उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट के अतिरिक्त जज के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में उन्हें उसी हाईकोर्ट का स्थायी जज नियुक्त किया गया। फरवरी 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के जज के रूप में कार्य करते हुए नजीर को भारत के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया था। वह किसी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने बिना इस तरह से पदोन्नत होने वाले केवल तीसरे जस्टिस बने। सुप्रीम कोर्ट में जज रहने के दौरान उन्होंने देश के कई गंभीर मुद्दों पर फैसले दिये।
जस्टिस नजीर ने सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के मौके पर आयोजित समारोह में कहा था कि वो चाहते तो अयोध्या विवाद में बाकी चार जजों के उलट अपनी राय रखकर अपने समुदाय का हीरो बन जाते, लेकिन उन्होंने देशहित को सर्वोपरि समझा। वहीं इस मौके पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर हमेशा सही के लिए खड़े होते थे और सही और गलत का सामना करने पर तटस्थ रहने वाले नहीं थे। उन्होंने कहा कि जस्टिस नज़ीर का बचपन बहुत संघर्षों में गुजरा है। उन्होंने खेतों और समुद्र तटों पर मछली पकड़ने का भी काम किया है। वह दिल से एक किसान हैं।
जस्टिस नजीर द्वारा दिये गये कुछ खास फैसले
जस्टिस नज़ीर साल 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट से पदोन्नती पाकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इसके बाद करीब 5 साल के कार्यकाल उन्होंने कई बड़े फैसले दिये। जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा इन बड़े फैसलों को लेकर होती है। साल 2018 में तीन तलाक को लेकर बनी 5 जजों की पीठ का वो हिस्सा थे। 3-2 से आए इस फैसले में जस्टिस नज़ीर ने तीन तलाक को असंवैधानिक नहीं माना था। जबकि बाकी के तीन जजों का फैसला अलग था। दूसरा है साल 2019 में ऐतिहासिक अयोध्या मामले में 5 जजों की पीठ का हिस्सा बने। तब पांच जजों की खंडपीठ ने एकमुश्त होकर राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था।
वहीं रिटायरमेंट से ठीक पहले जस्टिस नजीर ने दो फैसले दिये, जो काफी सुर्खियों में रहे। दरअसल अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 4-1 से फैसला सुनाया। इसमें जस्टिस एसए नजीर, जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस बीवी नागरत्ना शामिल थीं। इसमें जस्टिस नजीर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की बोलने की आजादी पर ज्यादा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। किसी की अभिव्यक्ति की आजादी पर कब प्रतिबंध लगेगा, इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 19(2) में पहले से ही प्रावधान है। किसी भी आपत्तिजनक बयान के लिए मंत्री को जिम्मेदार माना जाना चाहिए, न कि सरकार को। हालांकि, जस्टिस नागरत्ना की राय चार जजों से अलग थी। वहीं अंत में सबसे ज्यादा चर्चा जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की तब हुई, जब उन्होंने नोटबंदी को लेकर अपना फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा नोटबंदी को सही माना था।
नज़ीर से विपक्ष क्यों परेशान?
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रिटायर्ड जस्टिस नजीर को राज्यपाल बनाये जाने को लेकर कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि किसी रिटायर्ड जज का राज्यपाल बनना न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करता है। उन्होंने दिवंगत नेता अरुण जेटली के उस बयान को कोट करते हुए कहा कि रिटायर होने के बाद, नौकरी पाने के मकसद से रिटायर होने से पहले फैसले लिखे जाते हैं। ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा है। इस पर बीजेपी के कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि राज्यपाल की नियुक्ति पर एक बार फिर से पूरा इको सिस्टम एक्टिव है। उन्हें बेहतर तरीके से यह समझना चाहिए कि वे अब भारत को अपनी निजी जागीर नहीं मान सकते। अब भारत संविधान के नियमों के अनुसार चलेगा।
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