Justice S Abdul Nazeer कौन हैं ? अयोध्या पर फैसला देने वाले जज, जो बने आंध्र प्रदेश के नए राज्यपाल
केंद्र सरकार ने जस्टिस एस अब्दुल नजीर को आंध्र प्रदेश का नया राज्यपाल नियुक्त किया है। जस्टिस नजीर सुप्रीम कोर्ट रिटायर्ड जज हैं और अयोध्या, नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक फैसलों में शामिल रहे हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज जिन लोगों को नए राज्यपालों के तौर पर नियुक्त किया है, उनमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर का नाम भी शामिल है। उन्हें आंध्र प्रदेश का नया राज्यपाल बनाया गया है, जहां वाईएसआर कांग्रेस की सरकार है और जगन मोहन रेड्डी मुख्यमंत्री हैं। इस तरह से इस समय देश में मुस्लिम राज्यपालों की सूची में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के बाद अब जस्टिस नजीर का नाम भी जुड़ गया है। आइए जानते हैं कि जस्टिस नजीर का करियर कैसा रहा है और उन्हें राज्यपाल बनाए जाने से राजनीति इतनी गर्मायी हुई क्यों है?

आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बने हैं जस्टिस एस अब्दुल नजीर
रविवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जिन 12 प्रदेशों के राज्यपालों की नियुक्ति या ट्रांसफर का आदेश जारी किया है, उसमें जस्टिस एस अब्दुल नजीर (रिटायर्ड) को लेकर खूब चर्चा हो रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कि अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में 9 नवंबर, 2019 को ऐतिहासिक और सर्वसम्मति से फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संविधान पीठ में वे एकमात्र मुस्लिम जज थे। देश के मौजूदा सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ भी बेंच के सदस्यों में शामिल थे। लेकिन, जस्टिस नजीर को आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त किए जाने को लेकर मोदी सरकार के विरोधियों की भवें तन गई हैं। सरकार के कुछ आलोचक तो इस हद तक जा रहे है कि सोशल मीडिया के जरिए जस्टिस नजीर से इस नियुक्ति को ठुकराए जाने तक की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन, हम यहां यह जानना चाहते हैं कि जस्टिस एस अब्दुल नजीर हैं कौन ?

अयोध्या पर सर्वसम्मति से आए फैसले में शामिल
जस्टिस एस अब्दुल नजीर का न्यायपालिका में लंबा करियर रहा है। अयोध्या के ऐतिहासिक फैसले समेत सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े फैसलों वाली बेंच में उनकी भूमिका रही है। इनमें नोटबंदी, ट्रिपल तलाक और फ्रीडम ऑफ स्पीच जैसे मामले शामिल हैं। जस्टिस अब्दुल नजीर ने फरवरी 1983 से वकालत शुरू की और 20 वर्षों तक कर्नाटक हाई कोर्ट में प्रैक्टिस किया। उसी अदालत में मई 2003 में उन्हें एडिश्नल जज के तौर पर नियुक्त किया गया और एक साल से कुछ ज्यादा समय बाद सितंबर 2004 में वे हाई कोर्ट के स्थायी जज बना दिए गए।

फरवरी 2017 में बने सुप्रीम कोर्ट के जज
6 साल पहले फरवरी 2017 में जस्टिस एस अब्दुल नजीर को कर्नाटक हाई कोर्ट के जज से प्रोन्नति देकर सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। सर्वोच्च अदालत में वे कई महत्वपूर्ण संवैधानिक पीठ में शामिल रहे, जिनमें से अयोध्या में रामजन्मभूमि का ऐतिहासिक फैसला और 'निजता का अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने वाला मामला भी शामिल है। अगस्त 2017 में आए ट्रिपल तलाक मामले की सुनवाई करने वाली बेंच में वे अकेले मुस्लिम जज थे। जस्टिस नजीर और जस्टिस जेएस खेहर ने फैसला दिया था कि पर्सनल कानूनों में सुप्रीम कोर्ट दखल नहीं दे सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से दिए फैसले में मुसलमानों में इंस्टेंट तलाक की प्रथा को 'गैरकानूनी' और 'असंवैधानिक' घोषित कर दिया था। (ऊपर की तस्वीर सौजन्य-विकिपीडिया)

नोटबंदी के फैसले पर भी लगाई मुहर
जस्टिस नजीर की अगुवाई वाली एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक पीठ ने केंद्र सरकार के 8 नवंबर, 2016 के नोटबंदी के फैसले को 4:1 के बहुमत से जायज करार दिया था। अदालत ने कहा था कि नोटबंदी का निर्णय 'न तो त्रुटिपूर्ण है और न ही जल्दबाजी' में लिया गया है। जस्टिस नजीर उस बेंच में भी शामिल थे, जिसने यह फैसला दिया था कि एक राज्य के अनुसूचित जाति/ जनजाति के सदस्य किसी दूसरे राज्य में सरकारी नौकरी या नामांकन में आरक्षण का दावा नहीं कर सकते, अगर वहां उनकी जाति को यह सुविधा नहीं दी गई है।
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4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से हुए रिटायर
जस्टिस नजीर की अगुवाई वाली बेंच ने यह भी फैसला सुनाया था कि सार्वजनिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति के बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि संविधान में इस तरह का निषेध पहले से ही उपलब्ध है। जस्टिस नजीर उस बेंच में भी शामिल रहे, जिसने फैसला दिया कि संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में बेटियों को भी अधिकार है, चाहे उसके पिता की मौत हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 आने से पहले ही क्यों न हुई हो। जस्टिस एस अब्दुल नजीर इसी साल 4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए हैं।
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