क्या है किसानों की आय और FRP व MSP में संबंध?
28 जून 2023 को केंद्र सरकार ने किसानों को एक खुशखबरी दी। दरअसल, सरकार ने गन्ना पैदा करने वाले किसानों के उचित एवं लाभकारी मूल्य (फेयर एंड रिम्यूनिरेटिव प्राइस - एफआरपी) में ₹10 प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी की है। यह बढ़ोत्तरी आगामी गन्ना सत्र 2023-24 के लिए लागू होगी। इस बढ़ोत्तरी के साथ अब गन्ने का एफआरपी ₹305 प्रति क्विंटल से बढ़कर ₹315 प्रति क्विंटल हो जायेगा।
क्या होता है एफआरपी
एफआरपी यानि उचित एवं लाभकारी मूल्य, गन्ने का एक अनिवार्य मूल्य होता है, जिसका भुगतान भारत की चीनी मिलों को अनिवार्य रूप से करना होता है। चीनी मिलें इस एफआरपी से कम मूल्य पर किसानों से गन्ना नहीं खरीद सकती है। यह एफआरपी मूल्य गन्ने की 10.25 प्रतिशत मूलभूत रिकवरी दर (1 क्विंटल गन्ने से 10.25 किलो चीनी उत्पादन) के लिए है। अगर इस रिकवरी दर में 0.1 प्रतिशत की वृद्धि होती है तो चीनी मिल किसानों को 3.07 रूपये प्रति क्विंटल प्रीमियम देना होगा। अगर रिकवरी में 0.1 प्रतिशत की कमी होती है तो 3.07 रूपये प्रति क्विंटल की कटौती हो सकती है।

कैसे निर्धारित होता है एफआरपी
देशभर में गन्ने के एफआरपी का भुगतान आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईएसी), 1955 के अंतर्गत जारी गन्ना नियंत्रण आदेश 1966 द्वारा नियंत्रित है। 22 अक्टूबर 2009 को गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 में संशोधन किया गया था। जिसमें गन्ने के एसएमपी (वैधानिक न्यूनतम मूल्य) की अवधारणा को चीनी के लिए गन्ने के 'उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी)' में बदल दिया गया। एफआरपी की सिफारिश कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा की जाती है और प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) द्वारा यह घोषित होता है।
गन्ने का एफआरपी भुगतान मूल रूप से गन्ने से प्राप्त चीनी (चीनी रिकवरी) पर आधारित होता है। इसके अलावा भी कुछ मानकों के आधार पर एफआरपी निर्धारित होता है। जैसे गन्ने की उत्पादन लागत, उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर चीनी की उपलब्धता, चीनी उत्पादकों द्वारा बेची गई चीनी का मूल्य, गन्ने से उत्पादित चीनी की मात्रा, गन्ने से उप-उत्पादों की बिक्री से प्राप्त आय (गुड़ और खोई) और गन्ना उत्पादकों के लिए जोखिम व मुनाफा।
पिछले 10 सालों में एफआरपी में बढ़ोत्तरी
वर्ष 2010-11 से 2017-18 के बीच बेसिक रिकवरी स्तर यानि चीनी रिकवरी स्तर 9.5 प्रतिशत रहा। जबकि एफआरपी, जो 2010-11 में ₹139.12 प्रति क्विंटल था, 2017-18 तक बढ़कर ₹255 हो गया। यानि इन 7 वर्षों में एफआरपी में लगभग 82 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
इसी प्रकार 2018-19 से लेकर 2021-22 तक बेसिक रिकवरी स्तर 10 प्रतिशत रहा जबकि एफआरपी में बढ़ोतरी 17.5 प्रतिशत हुई। जिसके चलते एफआरपी ₹255 से बढ़कर ₹290 प्रति क्विंटल हो गया। फिर 2022-23 में बेसिक रिकवरी स्तर को बढ़ाते हुए 10.25 प्रतिशत किया गया और एफआरपी भी ₹15 की बढ़ोतरी के साथ ₹305 प्रति क्विंटल पहुंच गया। जबकि अब यह 2023-24 के लिए ₹315 प्रति क्विंटल हो गया है। इस प्रकार पिछले करीब 13 सालों में एफआरपी में लगभग 125 प्रतिशत को बढ़ोतरी की गयी है।
FRP व MSP में अंतर
एफआरपी यानि उचित एवं लाभकारी मूल्य, वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर चीनी मिलें किसानों से गन्ना खरीदती हैं। गन्ना उद्योग में एमएसपी के स्थान पर एफआरपी का उपयोग किया जाता है, जो गन्ना उद्योग के पुनर्गठन की रंगराजन समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। एफआरपी, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) द्वारा घोषित किया जाता है।
वहीं एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसी भी फसल का वह न्यूनतम मूल्य होता है जिसे सरकार किसानों के लिए लाभकारी मानकर सरकारी एजेंसियां किसानों की फसल की खरीद करती है। एमएसपी, कृषि और सहकारिता विभाग तथा भारत सरकार की सिफारिशों पर कृषि लागत और मूल्य आयोग घोषित करता है।
वर्तमान चीनी सीजन 2022-23 में, चीनी मिलों द्वारा ₹1,11,366 करोड़ के मूल्य से लगभग 3,353 लाख टन गन्ने की खरीद की गयी। यह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की फसल की खरीद के बाद दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक व उपभोक्ता
साल 2021-22 में 5 हजार लाख मीट्रिक टन से भी ज्यादा गन्ने का उत्पादन देश में हुआ था। जिसका करीब 70 प्रतिशत (3574 लाख मीट्रिक टन) गन्ने से चीनी मिलों ने 394 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन किया। वहीं रिकार्ड 109.8 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया गया। जिससे लगभग ₹40,000 करोड़ की आय भारत को हुई। भारत अब दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक व उपभोक्ता बन गया है। इसके साथ-साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक भी बन गया है।
इसी सत्र में कुल चीनी उत्पादन से 59 लाख मीट्रिक टन चीनी का प्रयोग इथेनॉल बनाने में भी किया गया। इस इथेनॉल से चीनी मिलों व इससे जुड़े अन्य व्यवसायियों ने करीब ₹18,000 करोड़ अर्जित किये। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत 2025-26 तक विश्व में तीसरा सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक देश बन सकता है।












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