Anti-Defection Law: आखिर क्या है दल-बदल कानून और कैसे विधायक-सांसद की चली जाती है सदस्यता?
एक बार फिर से महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल की राजनीति जोरों पर है। खतरे में है एनसीपी पार्टी। जानें दल-बदल कानून के बारे में सबकुछ।

Anti-Defection Law: महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर से जल्द ही कुछ बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। खबरों के मुताबिक शरद पवार की पार्टी एनसीपी (नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी) के 13 विधायक बीजेपी के संपर्क में बताए जा रहे हैं। खबर है कि ये सभी विधायक एनसीपी छोड़ बीजेपी ज्वाइन करने का विचार कर रहे हैं। हालांकि, किसी विधायक द्वारा दल बदलने की प्रक्रिया देश में कोई नयी बात नहीं है।
इससे पहले गोवा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और महाराष्ट्र समेत कई अन्य राज्यों में समय-समय पर बागी विधायक या सांसद दल-बदल करते रहे हैं। इसके लिए एक कानून भी है जिसे दल-बदल कानून कहते हैं। आइए, जानते हैं कि क्या है दल-बदल कानून? क्या इस कानून से विधायकों या सांसदों की सदस्यता भी जा सकती है?
दल-बदल कानून क्या है?
साल 1967 के आम चुनाव के बाद कई राज्यों के विधायकों द्वारा इधर-उधर या दूसरी पार्टी में जाने की वजह से कई राज्यों की सरकारें गिर गईं। उसके बाद ऐसा बार-बार होने लगा। इसे रोकने के लिए साल 1985 में दल-बदल कानून लाया गया। संसद ने 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची में इसे जगह दी। इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में दलबदल की कुप्रथा को समाप्त करना था। विधायक या सांसद बनने के बाद खुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल कानून में आता है।
● इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित तब किया जा सकता है यदि छह महीनों की अवधि के बाद कोई मनोनीत सदस्य किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है;
● वहीं किसी सदस्य द्वारा सदन में पार्टी के रुख के विपरीत वोट करना भी उसे अयोग्य घोषित करवा सकता है;
● साथ ही कोई सदस्य अगर स्वयं को पार्टी की वोटिंग से अलग रखता है तब भी;
● अगर कोई स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना चाहता है तब भी उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। जैसे जनता दल (यूनाइटेड) के दो सदस्यों को साल 2017 में राज्यसभा के सभापति द्वारा 'अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने' के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
अयोग्य घोषित नहीं करने का आधार
वैसे इस कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें दलबदल करने पर भी सदस्यों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता। दल बदल विरोधी कानून के मुताबिक, एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में या उसके साथ विलय की अनुमति है।
बशर्ते उसके कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों। कुल मिलाकर कहें तो अगर किसी पार्टी से दो तिहाई सदस्य टूटकर दूसरी पार्टी में जाते हैं तो उनका विधायक/सांसद का पद बना रहेगा। वहीं अगर संख्या इससे कम होती है तो उन्हें विधायक/सांसद के पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।
कौन कर सकता है अयोग्य घोषित?
दल-बदल कानून के तहत सदन के अध्यक्ष के पास ही सदस्यों को अयोग्य करार देने संबंधी निर्णय लेने की शक्ति दी गई है। वहीं अध्यक्ष जिस दल से है, यदि शिकायत उसी दल से संबंधित है तो सदन द्वारा चुने गये, किसी अन्य सदस्य को इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार होता है।
अगर स्पीकर/चेयरमैन जनप्रतिनिधि को अयोग्य करार दें तो वह उस सत्र के दौरान चुनाव नहीं लड़ सकता। अगले सत्र में वह उम्मीदवार हो सकता है। 'अयोग्य' करार दिये गये किसी भी सदस्य को कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री नहीं बनाया जा सकता है।
इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल कानून
● जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी किसी अन्य राजनीतिक पार्टी के साथ मिल जाती है।
● अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं।
● वहीं किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते हैं।
● जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं।
पहले भी कई बार हो चुका है दल-बदल?
वैसे किसी पार्टी के विधायकों द्वारा दल-बदल की राजनीति करना कोई नई बात नहीं है। जून 2022 में महाराष्ट्र में शिवसेना के 40 विधायकों ने एकनाथ शिंदे की अगुवाई में अपनी पार्टी के तत्कालीन मुखिया उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। वहीं साल 2019 में गोवा में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों ने अपनी विधायक पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया था। उसी साल, राजस्थान में छह बसपा विधायकों ने अपनी पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय कर दिया। इसी तरह सिक्किम में भी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के 15 में से 10 विधायक बीजेपी में आ गये थे।
दल-बदल पर महाराष्ट्र की चर्चा क्यों?
दरअसल महाराष्ट्र की बात करें तो उद्धव गुट के बाद अब शरद पवार को भी बड़ा झटका लग सकता है। खबरों के मुताबिक एनसीपी के 13 विधायक, बीजेपी से सीधे संपर्क में हैं। वहीं अजीत पवार की अगुवाई में एनसीपी के तकरीबन 30 विधायक बीजेपी सरकार में शामिल हो सकते हैं। जिसे लेकर दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक सरगर्मी बढ़ी हुई है। खबर ये भी है कि शरद पवार अपने विधायकों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन बात नहीं बन रही है। आइए जानते हैं महाराष्ट्र में क्या है गठबंधनों की स्थिति?
एनडीए और एमवीए में शामिल दल
महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सदस्य हैं। वहीं एनडीए गठबंधन के साथ जो दल हैं उनके विधायकों की संख्या 162 हैं। जिसमें भाजपा - 105, शिवसेना (शिंदे गुट) - 40, प्रखर जनशक्ति पार्टी - 2, अन्य दल - 3 और निर्दलीय - 12 विधायक शामिल हैं।
जबकि विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी (MVA) की बात करें तो उनके पास कुल 121 विधायक हैं। सर्वाधिक विधायक (53) एनसीपी के ही हैं। जिसमें एनसीपी - 53, कांग्रेस - 45, शिवसेना (उद्धव गुट) - 17, सपा- 2 और अन्य दलों - 4 के विधायक शामिल हैं।
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वहीं इनके अलावा पांच और विधायक हैं जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। इसमें बहुजन विकास अघाड़ी के तीन विधायक और एआईएमआईएम के दो विधायक हैं।
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