Heatwave: लू अर्थात हीटवेव क्या होती है? भारत सहित कई देश इसकी चपेट में, लाखों मौतों का है कारण
पिछले कुछ दशकों से भारत समेत पूरी दुनिया में हीटवेव की घटनाओं में लगातार वृद्धि ने जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

Heatwave: इस बार फरवरी महीने में ही मई और जून जैसी गर्मी का अहसास होने लगा है। यह एक गंभीर खतरे का संकेत है। दरअसल, भारतीय मौसम विभाग (India Metrological Department) ने हीटवेव का नया अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार इस बार फरवरी महीने का बढ़ा हुआ तापमान पिछले 122 साल में सबसे ज्यादा गर्म रहा है। इससे पहले पूरे भारत में इतना ज्यादा औसत मासिक अधिकतम तापमान साल 1901 में दर्ज किया गया था। वहीं विभाग ने 31 मई तक देश के अधिकतर हिस्से में भयानक हीटवेव चलने की भविष्यवाणी की है।
हीटवेव क्या होती है?
हीटवेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि को कहते हैं। जब तापमान किसी क्षेत्र के औसत उच्च तापमान से अधिक हो जाता है तो उसे हीटवेव या लू कहते हैं। भारत मौसम विभाग के अनुसार, जब मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो हीटवेव चलने लगती है।
यानि उस क्षेत्र का जो औसत उच्च तापमान है उससे 6.4 डिग्री बढ़ जाये और तापमान लगभग 40 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए, तो इसे एक गंभीर हीटवेव कहा जाता है। वहीं तटीय क्षेत्रों में जब औसत उच्च तापमान से 4.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाए, यानि लगभग 37 डिग्री सेल्सियस तापमान हो जाए तो उसे हीटवेव कहा जायेगा।
हीटवेव को मोटे तौर पर एक जलवायु संबंधी घटना के रूप में देखा जा सकता है। इसमें आस-पास के पर्यावरणीय कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, उच्च वायुमंडलीय दबाव प्रणाली के कारण वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर रहने वाली हवा को नीचे लाकर घुमाती है। इससे हवा में संकुचन के कारण तापमान बढ़ता है और हवा वहां से निकल नहीं पाती। इससे हीटवेव पैदा होती है।
भारत में हीटवेव से प्रभावित राज्य
भारत में गर्मी के महीनों में हीटवेव चलना एक आम बात है। मानसून (जून) की शुरुआत से पहले के महीनों में देश के ज्यादातर क्षेत्र हीटवेव का सामना करते हैं। साल 2013 में एक अध्ययन के अनुसार उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी, मध्य, पूर्वी और प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों सहित करीब आधा भारत गर्मियों के दौरान लगभग 8 दिनों तक हीटवेव झेलता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में हीटवेव की लहरें आमतौर पर मार्च से जून तक होती हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में जुलाई तक भी बढ़ जाती हैं। देश के उत्तरी भागों में हर साल औसतन पांच-छह हीटवेव की घटनाएं होती हैं। वहीं कभी कभार ये घटनाएं हफ्तों तक चलती हैं। इससे भारत की बड़ी आबादी प्रभावित होती है।
दुनिया का बड़ा हिस्सा हीटवेव की चपेट में
वर्ल्डइकॉनोमिक फॉरम के अनुसार अब धीरे-धीरे दुनिया इस हीटवेव के चपेट में आती जा रही है। हीटवेव के कारण यूरोप के कई जंगलों में भयानक आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। वहीं पूरे यूरोप में लाखों लोगों को इसने प्रभावित किया है। जबकि भारत और पाकिस्तान से लेकर ट्यूनीशिया और यूरोप तक कई देश साल 2022 के पहले से ही गर्मी की लहरों का सामना कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन गर्मी की लहरों को बदतर बना रहा है।
हीटवेव का पूर्व अनुमान
हीटवेव का पूर्व अनुमान आजकल की सेटेलाइट तकनीक के माध्यम से संभव है। इस पूर्व अनुमान से संभावित खतरों को कम किया जा सकता है। गौरतलब है कि भारतीय मौसम विभाग हीटवेव आने का अनुमान लगभग चार सप्ताह पहले ही लगा सकता है। इसके बाद उप-मण्डल स्तर पर ग्राफिकल चेतावनियां तैयार कर इसे साप्ताहिक तौर पर जारी किया जाता है।
हीटवेव से कितनी मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। अत्यधिक तापमान बढ़ने के कारण विश्व स्तर पर भी इसका असर हो रहा है। साल 2000 से 2016 के बीच हीटवेव के संपर्क में आने वालों की संख्या लगभग 125 मिलियन हो गई थी। वहीं अकेले 2015 में किसी अन्य साल की तुलना में 17.5 करोड़ अधिक लोग हीटवेव की चपेट में आये थे।
इस हीटवेव के कारण साल 2010 में अकेले रूस में 44 दिनों की भीषण गर्मी के दौरान 56,000 मौतें हुईं। जबकि metoffice.gov.uk के मुताबिक अगस्त 2003 में यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की लहर के कारण 20,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। यही नहीं, फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में भी गर्मी के कारण पूरे पश्चिमी यूरोप में 20,000 से अधिक मौतें हुईं।
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मेडिकल जगत की प्रसिद्द अंतरराष्ट्रीय पत्रिका लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से भारत में सालाना 740,000 लोगों पर मौत का साया मंडरा रहा है।
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