El Nino and La Nina: क्या हैं अल नीनो और ला नीना, जो बदल डालते हैं मौसम का चक्र
दुनियाभर में अल नीनो का असर महसूस किया जाता है। जिसके कारण बारिश, ठंड, गर्मी सब में अंतर दिखाई देता हैं। इसके कारण कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं बाढ़ आ जाती है।

देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी पड़ रही है। इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का न सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है बल्कि देश के कई हिस्सों में सूखे की स्थिति भी पैदा होने लगती है। अभी बीते दिनों ही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट आई थी। जिसमें कहा गया था कि आने वाले महीनों में अल-नीनो का प्रभाव दुनिया के कई देशों पर पड़ेगा।
अल नीनो का भारत जैसे कई कृषि प्रधान देशों पर बेहद बुरा प्रभाव देखने को मिल सकता है। वैसे क्या आपने कभी सोचा है कि ये अल नीनो या ला नीना क्या हैं? इनका हम पर और हमारे मौसम पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है? क्या इसका असर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी पड़ता है?
अल नीनो और ला नीना में अंतर?
अमेरिकन जियोसाइंस इंस्टिट्यूट के मुताबिक अल नीनो और ला नीना शब्द का संदर्भ प्रशांत महासागर की समुद्री सतह के तापमान में समय-समय पर होने वाले बदलावों से है, जिसका असर दुनियाभर के देशों में मौसम पर पड़ता है।
अल नीनो की वजह से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (पृथ्वी का वह भूभाग जो कर्क और मकर रेखाओं के बीच में पड़ता है) एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और मध्य अमेरिका का तापमान गर्म हो जाता है। जबकि ला नीना के कारण इन देशों का मौसम ठंडा हो जाता है। अल नीनो और ला नीना आमतौर पर 9-12 महीनों तक रहते हैं, लेकिन असाधारण मामलों में कई वर्षों तक भी टिके रह सकते हैं।
अल नीनो किसे कहते है?
अल नीनो एक जलवायु घटना है। जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह सामान्य से 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाती है। इस गर्मी की वजह से समुद्र में चल रही हवाओं के रास्ते और रफ्तार में परिवर्तन होने लगते हैं। इस परिवर्तन के कारण मौसम चक्र बुरी तरह से प्रभावित होता है और पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली हवाएं कमजोर पड़ती हैं। साथ ही पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र का गर्म पानी भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ने लगता है। इसका सीधा असर जलवायु के परिवर्तन पर पड़ता है। इसके कारण कई देशों में भीषण बारिश तो कई जगहों में सूखा पड़ सकता है।
साल 1982-83 और साल 1997-98 में अल नीनो ने दुनिया को सबसे ज्यादा प्रभावित किया था। 1982-83 की अल नीनो के कारण पूर्वी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्र सतह का तापमान सामान्य से 9-18 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो गया था। जबकि साल 1997-98 में इसके कारण इंडोनेशिया, मलेशिया और फिलीपींस में सूखा पड़ गया था। जबकि पेरू और कैलिफोर्निया में भारी बारिश और बाढ़ का सामना करना पड़ा।
ला नीना किसे कहते है?
ला नीना का स्पेनिश मतलब है 'छोटी लड़की'। इसे एक शीत घटना भी कहा जाता है। यह स्थिति भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर क्षेत्र के सतह पर हवा का कम दबाव होने से पैदा होती है। ला नीना बनने के कई अलग-अलग कारण माने जाते हैं। लेकिन सबसे प्रमुख कारण है, जब ट्रेड विंड, पूर्व से बहने वाली हवाएं काफी तेज गति से बहती हैं तो समुद्र की सतह का तापमान गिरने लगता है। इस कम होते तापमान को ही ला नीना कहते हैं। इस स्थिति का पैदा होना पूरी दुनिया के तापमान पर असर डालता है और इसके कारण उस वर्ष तापमान औसत से ज्यादा ठंडा हो जाता है।
ला नीना का असर दुनियाभर में आने वाले साइक्लोन पर पड़ता है। ये अपनी गति के साथ उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की दिशा को बदल देता है। जिसकी वजह से दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में बहुत ज्यादा नमी वाली स्थिति पैदा हो जाती है। जबकि इंडोनेशिया और उसके आसपास के क्षेत्र में भारी वर्षा होने लगती है। जबकि इक्वाडोर और पेरू में सूखा पड़ सकता है। ला नीना ही ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ लाने की वजह बनता है और इसके कारण उत्तर-पश्चिम में मौसम ठंडा और दक्षिण-पूर्व में मौसम गर्म होता है। भारत में इस दौरान भयंकर ठंड पड़ती है, और ठीक-ठाक बारिश होती है। ला नीना के कारण उत्तरी यूरोप खासतौर पर ब्रिटेन में कम सर्दी और दक्षिणी/पश्चिमी यूरोप में ज्यादा सर्दी पड़ती है, जिसके कारण भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बर्फबारी होती है।
भारत में अल नीनो को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक अल नीनो जुलाई के अंत तक आ सकता है। जुलाई में इसके आने की संभावना 60 प्रतिशत और सितंबर के अंत तक 80 प्रतिशत है। भारत में मानसून के दौरान अल नीनो की संभावना 70 प्रतिशत तक है। डब्ल्यूएमओ के क्षेत्रीय जलवायु पूर्वानुमान सेवा प्रभाग के प्रमुख विल्फ्रान मौफौमा ओकिया ने स्विट्जरलैंड के जेनेवा में कहा था कि यह दुनियाभर में मौसम और जलवायु की प्रणाली को बदल देगा।
अल नीनो का भारत पर क्या होगा असर?
मौसम वैज्ञानिकों ने साल 2023 में अल नीनो के प्रभाव की चेतावनी दी है। यह भारत के लिए बिल्कुल ही अच्छी खबर नहीं है क्योंकि अल-नीनो के कारण सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कई राज्यों में जलाशय सूख सकते हैं और नदियों में भी पानी की कमी हो सकती है।
ध्यान रहे कि गर्मी का सबसे ज्यादा असर रबी की फसलों पर पड़ता है। रबी की फसलों में गेहूं सहित जौ, चना, मसूर और सरसों आती हैं। भारत गेहूं उत्पादन में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। भयंकर गर्मी की स्थिति के कारण साल 2022 में गेहूं उत्पादन में 23 मिलियन टन की कमी आई थी। साल 2021 में भारत ने 129 मिलियन टन गेहूं उत्पादन किया था, जो 2022 में घटकर 106 मिलियन टन पर पहुंच गया था। अतः अल नीनो का असर देश के खाद्यान्न उत्पादन पर भी पड़ने की सम्भावना है।












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