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Bharat Ratna: क्या है भारत रत्न? जानिए इस सम्मान की प्रक्रिया और इसके लाभ

Bharat Ratna: केंद्र सरकार ने मंगलवार को एक बड़ा ऐलान किया। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और 'जननायक' के नाम से पहचान रखने वाले कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा।

जानते हैं कि भारत रत्न सम्मान का इतिहास क्या है और यह सम्मान किसे दिया जाता है।

What is Bharat Ratna

भारत रत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जो किसी क्षेत्र में असाधारण और सर्वोच्च सेवा को मान्‍यता देने के लिए दिया जाता है। यह सम्मान राजनीति, कला, साहित्‍य, विज्ञान के क्षेत्र में किसी विचारक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और समाजसेवी को दिया जाता है। इसकी शुरुआत 2 जनवरी, 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। ये सम्मान जीवित और मरणोपरांत दोनों तरह के लोगों को दिया जाता है।

एक साथ तीन महापुरुषों को मिला था पहले पहल यह सम्मान

सबसे पहले 'भारत रत्न' प्राप्त करने वालों में एक नहीं तीन महापुरुष थे। ये थे भारत के अंतिम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, पहले उपराष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर चंद्रशेखर वेंकट रमन। इन तीनों को 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की अधिकारिक वेबसाइट के अनुसार अब तक 49 व्यक्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है।

भारत रत्न के लिए चुनने की क्या है प्रक्रिया

भारत रत्न किसे दिया जा रहा है कि इसकी आधिकारिक घोषणा भारत के राजपत्र में अधिसूचना जारी कर की जाती है। यह सम्मान हर साल 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को दिया जाता है। भारत रत्न किसे दिया जाए इसके चुनने की प्रक्रिया पद्म पुरस्कारों से अलग होती है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री किसी योग्य व्यक्ति के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति को करते हैं।

भारत रत्न के लिए किसी औपचारिक सिफारिश की जरूरत नहीं होती है। यह सम्मान एक साल में अधिकतम तीन लोगों को ही दिया गया है। वहीं ये भी जरूरी नहीं कि हर साल भारत रत्न सम्मान दिया ही जाए। भारत सरकार की अधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक आखिरी बार ये सम्मान साल 2019 में तीन लोगों को दिया गया था। तब नानाजी देशमुख (मरणोपरांत), कला क्षेत्र में डॉक्टर भूपेन हजारिका (मरणोपरांत) और लोक-कार्य के लिए भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

भारत रत्न सम्मानित लोगों को क्या दिया जाता है?

भारत रत्न से सम्मानित शख्स को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित एक सर्टिफिकेट और पदक प्रदान किया जाता है। हालांकि, इस सम्मान में कोई धनराशि नहीं दी जाती है। भारत रत्न से सम्मानित शख्स को जो पदक दिया जाता है। वह पीपल के पत्ते जैसा दिखता है, जो शुद्ध तांबे का होता है। इसकी लंबाई 5.8 सेमी लंबा, चौड़ाई 4.7 सेमी और मोटाई 3.1 मिमी होती है। पत्ते पर प्लैटिनम का चमकता सूर्य बना हुआ होता है। इसका किनारा भी प्लैटिनम का ही होता है। भारत रत्न पदक के दूसरे हिस्से यानी नीचे की तरफ चांदी से हिंदी में भारत रत्न लिखा होता है। जबकि पीछे की तरफ अशोक स्तंभ के नीचे हिंदी में 'सत्यमेव जयते' लिखा होता है।

वैसे इस सम्मान को पाने वालों को सरकारी महकमे कई अन्य तरह की सुविधाएं देते हैं। उदाहरण के लिए रेलवे की ओर से मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है। मुख्य अहम सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए न्योता मिलता है। सरकार वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंस में उन्हें जगह देती है। जिन्हें यह सम्मान मिलता है उन्हें प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, पूर्व राष्ट्रपति, उपप्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के बाद जगह दी जाती है। साथ ही राज्य सरकारें भी भारत रत्न पाने वाले लोगों को कई तरह की सुविधाएं देती हैं।

भारत रत्न से जुड़ी कुछ अन्य खास बातें

साल 2013 में पहली बार खेल के क्षेत्र में सर्वोच्च योगदान देने वालों को भी भारत रत्न देने का निर्णय लिया गया। इसके बाद ही साल 2014 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

भारत रत्न देश के नागरिकों के अलावा गैर भारतीयों को भी दिया जाता है। जैसे मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया। स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खान (भारत में जन्मे और बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए) को 1987 में दिया गया। जबकि साउथ अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला को 1990 में यह सम्मान दिया गया।

इतिहास में भारत रत्न को दो बार निलंबित भी किया जा चुका है। मोरारजी देसाई की सरकार ने जुलाई 1977 से जनवरी 1980 तक के लिए इसे निलंबित किए रखा था। इंदिरा गांधी ने दुबारा इसे शुरू किया। दूसरी बार अगस्त 1992 से दिसंबर 1995 तक इसे निलंबित किया गया। इन पुरस्कारों की 'संवैधानिक वैधता' को चुनौती देते हुए दो जनहित याचिकाएं दायर की गईं। एक केरल हाईकोर्ट में और दूसरी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में। मुकदमे के समापन के बाद दिसंबर 1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुरस्कारों को फिर से शुरू करने की मंजूरी दे दी।

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