Vijay Diwas 16 December: जब पाक सेना ने किया सरेंडर, एक भारतीय सैनिक के डर से टैंक छोड़ भागे पाकिस्तानी
3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी वायुसेना ने अचानक भारतीय सीमा पर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया।

Vijay Diwas 16 December: साल 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ी गयी यह जंग केवल भारत ही नहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश के इतिहास में हमेशा अमर रहेगी। लगभग दो हफ्ते (3-16 दिसंबर) तक चले इस युद्ध के बाद भारत ने पाकिस्तान के नक्शे से एक हिस्सा कम दिया था और दुनिया के लिए एक नए मुल्क का उदय हुआ, जिसका नाम हुआ 'बांग्लादेश'। ये सब हुआ भारतीय सेना के साहस के कारण 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को भारतीय सेना के सामने घुटने टेकने पड़े थे। अपनी इस जीत को याद रखने के लिए हिंदुस्तान विजय दिवस के रुप में मनाता है।
कैसे हुई युद्ध की शुरुआत
1970 का साल खत्म हो रहा था। पाकिस्तान में आम चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान आवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टी को 160 सीटें मिली थीं, जबकि 300 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान हुआ, उनमें से 162 पूर्वी पाकिस्तान में और 138 पश्चिमी पाकिस्तान में थे। पश्चिमी पाकिस्तान में पीपीपी को केवल 81 सीटों पर जीत मिली। यानि परिणाम के हिसाब से अवामी लीग ने 160 सीटों को जीत कर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जो सभी पूर्वी पाकिस्तान में थी। यह हार पाकिस्तान के जनरलों और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो को बर्दास्त नहीं हुई। इसके बाद पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच पहले से भाषा और संस्कृति को लेकर विवाद चल ही रहे थे, इसके बाद तनाव हद से ज्यादा बढ़ गया।
इसके बाद पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर अत्याचार शुरू कर दिया। तब पूर्वी पाकिस्तान यानि बांग्लादेश के लोग भागकर भारत आने लगे और भारत सरकार से मदद मांगने लगे। अत्याचार बढ़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर दवाब बढ़ने लगा और फिर भारत-पाकिस्तान के बीच 3 दिसंबर से युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में भारत के कई जांबाज सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। आज हम आपको ऐसे ही कुछ सैनिकों की कहानी सुनाएंगे, जिसके बारे में नहीं सुना होगा आपने..
परमवीर चक्र विजेता सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल
अर्चना बिष्ट रावत अपनी किताब '1971: चार्ज ऑफ द गोरखा एंड अदर स्टोरीज़' में लिखती हैं कि सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल भारत का वो जांबाज सैनिक था, जिसकी बहादुरी देख पाकिस्तानी भी सलाम करते हैं। दरअसल उनकी तैनाती जम्मू पंजाब के शकरगढ़ सेक्टर में थी। यह सैक्टर दोनों देशों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां से जाने वाली रोड जम्मू को पंजाब से जोड़ती थी। इस रोड के बीच से बहने वाले नदी बसंतर के पुल पर अगर पाकिस्तान का कब्जा हो जाता तो वह जम्मू को पंजाब से तोड़ सकता था।
15 दिसंबर की रात नौ बजे थे जब 47वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड ने इस इलाके को अपने कब्जे में ले लिया था लेकिन इसके बावजूद स्थिति बड़ी नाजुक थी क्योंकि पाकिस्तान ने वहां माइंस बिछाई हुई थीं। जिसके चलते '17 पूना हॉर्स' के टैंक्स आगे नहीं बढ़ सकते थे। इन माइंस को हटाने की जिम्मेदारी इंजीनियर कोर की थी। जो अभी आधी ही माइंस हटा पाई थी जब पता चला कि पाकिस्तान अपने टैंक्स लेकर आगे बढ़ रहा था। ऐसे में 17 पूना हॉर्स ने तय किया कि माइंस के बीच ही टैंक उतारने होंगे।
पीछे हटना जानता ही नहीं थे खेत्रपाल
वहीं 16 दिसंबर की तड़के ही पाकिस्तान के 13 लांसर्स ने हमला कर दिया। 13 लांसर्स के पास अमेरिकी मेड 50 टन के पैटन टैंक थे। जब भारतीय 17 पूना हॉर्स के पास वर्ल्ड वॉर के जमाने के ब्रिटिश मेड सेंचुरियन टैंक थे। 17 पूना हॉर्स की A और B दो स्वाड्रन थीं। लांसर्स ने B स्क्वाड्रन पर हमला किया तो उन्होंने A स्क्वाड्रन से मदद मांगी। A स्क्वाड्रन के टैंक मदद के लिए आगे बढ़े। इन्हीं A स्क्वाड्रन के एक टैंक में अरुण खेत्रपाल सवार थे। कई घंटे भीषण युद्ध हुआ और एक के बाद एक पाकिस्तान के 7 टैंक उड़ा दिए। इसी बीच अरुण खेत्रपाल के टैंक पर भी एक गोला लगा, जिससे उनके टैंक में आग लग गई। कहते हैं कि उनके सीनियर ने उन्हें टैंक छोड़ने का आदेश दिया लेकिन अरुण तैयार नहीं थे। उन्होंने रेडियो से सन्देश भेजा, "No, Sir, I will not abandon my tank, My main gun is still working and I will get these bastards" (सर मैं टैंक नहीं छोडूंगा, मेरी मेन बन्दूक अभी भी काम कर रही है)।
सभी टैंक को अकेले उड़ा दिया
अरूण खेत्रपाल ने अपना रेडियो बंद कर दिया। वहीं उन्होंने जलते हुए टैंक से ही पाकिस्तान के चार टैंक उड़ा दिए और वहीं डटे रहे। उनके सामने अब सिर्फ एक पाकिस्तानी टैंक बचा था। जिस पर सवार थे पाकिस्तान स्क्वाड्रन कमांडर नासेर। दोनों टैंकों की बीच कुछ 200 मीटर की दूरी थी। दोनों टैंकों ने बिना देरी किए एक साथ, एक-दूसरे की ओर फायर कर दिया लेकिन नासेर ने कूदकर अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकले पर दुर्भाग्य से अरूण खेत्रपाल नहीं निकल सके।
खून से लथपथ थे, तब भी दुश्मन के टैंक उड़ाए
BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक अरूण खेत्रपाल के साथ टैंक में बैठे रिसालदार मेजर नत्थू सिंह कहते हैं कि जब टैंक में आग लगी थी तभी खेत्रपाल के गले की नस तेजी से फड़क रही थी। वो तब भी दुश्मन टैंक को बस ध्वस्त करने की सोच रहे थे कि कितनी दूरी से सही निशाना लगाया जाए। तभी अचानक सीटी की आवाज़ करता हुआ एक गोला खेत्रपाल के टैंक के कपोला को भेदता हुआ निकल जाता है और सीने को फाड़ते हुए कुछ हिस्से निकल जाते हैं। खून से लथपथ अरुण खेत्रपाल अपने गनर नत्थू सिंह से फुसफुसा कर सिर्फ ये कह पाते हैं कि मैं बाहर नहीं आ पाऊंगा। नत्थू की पूरी कोशिश होती है कि वो अरुण को जलते टैंक से बाहर निकाल पाएं। कुछ ही सेकेंडों में अरुण का शरीर नीचे की तरफ़ लुढ़कता है। उनके पेट का ज़ख्म इतना गहरा है कि अरुण की आंतें बाहर निकल गईं थी। अपनी अंतिम सांस लेते हुए अरुण खेत्रपाल की उम्र महज़ 21 वर्ष थी। छह फ़ीट दो इंच लंबे अरुण खेत्रपाल एक सैनिक परिवार से आते थे। समय था सुबह के 10.15 मिनट, तारीख 16 दिसंबर 1971।
पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ने किया खेत्रपाल को 'सैल्यूट'
इस घटना के 30 साल बाद अरुण के पिता ब्रिगेडियर एमएस खेत्रपाल ने सोचा कि वो अपनी जन्म भूमि सरगोधा को देखने पाकिस्तान जाएं। तब उनकी उम्र 81 साल थी। मुकेश खेत्रपाल बताते हैं कि जब वो लाहौर पहुंचे तो एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ने उनका स्वागत किया और खूब खातिरदारी। वहीं जब मुकेश खेत्रपाल के वापस लौटने के एक दिन पहले ब्रिगेडियर नासेर उनके पास आए बोले कि सर मेरे दिल में एक बात है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। मैं कई साल से ये बात आपको बताना चाहता था लेकिन मुझे पता नहीं था कि मैं कैसे आप तक पहुंच सकता हूं। तभी भाग्य ने मेरा साथ दिया और आपको हमारा मेहमान बना कर भेजा।
ब्रिगेडियर नासेर ने कहा कि 16 दिसंबर 1971 को सुबह आपका बेटा और मैं अपने अपने-अपने मुल्कों की लड़ाई में आमने सामने थे। मुझे बहुत अफ़सोस के साथ ये बात बतानी पड़ रही है कि आपका बेटा मेरे हाथों ही मारा गया था। लड़ाई के मैदान पर अरुण की हिम्मत अनुकरणीय थी। उसने बिना अपनी हिफाज़त की परवाह किए हुए बहुत बहादुरी से हमारा मुकाबला किया। अंत में मैं और अरुण अकेले बचे थे। हम दोनों ने साथ-साथ एक दूसरे पर निशाना लगाया पर मेरा भाग्य था कि मैं बच गया और अरुण को इस दुनिया से जाना पड़ा। बाद में मुझे पता चला कि वो कितना कम उम्र था। मैं आपके बेटे को सैल्यूट करता हूं और आपको भी सैल्यूट करता हूं क्योंकि आपकी परवरिश के बिना वो इतना बहादुर इंसान नहीं बन सकता था।
यह भी पढ़ें: Vijay Diwas 2022: पीएम मोदी और राजनाथ सिंह ने दी जवानों को श्रद्धांजलि, कही दिल छू लेने वाली बात
-
Irani Nepo Kids: अमेरिका में मौज कर रहे ईरानी नेताओं-कमांडरों के बच्चे, जनता को गजब मूर्ख बनाया, देखें लिस्ट -
Gold Rate Today: सोना सस्ता या अभी और गिरेगा? Tanishq से लेकर Kalyan, Malabar तक क्या है गहनों का भाव? -
Iran Espionage Israel: दूसरों की जासूसी करने वाले इजरायल के लीक हुए सीक्रेट, Iron Dome का सैनिक निकला जासूस -
Mamta Kulkarni: क्या साध्वी बनने का नाटक कर रही थीं ममता कुलकर्णी? अब गोवा में कर रहीं ऐसा काम, लोग हुए हैरान -
कौन थे कैप्टन राकेश रंजन? होर्मुज में 18 दिनों से फंसा था शिप, अब हुई मौत, परिवार की हो रही है ऐसी हालत -
Mojtaba Khamenei: जिंदा है मोजतबा खामेनेई! मौत के दावों के बीच ईरान ने जारी किया सीक्रेट VIDEO -
कौन है हाई प्रोफाइल ज्योतिषी? आस्था के नाम पर करता था दरिंदगी, सीक्रेट कैमरे, 58 महिलाओं संग मिले Video -
Uttar Pradesh Silver Rate Today: ईद पर चांदी बुरी तरह UP में लुढकी? Lucknow समेत 8 शहरों का ताजा भाव क्या? -
US-Iran War: ‘पिछले हालात नहीं दोहराएंगे’, ईरान के विदेश मंत्री ने Ceasefire पर बढ़ाई Trump की टेंशन? -
iran Vs Israel War: ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला, अमेरिका-इजराइल की भीषण बमबारी से दहला नतांज -
Hyderabad Bengaluru Bullet Train: 626 किमी के प्रोजेक्ट ने पकड़ी रफ्तार, DPR पर बड़ा अपडेट आया -
Hyderabad Gold Silver Rate Today: ईद के मौके पर सोना-चांदी ने किया हैरान, जानें कहां पहुंचा भाव?












Click it and Unblock the Notifications