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Varanasi Seat: देश की सबसे ‘हॉट सीट’ बन चुकी वाराणसी का क्या है सियासी इतिहास

Varanasi Seat: लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर इस समय देश की सबसे हॉट सीट वाराणसी बनी हुई है। जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीसरी बार मैदान में हैं। आजादी के बाद से इस सीट पर अब तक 17 बार चुनाव हो चुके हैं और सबसे ज्यादा बार बीजेपी और कांग्रेस को कामयाबी मिली है। जबकि उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब तक यहां से जीत के लिए तरस रही हैं।

वाराणसी लोकसभा सीट से जहां नरेंद्र मोदी तीसरी बार बीजेपी के उम्मीदवार हैं, वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन में यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है। इसलिए इस सीट से कांग्रेस ने एक बार फिर से अजय राय पर दांव खेला है। अजय राय वाराणसी लोकसभा सीट से चौथी बार (2009, 2014, 2019 और 2024) चुनाव लड़ रहे हैं। वे तीन बार कांग्रेस से और 2009 में सपा की ओर से उम्मीदवार थे। जबकि बीएसपी की तरफ से अभी तक उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया गया है।

Varanasi Seat

वाराणसी का पौराणिक इतिहास

वाराणसी को काशी और बनारस भी कहा जाता है। पुराणों के मुताबिक इसका मूल नाम काशी था। पौराणिक कथाओं के अनुसार काशी नगर की स्थापना भगवान शिव ने हजारों वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण आज भी यह एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।

काशी हिंदुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कंद पुराण, रामायण और महाभारत सहित प्राचीनतम ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में काशी नगर का उल्लेख आता है। वैसे यह नगर देश के सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक माना जाता है। बौद्ध और जैन धर्म में भी इसे पवित्र नगरी माना जाता है।

वाराणसी संत कबीर, वल्लभाचार्य, रैदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानंद गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, डॉ. संपूर्णानंद, पंडित कमलापति त्रिपाठी, राजनारायण और उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि की जन्म व कर्म स्थली रही। गोस्वामी तुलसीदास ने यहीं रामचरितमानस की रचना की। गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन इसी काशी के सारनाथ में दिया था।

वाराणसी को महान वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर ने सर्व विद्या की राजधानी का खिताब दिया। महामना मदन मोहन मालवीय ने इसे अपनी कर्म भूमि बनाया। देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की भी यह जन्म स्थली है। जबकि वर्तमान में नरेंद्र मोदी यहां से दो बार सांसद बनकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। ऐसे में यह लोकसभा सीट 'वाराणसी' पूरी दुनिया की निगाह में है।

वाराणसी लोकसभा का सियासी इतिहास

वाराणसी सीट पर अब तक 17 बार आम चुनाव हो चुके हैं। जिसमें 7 बार बीजेपी और 7 बार कांग्रेस को जीत मिली है। जबकि सीपीएम, जनता दल और जनता पार्टी को भी एक-एक बार सफलता मिल चुकी है। इस लोकसभा सीट के तहत 5 विधानसभा (रोहनिया, वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण, वाराणसी कैंट और सेवापुरी) क्षेत्र आते हैं। साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर बीजेपी समर्थित एनडीए के उम्मीदवारों को जीत मिली है।

वैसे वाराणसी लोकसभा सीट का सियासी इतिहास बेहद ही दिलचस्प है। आजादी के बाद 1951-52 में जब पहले आम चुनाव हुए थे, तब वाराणसी जिले में बनारस पूर्व, बनारस पश्चिम और बनारस मध्य नाम से तीन लोकसभा सीटें थीं। लेकिन, रिकॉर्ड के मुताबिक साल 1952 आम चुनाव में इन इलाकों से कांग्रेस के ठाकुर रघुनाथ सिंह और त्रिभुवन नारायण सिंह ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 1957 में वाराणसी सीट अस्तित्व में आई। तब 1957 और 1962 के आम चुनाव में वाराणसी सीट से कांग्रेस नेता ठाकुर रघुनाथ सिंह ने सांसद बनकर जीत की हैट्रिक लगाई।

इसके बाद कांग्रेस वाराणसी में कमजोर होने लगी क्योंकि पूर्व पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया था और यहां की राजनीति में सोशलिस्ट राजनेताओं की एंट्री हुई। साल 1967 में सीपीएम के सत्य नारायण सिंह ने पहली बार यहां चुनाव जीता लेकिन साल 1971 में कांग्रेस के राजाराम शास्त्री सांसद बने।

इसके बाद साल 1977 में जब इमरजेंसी के बाद कांग्रेस विरोधी लहर थी तब इस सीट से जनता दल के उम्मीदवार चंद्रशेखर ने जीत दर्ज की। लेकिन, 1980 आम चुनाव में एक बार फिर यह सीट कांग्रेस के खाते में चली गई। इस सीट से कमलापति त्रिपाठी ने जीत हासिल की।

साल 1984 में कांग्रेस ने इस सीट से उम्मीदवार बदलकर श्यामलाल यादव को मैदान में उतारा और वे जीत गए। हालांकि, साल 1989 में जनता दल ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री को मैदान में उतारा और वे कांग्रेस के श्यामलाल यादव को 1, 71,603 वोटों से हराकर संसद पहुंचे।

भारतीय जनता पार्टी की हुई एंट्री

1991 के आम चुनाव में वाराणसी लोकसभा सीट पर बड़ा उलटफेर हुआ। मंडल-कमंडल की राजनीति के बीच भाजपा ने इस सीट से श्रीश चंद्र दीक्षित को उतारा और कांग्रेस ने लोक पति त्रिपाठी और सीपीआई (एम) ने राज किशोर को उतारा। तब श्रीश चंद्र दीक्षित ने सीपीआई (एम) के उम्मीदवार को 40,439 वोटों से हराकर इस सीट पर जीत दर्ज की। इस सीट पर पहली बार बीजेपी की जीत हुई। इसके बाद लगातार तीन चुनाव साल 1996, 1998 और 1999 में बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल सांसद चुने गए।

इसके बाद साल 2004 में कांग्रेस की फिर एंट्री हुई और बीजेपी के उम्मीदवार शंकर प्रसाद जायसवाल को कांग्रेस के राजेश मिश्रा 57,435 वोटों से हराकर सांसद बनें। हालांकि, साल 2009 में बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी को जीत मिली। इसके बाद साल 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

2014 का चुनाव था बेहद दिलचस्प

16वीं आम चुनाव 2014 में वाराणसी लोकसभा सीट देश की सबसे वीआईपी सीट बन गई थी। क्योंकि, तब इस सीट से बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस से प्रत्याशी अजय राय मैदान में थे। बसपा ने विजय प्रकाश जायसवाल और सपा ने कैलाश चौरसिया को उतारा था। सभी दिग्गज और पार्टी के बड़े नेताओं में से थे।

हालांकि, जब चुनाव हुए तब नरेंद्र मोदी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 3,71,784 वोटों के अंतर से हराया था। नरेंद्र मोदी को 5 लाख 81 हजार 22 वोट मिले थे, जबकि केजरीवाल को 2 लाख 9 हजार 238 वोट ही मिले थे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय 75 हजार 614 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। बसपा प्रत्याशी विजय प्रकाश जायसवाल को 60 हजार 579 वोट और सपा के प्रत्याशी कैलाश चौरसिया को 45 हजार 291 मत मिले थे।

इसके बाद साल 2019 में हुए आम चुनाव में भी बीजेपी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी की शालिनी यादव को 4,79,505 वोटों के अंतर से हराया था। तब नरेंद्र मोदी को 6,74,664 वोट मिले थे। जबकि शालिनी यादव को 1,95,159 वोट ही मिले थे। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय को 1,52,548 वोट मिले थे।

वाराणसी सीट पर वोटिंग का समीकरण

वाराणसी लोकसभा सीट पर जातीय समीकरण की बात करें तो यहां ब्राह्मण, भूमिहार, वैश्य, कुर्मी वोटर्स का बोलबाला है। वैसे मुस्लिम मतदाताओं की भी संख्या काफी अहम है। लोकसभा चुनाव 2019 में इस सीट पर कुल 1856791 मतदाता थे।

एक रिपोर्ट के अनुसार वाराणसी में करीब 3 लाख ब्राह्मण और 3 लाख मुस्लिम वोटर हैं। इसके अलावा 3 लाख गैर-यादव ओबीसी वोटर, जबकि 2 लाख से ज्यादा कुर्मी मतदाता हैं। इस सीट पर 2 लाख वैश्य वोटर के अलावा डेढ़ लाख भूमिहार वोट भी हैं। वहीं एक लाख यादव और एक लाख अनुसूचित जातियों के भी वोट हैं।

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