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ये प्राइम टाइम का अंधेरा नहीं साहब! 'शहादत' का अंधेरा है

कितना अजीब लगता है न...जब हम देश के दो चेहरे देखते हैं। एक तो कुछ ऐसा कि भारत के भीतर मौजूद लोग ही भारत के टुकड़े करने की बात करते हों। और दूसरा कुछ ऐसा कि जिस देश को मिटाने की खातिर ऊंचे ऊंचे नारे लग रहे हों, उसे ही बचाने के लिए भारत मां के लाल अपनी जान कुर्बान कर रहे हों। दरअसल इसी का नाम भारत है।

Shadat ka Andhera

इसे ही भारत की संवेदनशीलता के सबसे बड़े उदाहरण तौर पर भी देखा जा सकता है। बहरहाल देश की सवा सौ करोड़ जनसंख्या की रक्षा के लिए आज फिर जवानों ने तिरंगा ओढ़ लिया। जिसमें देशद्रोह के नारों से हाल ही में उफने संस्थान यानि की जेएनयू के छात्र रहे कैप्टन पवन कुमार भी शामिल थे। जी हां सेना में बतौर कैप्टन पवन कुमार जम्मू श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पम्पोर इलाके में एक सरकारी इमारत में घुसे आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। हरियााणा के जींद में रहने वाले पवन ने अभी महज तीन साल पहले ही सेना में शामिल हुए थे।

कहीं राष्ट्र भक्ति पर सवाल न उठा दिए जाएं!

इस बार भी कोई पिता अपने बेटे को यादों में से तलाशकर अकेले में अश्क जरूर बहाएगा। तिरंगे में लिपटे बेटे को देखकर उन किस्सों की निगहबानी जरूर करेगा जब उसने अपने बेटे की नन्ही उंगलियों को थामा, चलना सिखाया और बच्चे ने उन्हे पापा कहा। क्या हुआ...नमीं आपकी भी आंखों को छू कर गुजर गई क्या। अजी बिलकुल भी ऐसा मत कीजिए।

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पमपोर मुठभेड़ में शहीद सेनानी

पमपोर मुठभेड़ में शहीद सेनानी

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वरना जेएनयू का हवाला देते हुए किसी गुप्प अंधेरे से सवाल थाम कर आवाजें आने लगेंगी कि जिन आंखों में शहीदों की खातिर आंसू है क्या वही असल में राष्ट्र भक्त है। जी हां विचारधाराओं में बटकर, समाज के कुछ बुद्धजीवी लोगों को पत्थर सरीखे बनाने की लालसा तो नहीं रख रहे। कहीं वे ऐसा तो नहीं चाहते कि भीतर देश के टुकड़ों की खातिर आवाजें एक विकराल रूप ले लें और उनके विरोध को पूरी तरह नकारते हुए देश की सुरक्षा करने वाले अपनी जिंदगी को यूं ही दांव पर लगाते रहें।

शहादत को उद्देश्यविहीन मत कीजिए

कभी गौर से सोचिएगा। जी हां ये मैं उन लोगों के लिए कह रहा हूं जो सवाल करते हैं बवाल की खातिर, बहस करते हैं टीआरपी के लिए, चीखते हैं, चिल्लाते हैं। घर जाते हैं और फिर से सो जाते हैं। बाद में आंखों में बेवजह की बजबजाहट लिए यही कहते हैं कि आंखे तनी रही और दिमाग राष्ट्रवाद के सवाल पर बार बार खुद को चोट पहुंचाता रहा। मैं ये नहीं कह रहा कि जिन शहीदों की वर्दी को, तमगों को या कहिए सम्मान को किसी भी तरह से ठेस पहुंचाई गई है उस पर किसी भी तरह से सियासत का पक्ष लेते हुए चुप्पी साध ली जाए।

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पमपोर में मुठभेड़

पमपोर में मुठभेड़

भारत के सैनिक मोर्चे पर
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निश्चित ही इस देश की जनता भी कार्यवाही चाहती है। पर उनको क्यों आप उद्देश्यविहीन कर रहे हो जो अपने मां-बाप, पत्नी, बहन, बेटी यानि की सारे रिश्तों को राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर अकेला छोड़ जाने को तैयार हैं।

प्रोफेशनल्स बनाते हैं, सोल्जर क्यों नहीं?

आज बुद्धिजीवियों से मीडिया का ही नहीं बल्कि पवन कुमार के पिता का भी यह सवाल हो सकता है कि आप क्यों अपने बेटे को प्रोफेशनल्स बनाने की ओर ज्यादा झुकाव रखते हो, क्यों सेना में भेजने की ओर नहीं सोचते। निश्चित ही इसमें एक जवाब ''डर'' भी होगा। हो सकता है आपके मन में यह भी आया हो कि जानबूझकर क्यों मौत के मुंह में भेजा जाए। तो आपको एकबार फिर याद दिलाता चलूं कि शहादत के रंग में रंगे इन लालों को बेटा कहने वाला भी कोई है, पिता कहने वाला भी होगा, भाई कहने वाला भी होगा।

हो सकता है कि राष्ट्र भक्ति का मतलब बताने के लिए शब्दों की लकीरों को सलीके से हम न खींच पाए हों लेकिन देश की खातिर शहीद हो जाने वाले वतन के सच्चे सपूतों ने अपनी शहादत से इतनी इबारतें, इतने कर्तव्य दर्शा दिए हैं कि हर भारतीय के लिए वह काफी है। बहरहाल पवन कुमार के पिता राजबीर सिंह ने साफ संदेश देते हुए कहा, 'मेरी एक ही संतान थी, जिसे मैंने सेना व अपने देश को दे दिया। कोई भी पिता इतना गौरवान्वित नहीं हो सकता।' तो सुना आपने, इसे समझिए और ग्रहण कीजिए। ताकि जीता रहे अपने हिंदुस्तान।

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