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Desi Cow Breeds: देसी गोधन का बढ़ा रूझान, सरकारें भी हुईं मेहरबान

Desi Cow Breeds: शास्त्रों में यदि गाय को माता कहा गया है तो इसके पीछे सिर्फ गाय के साथ भावनात्मक संबंध ही नहीं है, बल्कि गाय के दूध, जिसे देश के अधिकतर भागों में गो रस भी कहते हैं, में उपस्थित औषधीय गुण भी हैं। जिन नवजात बच्चों को उनकी मां किसी कारण स्तनपान नहीं करा पाती, उन बच्चों के लिए आधुनिक चिकित्सक भी देसी गाय का दूध पिलाने के लिए कहते हैं। गाय ही एक मात्र ऐसी पशु है जिसके हर अंग की पूजा और उससे प्राप्त हर वस्तु का उपयोग चिक्तिसा से लेकर धर्म कर्म में होता है। गाय से प्राप्त वस्तुओं को हम पंचगव्य कहते हैं। जिसमें दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र भी शामिल हैं। जन्म-मरण सब में गाय की उपयोगिता है।

कुछ दशक पहले गोपालकों में यह भ्रम पैदा कर दिया गया कि लाभदायकता के लिए देसी से ज्यादा विदेशी नस्ल, खासकर आस्ट्रेलियन और कनाडियन गायों को पालना श्रेयस्कर है। इसे जर्सी गाय कहते हैं। फिर क्या था देश में अंधाधुंध तरीके से गायों की नस्लें बिगाड़ने का काम चालू हो गया। खासकर डेयरी उद्योग में सक्रिय लोगों ने देसी गाय के बजाय जर्सी गाय का पालन शुरू कर दिया। लेकिन जल्दी ही लोगों को मालूम चल गया कि जर्सी गाय का दूध ना सिर्फ सेहत के लिए हानिकाकारक है, बल्कि कई बीमारियों का कारण भी है।

Trend of desi cow breeding increased, governments also became kind

कुछ जागरूक गोपालकों ने पहले एक अभियान के तहत गायों की नस्लों में सुधार के लिए आंदोलन चलाया, फिर वैज्ञानिकों ने भी उनका साथ दिया। अब सरकारें भी गोपालकों को गायों की नस्ल सुधारने में सहयोग कर रही हैं। केंद्र सरकार राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत गो नस्लों में सुधार के लिए पूंजीगत खर्च मे 50 प्रतिशत की सब्सिडी दे रही है। उत्तरप्रदेश सरकार ने हाल ही में नंद बाबा दुग्ध मिशन के नाम से 1000 करोड़ रुपये की योजना शुरू की है, जिसमें गाय की नस्ल सुधारने के लिए किसानों को 15 हजार रूपये तक की सहायता दी जा रही है। अब उपभोक्ताओं को भी जागरूक बनाने के लिए यह जानना जरूरी है कि देसी गायों के दूध और जर्सी गायों के दूध में से कौन ज्यादा स्वास्थ्यवर्द्धक और सुपाच्य है।

भारत विश्व में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश है, जिसकी विश्व के कुल दूध उत्पादक में सबसे ज्यादा 24 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान विश्व भर में लगभग 9208 लाख टन दूध का उत्पादन हुआ, जिसमें भारत ने 2210 लाख टन दूध का उत्पादन किया। भारत में कुल दूध उत्पादन में गाय के दूध की हिस्सेदारी लगभग 51 प्रतिशत तथा भैंस के दूध की हिस्सेदारी लगभग 45.07 प्रतिशत रही।

भारत में दूध उत्पादन बढ़ाने में जहां केंद्र सरकार अपने स्तर पर प्रोत्साहित करती है, वहीं राज्य सरकारें भी दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर प्रोत्साहन योजनाएं व कार्यक्रम चलाती रहती हैं। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 'नन्द बाबा दुग्ध मिशन' योजना चलाई है। जिसका उद्देश्य स्वदेशी नस्ल की गायों के प्रति रूझान बढ़ाना, गौ-पालकों की आय बढ़ाना तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है।

भारत में गोधन की स्थिति

भारत में दुग्ध उद्योग से लगभग 8 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। 20वीं पशुधन गणना (2019) के अनुसार भारत में 5367.6 लाख पशुधन हैं, जिसमें गायों की संख्या 1934.6 लाख तथा भैंसों की संख्या 1098.5 लाख है। वहीं विदेशी/संकर नस्ल वाली गायों की संख्या 504.2 लाख तथा स्वदेशी नस्ल की गायों की संख्या 1421.1 लाख है। विश्व भर के गोधन का 14 प्रतिशत भारत में है। दूध उत्पादन के हिसाब से पशुधन की हिस्सेदारी देखें तो वित्तीय वर्ष 2021-22 के कुल दूध उत्पादन 2210 लाख टन में गाय के दूध की हिस्सेदारी 51.67 प्रतिशत व भैंस के दूध की हिस्सेदारी 45.07 प्रतिशत रही। विदेशी गाय से 1.92 प्रतिशत, शंकर नस्ल गाय से 25.91 प्रतिशत, देसी गाय से 10.35 प्रतिशत तथा अन्य गाय से 13.49 प्रतिशत दूध उत्पादन हिस्सेदारी रही। स्पष्ट है कि भारत के कुल दूध उत्पादन में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी गोधन की है। इसलिए सरकारें इस पर जोर दे रही हैं।

भारत की कुछ प्रमुख देसी नस्ल गाय

साहीवालः इस गाय को मांटगोमरी, मुल्तानी आदि अन्य नामों से भी पुकारा जाता है। साहीवाल गाय अधिकतर पंजाब, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में मिलती है। भारत में यह गाय की अत्यधिक दुधारू किस्म है। यह एक सीजन में औसतन लगभग 2000 लीटर से अधिक दूध देती है। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि यह गाय एक सीजन में लगभग 5000 लीटर तक भी दूध दे देती है।

धारपारकरः इस नस्ल की गाय अधिकतर राजस्थान व गुजरात में मिलती है। इसे उजली सिंधी के नाम से भी जाना जाता है। यह सीजन में लगभग 1500 लीटर से 4000 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती है।

गिर गायः इसको सूर्ती, देकन और काठियावाड़ी आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है। यह मुख्यतः गुजरात, महाराष्ट्र, व राजस्थान में पायी जाती है। यह एक सीजन (लगभग 300 दिन) में औसतन लगभग 1700 लीटर से अधिक दूध देती है।

सिंधीः यह गाय गहरे लाल या भूरे रंग की और मोटे सींग वाली होती है। सिंधी गाय एक सीजन में लगभग 1500 लीटर तक दूध का उत्पादन करती है।

हरानाः यह अधिकतर दिल्ली और हरियाणा में पायी जाती है और एक सीजन में लगभग 1400 लीटर तक दूध देती है।

कांकरेजः इसको बन्नाय या नागू नाम से भी पुकारा जाता है। यह अधिकांशतः राजस्थान और गुजरात में पायी जाती है, जो एक सीजन में लगभग 1350 लीटर तक दूध देती है।

देसी नस्ल की गाय की बढ़ती मांग

विश्व स्तर पर भारत की देसी नस्ल की गाय के दूध की बहुत मांग है। इसकी वजह भारत की देसी नस्ल की गाय के दूध का ए-2 होना है। वहीं संकर व विदेशी गाय का दूध ए-1 होने के कारण उसकी मांग घटती जा रही है।

आखिर यह ए-1 व ए-2 क्या होता है?

वैज्ञानिकों के अनुसार दूध में लगभग 80 फीसदी प्रोटीन केसीन पाया जाता है। जिसको 2 प्रकार से विभाजित किया गया है - ए-1 तथा ए-2। जिस दूध में ए-1 बीटा-केसीन (एक रसायनिक संरचना) होता है वह ए-1 दूध तथा जिसमें ए-2 बीटा-केसीन होता है, वह दूध ए-2 होता है।

विभिन्न शोध व अध्ययनों से पता चलता है कि ए-1 दूध में पाया जाने वाला बीटा-केसीन दिल की बीमारी, टाइप-1 डायबिटीज (शुगर) आदि बीमारियों के खतरे को बढ़ाता है और यह उत्तेजक (इंफ्लामेटरी) भी होता है। इसके साथ-साथ पाचन क्रिया को भी प्रभावित करता है। वहीं ए-2 दूध के सेवन से अनेक बीमारियां दूर होती है और पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है। यही कारण है कि ए-2 को ए-1 की तुलना बेहतर और स्वस्थ विकल्प बताया जा रहा है और इसलिए भारत की देसी नस्ल की गाय के दूध की मांग बढ़ती जा रही है।

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