Tiananmen Square: जब चीन में लोकतंत्र की मांग कर रहे नागरिकों पर चढ़ा दिए गए टैंक
चीन में लोकतंत्र की मांग हेतु 1949 के बाद 1989 में जोरदार आंदोलन चला। लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकतंत्र समर्थकों का नरसंहार करके इस आंदोलन को दबा दिया।

Tiananmen Square: अप्रैल 1989 में चीन की रिफार्मिस्ट पार्टी के उपेक्षित नेता हु याओबांग की मौत पर क्षुब्ध छात्रों ने बीजिंग के थियानमेन चौक पर कब्जा कर लिया। वे एक पारदर्शी सरकार और देश के लिए लोकतांत्रिक अधिकार चाहते थे। यह आन्दोलन 4 जून तक अपने चरम पर पहुंच गया, जिसके खिलाफ चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने बीजिंग की सड़कों पर आंदोलन कर रहे अपने ही नागरिकों पर टैंक चढ़ा दिये। कुछ ही घंटों में 10,000 से अधिक लोगों की जान चली गयी। इस घटना को तियानमेन स्क्वॉयर नरसंहार के नाम से जाना जाता है।
नरसंहार की पृष्ठभूमि
1949 में चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग ने तियानमेन चौक में लाल झंडा फहराकर कम्युनिस्ट सरकार का गठन किया था। फिर 1966 में सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की गयी। लगभग 10 सालों तक इस क्रांति की आड़ में करोड़ों लोगों का दमन किया गया। माओ के मरने के साथ ही इसका अंत हुआ। फिर नये राष्ट्राध्यक्ष आने के बाद चीन में भ्रष्टाचार, वंशवाद, मुद्रास्फीति, महंगाई और नगदी की समस्या काफी ज्यादा बढ़ गई। चीन में नौकरशाही हावी होने लगी थी। जिससे चीनी नागरिकों में आक्रोश बढ़ता चला गया। साथ ही, भारी संख्या में चीनी छात्र सरकार के विरोध में सड़कों पर आने लगे थे। वे सभी चीन में लोकतंत्र की मांग करने लगे। बुद्धिजीवी वर्ग भी इस मुहिम में साथ आ गया।
लोकतंत्र की मांग
एस्ट्रोफिजिक्स के प्रोफेसर फैंग लिजी के बयानों ने इस आन्दोलन को एक नयी धार दी। उनको साथ मिला कम्युनिस्ट पार्टी के ही महासचिव हु याओबांग का। जिन्होंने छात्रों और बुद्धिजीवियों की मांग को जायज ठहराया। इसके बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया और बाद में दिल के दौरे से उनका निधन हो गया।
फिर भी आन्दोलन रुका नहीं और छात्रों का गुस्सा और बढ़ गया। अब चीन के बड़े और मुख्य विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी तियानमेन चौक में आकर प्रोटेस्ट करने लगे। इनमें सबसे ज्यादा संख्या पेकिंग विश्वविद्यालय के छात्रों की थी। गौरतलब है कि इन छात्रों के साथ उनके अभिवावक भी शामिल थे। 16-20 अप्रैल तक लोकतंत्र की मांग का यह आंदोलन पूरे चीन में फैल गया था।
आंदोलन की मुख्य 7 मांगें
(1) हु याओबांग के लोकतंत्र के मॉडल को अपनाया जाये, (2) लिबरल होना, (3) नेताओं की संपत्ति को सार्वजनिक करना, (4) प्रेस सेंसरशिप हटाना, (5) शिक्षा के लिए फंड, (6) छात्रों पर प्रतिबंध हटे और (7) छात्रों के इस आंदोलन के उद्देश्यों के बारे में सही जानकारी पूरे देश के सामने आये।
कब क्या-क्या हुआ?
● 23 अप्रैल को 'बीजिंग स्टूडेंट्स ऑटोनॉमस फेडरेशन' का गठन हुआ।
● फिर झाओ जियांग को कम्युनिस्ट पार्टी का नया महासचिव बनाया गया। यह भी छात्रों की मांग का समर्थन में आ गये। जिससे पार्टी के अंदर फूट दिखाई देने लगी। अब एक उदार गुट था जबकि दूसरा हार्डकोर। हार्डकोर लाइन के नेता ली पेंग इस आंदोलन को कुचलने पर अड़े थे और तत्कालीन राष्ट्रपति भी उनके साथ थे।
● 26 अप्रैल को पीपल्स डेली ने सभी आंदोलनकारियों को देशद्रोही बताया।
● 27 अप्रैल को तकरीबन 1 लाख लोग तियानमेन चौक पर जमा हो गये।
● 20 मई को चीनी सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया।
● 3 जून की रात में चीनी सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी। इस घटना में लगभग 35 लोग मारे गये।
● 4 जून की सुबह 4 बजे निहत्थे छात्रों, बच्चों और बुजुर्ग आंदोलनकारियों पर चीनी सरकार ने टैंक और हथियारबंद जवानों की मदद से गोलीबारी शुरू कर दी।
मरने वालों की संख्या
चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने अधिकारिक रूप से मौतों की संख्या सिर्फ 300 बताई थी। जबकि ब्रिटिश और अमेरिकी अनुमानों के अनुसार तियानमेन चौक पर उस दिन लगभग 10 हजार से अधिक लोगों का नरसंहार हुआ था।
अन्य देशों की प्रतिक्रिया
चीन में तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत एलन डॉनल्ड ने लंदन भेजे अपने एक टेलीग्राम में कहा था, इस घटना में कम-से-कम 10,000 लोग मारे गए हैं। हांगकांग बैप्टिस्ट विश्विद्यालय में चीनी इतिहास, भाषा एवं संस्कृति के विशेषज्ञ ज्यां पिये कबेस्टन ने भी इन ब्रिटिश आकड़ों को सटीक बताया है।
यूरोपियन इकोनॉमिक कम्युनिटी ने चीनी सरकार के इस कृत्य की निंदा की थी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन में इसके खिलाफ प्रस्ताव पास कराने की योजना भी बनाई। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने इस घटना की कड़ी निंदा की और चीनी छात्रों को 4 सालों तक अपने देश में शरण देने की घोषणा की।
जापान ने इस घटना को 'नहीं सह सकने वाली घटना' कहा। इसके बाद जापान ने चीन को कर्जा देने पर रोक लगा दी। मकाऊ में तो इस घटना के खिलाफ लाखों लोग प्रोटेस्ट के लिए सड़कों पर आ गये। स्वीडन और नीदरलैंड जैसे देशों ने चीन से डिप्लोमेटिक रिश्तों को स्थगित कर दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ने अपना आगामी चीनी दौरा रद्द कर दिया।
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