Theyyam: सामूहिकता का प्रतीक है केरल का अनुष्ठान थेय्यम
Theyyam: थेय्यम, केरल का एक पारंपरिक अनुष्ठान है, जिसमें कलाकार देवता के प्रतिनिधि के रूप में नृत्य करते हैं। थेय्यम संस्कृत के "दैवम" से लिया गया है। इस कला का प्रदर्शन दिसंबर में शुरू होता है और अप्रैल तक विभिन्न मंदिरों और तीर्थस्थलों पर चलता है। कहीं-कहीं थेय्यम अक्टूबर से ही शुरू हो जाता है और मई तक चलता है। यह हिन्दू धर्म की जातिगत व्यवस्था में सांस्कृतिक विशालता का दर्शन कराता है।
थेय्यम कलाकार में देवता का वास
थेय्यम अनुष्ठान मुख्य रूप से कासरगोड, कन्नूर, कोझिकोड आदि क्षेत्रों में मनाया जाता है। इसका आयोजन केरल की अनुसूचित जाति के लोग करते हैं। लोगों को यह विश्वास है कि आस्था और पूजा के एक रूप में जो कलाकार इसको करता है, उसके पास दैवीय शक्ति आ जाती है। आमतौर पर पुरुष इस अनुष्ठान को करते हैं और नृत्य करते करते दूसरी अवस्था (ट्रान्स) में चले जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे देवता में परिवर्तित हो जाते हैं। नृत्य करने वाले कलाकार के साथ ढोल की थाप पर कई सहायक भी साथ देते हैं।

थेय्यम कलाकार सिर पर भारी टोपी पहनता है और आभूषणों से लदा होता है। वह आग में दौड़ लगाता है, ताड़ी पीता है, मुर्गी की बलि देता है। उसके आस पास लोग दर्शक के रूप में जमा होते हैं और उसके नृत्य को देवता के नृत्य के रूप में देखते हैं। यह उत्तरी केरल की संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। थेय्यम त्योहार को कालियाट्टम के नाम से भी जाना जाता है।
प्राचीन इतिहास से जुड़ा है थेय्यम
ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि उत्तरी मालाबार में रहने वाले लोग पहाड़ी जनजाति के थे। उनकी संस्कृति और परंपरा किसानी से जुड़ी हुई थी। उन्होंने अपने संगठन में लोकतंत्र की स्थापना की और अपने समुदाय से जुड़े विशेष देवताओं को जोड़ा और नई संस्कृति विकसित की। इसलिए अपनी धार्मिक गतिविधियों और अनुष्ठानों के लिए उन्होंने छोटे मंदिरों का निर्माण किया और उन्होंने अपने मंदिरों में थेय्यम के रूप में भगवान की अवतार छवि की प्रतिस्थापन की।
आज भी थिया, वानिया, मनियानी, कम्मलार आदि जातियों के अपने-अपने मंदिर और देवता हैं और वे भगवान को प्रसन्न करने के लिए वार्षिक 'थेय्यम कलियातम' का आयोजन करते हैं। थेय्यकोलम करने वाली जातियों मे पेरुवन्नन, पेरुमालयन, पनन, अंजूटन, मुन्नूटन, कलानादिक्कल, मविलन, कप्पलन, नलकिथाया, थुलुमलयाला वेलन और पुलायार शामिल हैं। इन्हें आम तौर पर 'थेय्यकरण' कहा जाता है। थेय्यम देवता बहुत दयालु हैं, वह लोगों की समस्याओं पर ध्यान देते हैं। अपनी भाषा में सांत्वना देते हैं और समाधान भी सुझाते हैं। थेय्यम के लिए सभी लोग उनके बच्चे हैं, चाहे उनकी जाति या धर्म कुछ भी हो।
सामूहिकता और एकता का प्रतीक भी है थेय्यम
थेय्यम संयुक्त परिवार या जाति समुदाय द्वारा अपने अपने मंदिर में आयोजित किया जाता है। कुछ थेय्यम का सार्वजनिक एवं बड़े स्तर पर भी आयोजित किया जाता है। खासकर हर पांच, पंद्रह या पच्चीस साल में आयोजित होने वाला थेय्यम बड़े जश्न के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस अवसर पर नए घर का उद्घाटन भी करते हैं।
सामाजिक बुराइयों के विरोध का भी प्रतीक है थेय्यम
थेय्यम का अनुष्ठान रक्त और मांस के प्रसाद बिना नहीं होता। संगम काल से यह नायक पूजा के पंथ के रूप में उभरा है। कुछ लोग इसे तांत्रिक संत, मनक्कडन गुरुकुल के साथ भी जोड़ते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कन्नूर में कोलाथिरी राजवंश के राजा चिरक्कल तंपुरान को उनतीस प्रकार के थेय्यम दिखाए थे। वहीं पहले थेय्यम प्रदर्शन का निर्माण किया गया। थेय्यम स्थापित जाति और सामाजिक व्यवस्था के प्रति विरोध का भी द्योतक है।












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