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TB Free India: 2025 तक टीबी से मुक्ति पाने का लक्ष्य हुआ मुश्किल

TB Free India: भारत सरकार ने 2025 तक देश को टीबी की बीमारी से मुक्ति दिलाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य के लिये सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर टीबी की प्रारंभिक जांच और इसकी रोकथाम के किए समय-समय पर अभियान भी चलाया जा रहा है। इसकी पुनरावृति को रोकने के लिए दवा और जीवनचर्या से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

इन सब प्रयासों के बाद भी 2023 में 25,37,235 टीबी के मामलों का पंजीकरण किया गया। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र में अधिसूचित टीबी मामलों की संख्या 16,99,119 थी, जबकि निजी क्षेत्र द्वारा अधिसूचित टीबी मामलों की संख्या 8,38,116 थी। टीबी मामलों की संख्या के मामले में पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो नहीं लगता कि 2025 तक टीबी को पूर्ण रूप से ख़त्म करने में हम सफल होंगे।

TB Free India

वर्ष 2022 में भारत में 24,22,121 टीबी मामलों को अधिसूचित किया गया था। यह संख्या 2021 में प्राप्त अधिसूचना की तुलना में 13 प्रतिशत अधिक थी। कोविड महामारी के कारण, 2020 और 2021 में टीबी अधिसूचना में तेजी से गिरावट आई थी। 2019 में महामारी शुरू होने से पहले 24,04,815 टीबी मामले अधिसूचित किए गए थे लेकिन 2020 में टी.बी. की यह अधिसूचना घटकर 18,05,670 हो गई, पर 2021 में इसमें मामूली सुधार हुआ और 21,35,830 टीबी के मामले अधिसूचित किए गए।

टीबी संक्रमण की ऊंची डर

एक अध्ययन के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत से अधिक आबादी के शरीर में टीबी का संक्रमण होता है, लेकिन केवल 10 प्रतिशत को ही टीबी रोग होता है। राष्ट्रीय क्षय रोग संस्थान टीबीईपी (तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम) के तहत टीबी को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना बनाई गई है, जिसके तहत 2025 भारत को टीबी मुक्त देश घोषित कर दिया जाएगा। एचआईवी-एड्स, कैंसर के साथ-साथ टीबी भी एक ऐसी बीमारी है जिसका दुनिया के पास कोई स्थाई इलाज नहीं है। हम केवल इसे फैलने से रोक सकते हैं।

टीबी के शुरुआती लक्षणों के बारे में जागरूकता पैदा करने की जरूरत है और इसके प्रसार को कम करने के लिए हर अर्ध सरकारी, सरकारी और निजी अस्पतालों में स्क्रीनिंग पर अधिक जोर देने की भी। प्रत्येक रोगी को ड्रग थेरेपी का पालन करने, लापरवाही के कारण टीबी का खतरा बढ़ने और इसे ठीक करने की जरूरत के बारे में बताना जरूरी है। साथ ही आकस्मिक मौतों को कम करने पर सबसे ज्यादा जोर देना जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2023 के अनुसार हालांकि भारत में टीबी मृत्यु दर में कमी आई है, 2021 में 4.94 लाख मौतें टीबी से हुईं थी, जो घटाकर 2022 में 3.31 लाख पर आ गई हैं, फिर भी यह आंकड़ा बहुत बड़ा है।

लापरवाही भी मुख्य कारण

बहुत से गरीब लोगों में टीबी से पीड़ित होने की पहचान ही नहीं हो पाती है क्योंकि वे एक तो टीबी निदान केंद्रों पर नहीं जाते और दूसरे देशी इलाजों में वर्षों निकाल देते हैं। कई मामलों में लोग दवाएँ बंद कर देते हैं। शहरी गरीबों में यह अक्सर देखा जाता है कि जो दिहाड़ी मजदूर हैं या रिक्शा खींचने जैसे मेहनत का काम करते हैं वे पैसा शराब आदि में खर्च कर डालते है, फिर टीबी से पीड़ित होने के बाद भी ना तो उचित भोजन लेते हैं और ना दवा। टीबी से गरीब अधिक प्रभावित होते हैं और उनकी बड़ी संख्या देखते हुए इसकी कोई संभावना नहीं है कि 2025 तक गरीबी खत्म हो जाएगी।

वर्ष 2025 तक टीबी को खत्म करना वास्तव में एक कठिन लक्ष्य है। हालांकि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार के पास पर्याप्त नेटवर्क है। हर तरह के अभियान चलाने के लिए संसाधन हैं। जागरूकता के लिए सोशल मीडिया है। फिर भी लोग इस बीमारी से मर रहे हैं। दरअसल टीबी एक छुआछूत की बीमारी है। गंदी जगह रहने, पर्याप्त भोजन नहीं लेने और नशे के आदि होने वालों को टीबी आसानी से पकड़ लेती है।

कुछ साल पहले प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ भारत अभियान शुरू करने के बाद युवाओं की मानसिकता में व्यापक बदलाव देखा गया है। स्वच्छ वातावरण में अंततः सांस लेने के लिए एक बेहतर माहौल की तरफ हम बढ़े हैं। हमें स्वच्छता की इस बात को हर बच्चे के दिमाग में डालना होगा। अच्छी बात है कि स्कूलों में भी आजकल स्वच्छता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। आम लोगों को भी सड़क पर पड़ी बोतलें और कागज कूड़ेदान में डालते देखा जा सकता है। इससे बाकी लोगों को भी अच्छी सीख मिलती है। ग्रामीण भारत को भी स्वच्छ बनाने का अभियान चल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर शौचालय बनाए गए है। सरकार ने सड़क पर थूकने वालों पर 100 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

निजी क्षेत्र का सहयोग बहुत कम

देश में कुल टीबी अधिसूचनाओं में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी अभी भी केवल 33 प्रतिशत है। 2021 में निजी क्षेत्र द्वारा टीबी अधिसूचना की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत थी, जो 2022 में घटकर 30 प्रतिशत हो गई। 2012 में टीबी पंजीकरण को अनिवार्य किए जाने के बाद से निजी क्षेत्र में टीबी की अधिसूचना दर्ज किए जाने के मामले में लगातार वृद्धि तो देखी जा रही है, लेकिन राष्ट्रीय रणनीतिक योजना 2022-2025 द्वारा निर्धारित लक्ष्यों से यह काफी कम रही है।

राष्ट्रीय रणनीतिक योजना द्वारा निर्धारित लक्ष्य के अनुसार, निजी क्षेत्र के लिए 2020 में 35 प्रतिशत, 2021 में 45 प्रतिशत और 2022- 2023 में 56 प्रतिशत द्वारा टीबी अधिसूचना दर्ज करना तय किया गया था, लेकिन 2023 में 33 प्रतिशत की उच्चतम टीबी अधिसूचना ही दर्ज हो सकी। निजी क्षेत्र द्वारा अधिसूचना राष्ट्रीय रणनीतिक योजना के लक्ष्यों के करीब भी नहीं पहुंची है। जबकि भारत में 50 से 70 प्रतिशत टीबी रोगी निजी क्षेत्र में ही देखभाल चाहते हैं। जाहिर है भारत में हर साल टीबी के हजारों मामले छूट रहे हैं। राष्ट्रीय रणनीतिक योजना में ही कहा गया है कि लगभग 6 लाख टीबी रोगी टीबी निगरानी या अधिसूचना से बाहर हैं।

हालांकि सरकार द्वारा टीबी के मरीजों को पौष्टिक भोजन के लिए प्रति माह 500 रुपये दिए जाते हैं, ताकि आहार संबंधी उनकी ज़रूरतें पूरी हो सकें। पर पोषण संबंधी ज़रूरतें हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं, इसलिए यह कहना कि 500 रुपये हर मरीज के लिए पर्याप्त हो सकता है, सही नहीं है।

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