Spy Balloon: विश्वयुद्धों सहित शीत युध्द के दौरान भी खूब इस्तेमाल होते थे जासूसी गुब्बारे
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ‘पेंटागन’ की ओर से बयान आया कि अमेरिका में एक चीनी जासूसी गुब्बारा देखा गया। यह तीन बसों के आकार के बराबर है, जिस पर नजर रखी जा रही है।

हाल ही में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय 'पेंटागन' की ओर से बयान आया कि अमेरिका में एक चीनी जासूसी गुब्बारा देखा गया। यह तीन बसों के आकार के बराबर है। वहीं इस पर पेंटागन के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल पैट राइडर ने कहा कि जासूसी गुब्बारे पर नजर रखी जा रही है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस बीच अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का बीजिंग दौरा होना था। जो इस जासूसी गुब्बारे की वजह से बढ़े तनाव के कारण स्थगित कर दिया गया है।
यह गुब्बारा रास्ता भटक गया था
उधर, इस पूरे मामले पर चीन के विदेश मंत्रालय का भी बयान सामने आया। उसने कहा कि यह गुब्बारा रास्ता भटक गया था। ये एक सिविल यूज बैलून था, जिसका इस्तेमाल मौसम से जुड़ी रिसर्च के लिए किया जाता है। यह दिशा भटककर अमेरिकी एयरस्पेस में पहुंच गया। इसके लिए हमें खेद है।
एक गुब्बारे से क्यों डरा अमेरिका?
दरअसल चीन का यह संदिग्ध बैलून मोंटाना शहर में देखा गया था। गौरतलब है कि इसी इलाके में अमेरिका की एयरफोर्स का बेस मौजूद है, जहां न्यूक्लियर मिसाइलें भी तैनात हैं। संभावना जताई जा रही है कि यह गुब्बारा इसी सैन्य अड्डे की जासूसी कर रहा हो। गुब्बारे में लगी सर्विलांस की मशीनें संवेदनशील जानकारियां चुरा रही हो। हालांकि, पेंटागन के मुताबिक यह गुब्बारा चीन से अलास्का के पास अलेउतियन आईलैंड आया था। यहां से उत्तर पश्चिम कनाडा होते हुए यह मोंटाना शहर पहुंचा है। फिलहाल नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड इस गुब्बारे को ट्रैक कर रही है।
जासूसी गुब्बारा क्या होता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक ये गुब्बारे बेहद हल्के होते हैं। इनके अंदर हीलियम गैस भरी होती है। लेकिन इनमें अत्याधुनिक निगरानी करने वाले कैमरे और उपकरण भी होते हैं। इन्हें आसानी से जमीन से लॉन्च किया जा सकता है और हवा में ऊपर भेजा जाता है। आमतौर पर जमीन से 80,000 फीट से 120,000 फीट के बीच की ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। एक बार हवा में पहुंचने के बाद काफी हद तक हवा के ऊपर निर्भर होते हैं। इसके एयर पॉकेट्स स्टीयरिंग के रूप में कार्य करते हैं। चीन का यह गुब्बारा कथित तौर पर हवा में 60,000 फीट की दूरी पर यात्रा कर रहा है।
पहले विश्वयुध्द में जासूसी गुब्बारे
historic-uk.com के मुताबिक पहले विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने एक जेपेलिन (प्लेन के आकार का गुब्बारा) में बम भरकर लंदन और दुश्मन देशों के शहरों पर छोड़ दिये थे। तब इन्हें एयरशिप भी कहा जाता था। 31 मई 1915 को लंदन पर एक जेपेलिन हमला हुआ था, जिसमें 5 लोग मारे गये और 35 घायल हुए थे। वहीं एडिनबर्ग पर 2/3 अप्रैल 1916 की रात को दो जेपेलिन हवाई पोतों द्वारा हमला किया गया था।
जब जापान ने अमेरिका में भेजा 'फू-गो बैलून'
इसके बाद दूसरे विश्वयुद्ध के समय फिर से गुब्बारे का मामला उछला। इस बार जापान ने अमेरिका की तरफ हजारों की संख्या में बारूद से भरे गुब्बारे छोड़े। इस विषय पर रॉस कॉएन ने 'फू-गो: द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ द जापानीज बैलून दैट ट्राइड टू बॉम्ब द यूएस' नाम की किताब लिखी है। किताब में रॉस लिखते हैं कि अमेरिका और जापान दोनों ही लंबे वक्त से प्रशांत महासागर पर नियंत्रण चाहते थे। उनकी ये महत्वाकांक्षा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी रही। इसी दौरान अमेरिका में दहशत फैलाने और आगजनी करने की नियत से जापान ने प्रशांत महासागर के ऊपर नवंबर 1944 से मार्च 1945 तक वायु के प्रवाह को देखते हुए अमेरिका की तरफ हजारों गुब्बारा बम (फू-गो बैलून) छोड़ दिए। रॉस के मुताबिक 5 मई 1945 को ओरेगॉन (अमेरिका) स्थानीय चर्च से जुड़े एक समूह के कुछ लोग उस इलाके में पिकनिक मनाने गये हुये थे। जहां उन्हें अंजान गुब्बारा दिखा और अनजाने में उन्होंने गुब्बारे में लगे डिवाइस को एक्टिवेट कर दिया, जिसके धमाका हो गया। हादसे में चर्च के पादरी और उनकी गर्भवती पत्नी समेत चार बच्चे मारे गये थे।
शीत युद्ध में जासूसी
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद समय आया शीत युद्ध का, जब दुनिया दो धड़ों में बंट गयी। एक धड़ा अमेरिका का था, जो पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहा था। वहीं दूसरे धड़े को सोवियत संघ लीड कर रहा था, जो साम्यवाद को लेकर आगे बढ़ रहा था। इस दौरान भी गुब्बारे के जरिए एक-दूसरे की जासूसी की जाती थी।दरअसल, एक तो गुब्बारा बनाकर किसी देश के ऊपर छोड़ना आसान और सस्ता था। उसमें आसानी से कैमरा लगाया जा सकता था। दूसरी बात यह कि इससे देशों के बीच झगड़े की आशंका भी कम होती थी क्योंकि सीधे तौर पर जासूसी का आरोप साबित नहीं कर सकते। साथ ही जो देश जासूसी कर रहा है, उसके जानमाल (जासूसी के लिए इंसान) को दांव पर नहीं लगाना पड़ता था। अमेरिका की ऑनलाइन मैग्जीन वायर्ड के मुताबिक जासूसी गुब्बारे का इतिहास नया नहीं है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा 1950 के दशक में इसका बहुत इस्तेमाल किया गया था। लेकिन, अब इसका इस्तेमाल काफी हद तक कम हो गया है। वैसे उस दौरान जासूसी से ज्यादा दुश्मन देशों को नुकसान पहुंचाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था।
भारतीय सीमा में भी दिखा 'जासूसी गुब्बारा'
कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दिनों पहले भारत के पोर्ट ब्लेयर में भी अमेरिका की तरह बैलून देखा गया था। हालांकि, इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। माना जा रहा था कि वो भी चीन का ही जासूसी गुब्बारा था। वहीं पाकिस्तान की तरफ से अक्सर ही भारत के बॉर्डर वाले इलाके में जासूसी के लिए गुब्बारे भेजने के सबूत मिलते रहे हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने ड्रोन के माध्यम से भारत की जासूसी का तरीका अपनाया है।












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